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स्ट्रीट थिएटर्स के ये 'og' जासूस और कलाकार अब डिजिटल शोर में खो रहे हैं. क्या हम भारत की इस सबसे पुरानी मिमिक्री आर्ट को बचा पाएंगे या ये सिर्फ इतिहास बनकर रह जाएगी? राजू जैसे कलाकारों का ये डर क्या हकीकत बन जाएगा? सस्पेंस अभी बरकरार है.

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कभी भारत की गलियों, मेलों और शादियों में वाइब सेट करने वाले behrupiya आज गुम होते जा रहे हैं. जो इंसान अलग-अलग भेष बदलकर लोगों को एंटरटेन करे जैसे कभी बंदर, जिन्न, पागल या साधु उसे हम बहरूपिया या 'मसखरा' कहते हैं. हंसी, डर, हैरानी और स्टोरीटेलिंग, सब कुछ एक ही परफॉर्मर में समाया होता था.

बहरूपिया इंडिया के ट्रेडिशनल स्ट्रीट परफॉर्मर्स हैं, जो अलग-अलग किरदारों में ड्रेस-अप होकर माहौल बना देते थे. एक टाइम था जब शादियों और त्योहारों पर इनकी एंट्री नॉर्मल थी. पुलिस या पंडित बनकर ये पूरी महफिल लूट लेते थे. आज वो दौर लगभग खत्म हो चुका है. आज की मॉडर्न लाइफ, स्मार्टफोन और डिजिटल कंटेंट के बीच ये आर्ट सर्वाइव करने के लिए स्ट्रगल कर रही है.

जासूसी से एंटरटेनमेंट तक का सफर

माना जाता है कि इस ट्रेडिशन की शुरुआत राजस्थान से हुई थी. पुराने टाइम में बहरूपिया रॉयल फैमिलीज़ के दरबार में एंटरटेनर के तौर पर काम करते थे. कई बार उन्हें एक राजा के दरबार से दूसरे दरबार में भेष बदलकर (disguise) भेजा जाता था ताकि वे वहां की सीक्रेट इन्फॉर्मेशन कलेक्ट कर सकें.

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visual representation Photograph: (ai generated)

उस टाइम राजघरानों की आपसी दुश्मनी के कारण उनका रोल बहुत इम्पॉर्टेंट था. ये लोग होमलेस नहीं हैं, पर इनका कोई परमानेंट एड्रेस भी नहीं होता. ये गांव-गांव जाकर प्लेज़ और परफॉरमेंस करते हैं, किरदार निभाते हैं और लोगों को कहानियां सुनाते हैं.

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"इसमें कोई फ्यूचर नहीं है"

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52 साल के बहरूपिया राजू, जो लखनऊ के काकोरी में रहते हैं, वो ट्रांसफॉर्मेशन और स्टोरीटेलिंग के मास्टर हैं. उनका कहना है, "मैंने कभी नहीं सोचा था कि बहरूपिया बनूंगा, मेरे कज़िन ने मुझे ये कला सिखाई. शुरुआत मज़ाक में की थी, धीरे-धीरे यही मेरा काम बन गया. आज मैं अपनी वाइफ और चार बच्चों के साथ रहता हूं. मेहनत करता हूं, लेकिन मैं नहीं चाहता कि मेरे बेटे ये काम करें, इसमें कोई फ्यूचर नहीं है. मेरे बाद मेरे परिवार में कोई इसे आगे नहीं बढ़ाएगा."

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कल्चरल मेमोरी का नुकसान

डॉ. आदित्य मुखोपाध्याय की बांगलार बहुरूपी जैसी बुक्स में इन कलाकारों के लाइफ और उनके कॉस्ट्यूम्स के बारे में डिटेल में बताया गया है. लखनऊ के कल्चरल हिस्टोरियन कमलेश यादव कहते हैं, "बहरूपिया सिर्फ एंटरटेन नहीं करते थे, वो सोसाइटी की सच्चाई को क्रिएटिव तरीके से दिखाते थे. ये भारत की सबसे पुरानी मिमिक्री और फोक थिएटर परंपराओं में से एक है. आज उनका ऐसे गायब होना सिर्फ रोज़गार का नुकसान नहीं, बल्कि हमारी कल्चरल मेमोरी का लॉस है.” सपेरा, नट और मदारी जैसी कम्युनिटीज भी कभी मेनस्ट्रीम एंटरटेनमेंट थीं, पर टाइम के साथ उनके लिए जगह कम होती गई.

क्या आज की जनरेशन कनेक्ट कर पाएगी?

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आज की gen z फास्ट रील्स, ott और शॉर्ट वीडियोज़ में बड़ी हो रही है, इसलिए लाइव फोक परफॉरमेंस उनके लिए एकदम अनफैमिलियर हैं. हजरतगंज की निवासी मीना शर्मा कहती हैं, "बचपन में बहरूपिया देखकर डर भी लगता था और एक्साइटमेंट भी. आज मेरे बच्चों को ‘बहरूपिया’ शब्द का मतलब तक नहीं पता." हालांकि, इसे ज़िंदा रखने की कोशिशें जारी हैं, जैसे 'बेहरूपिया फेस्टिवल', सूरजकुंड मेला और पुष्कर मेला, जहां आज भी कुछ लोग इस ओल्ड-स्कूल आर्ट को पसंद और अप्रिशिएट करते हैं. बहरूपियों की आवाज़ इस मॉडर्न शोर में दब रही है, लेकिन अगर ये आर्ट पूरी तरह खो गई, तो इंडिया की एक ज़िंदा कहानी खत्म हो जाएगी.

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supriya srivastava is a dedicated media professional with a deep-seated passion for impactful storytelling. Her journey in journalism began with contributing insightful articles on social issues and current affairs to monthly magazines. currently, supriya serves as a dynamic anchor and producer at zingabad. driven by the belief that media is a vital tool for inspiration and change, she continues to bridge the gap between complex information and public engagement through her versatile skill set.