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रील्स के दौर में हर कोई खुद को ट्रौमैटाइज्ड बता रहा है, पर क्या यह वाकई मानसिक बीमारी है या सिर्फ शब्दों का मायाजाल? कहीं 'थेरेपी स्पीक' के पीछे आप अपनी असली पहचान तो नहीं खो रहे? क्या 60 सेकंड का वीडियो आपकी पूरी मेडिकल हिस्ट्री तय कर सकता है?

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आजकल अगर आप अपनी सोशल मीडिया फीड स्क्रोल करें, तो ऐसा लगता है जैसे पूरी दुनिया एक थेरेपी क्लिनिक के वेटिंग रूम में बैठी है. हर दूसरी रील में कोई अपने ट्रॉमा की कहानी सुना रहा है, कोई अपने एक्स को नार्सिसिस्ट बुला रहा है, तो कोई छोटी सी बात को ट्रिग्गरिंग बता रहा है. आज के टाइम में मेंटल हेल्थ पर बात करना अब कोई शर्म की बात नहीं रही, जो कि एक बहुत बड़ी जीत है. लेकिन क्या हम इस प्रोग्रेस के चक्कर में थोड़े एक्स्ट्रा हो रहे हैं? क्या हम वाकई इतने परेशान हैं, या बस हमारी लैंग्वेज और बात करने का तरीका बदल गया है? चलिए इस थेरेपी स्पीक वाले कल्चर को थोड़ा गहराई से समझते हैं.

जब zingabad ने साइकोलॉजिस्ट अमोला बंसल (M.Sc clinical psychology) से इस बारे में बात की, तो उन्होंने कई चौंकाने वाली बातें शेयर कीं.

डिसकम्फर्ट बनाम डिसऑर्डर
आज के दौर में डिसकम्फर्ट यानी छोटी-मोटी परेशानियों को झेलने की हमारी ताकत कम होती जा रही है. जब zingabad ने अमोला से पूछा कि एक नॉर्मल इमोशनल रिस्पॉन्स और क्लिनिकल डिसऑर्डर के बीच कैसे फर्क करें, तो उन्होंने बताया, "आमतौर पर नॉर्मल स्ट्रेस या उदासी किसी घटना के बाद होती है. जैसे अगर 2-3 महीने बाद आपका कोई बड़ा कॉम्पिटिटिव एग्जाम है, तो उसके लिए स्ट्रेस होना नॉर्मल है. या अगर किसी करीबी की मौत हुई है, तो हम उसे 6 महीने तक डिप्रेशन डायग्नोज नहीं करते, उसे शोक यानी ग्रीफ माना जाता है. असली डिफरेंस  फंक्शनिंग में है. जब तक आप ठीक से खाना खा पा रहे हैं, सो पा रहे हैं, काम पर जा रहे हैं और खुद का ख्याल रख रहे हैं, तब तक हम इसे डिसऑर्डर नहीं कहते. डिसऑर्डर तब होता है जब ये सिचुएशन लंबे समय तक चले और आपकी लाइफ को पूरी तरह ठप कर दे."

शब्दों का सिमैन्टिक ब्लीचिंग
पहले जिसे हम बैड डे या ब्रेकअप स्ट्रेस कहते थे, आज उसे सीधे ट्रॉमा का लेबल दे दिया जाता है. एक्सपर्ट्स इसे सिमैन्टिक ब्लीचिंग कहते हैं. अमोला कहती हैं कि आज लोग कहते हैं कि "आज मेरे बाल अच्छे नहीं लग रहे, तो मेरा दिन ट्रौमैटिक है." पर ट्रॉमा असल में किसी एक बड़ी दर्दनाक घटना या लंबे समय तक चलने वाले गहरे दर्द का नाम है (जैसे एक्सीडेंट या घरेलू हिंसा). जब हम कैजुअली इन शब्दों को यूज करते हैं, तो हम उन लोगों की लड़ाई को हल्का कर देते हैं जो वाकई ptsd से जूझ रहे हैं.

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क्या आप '60-सेकंड' वाले सेल्फ डायग्नोसिस के शिकार हैं?


आज की जेनरेशन ने थेरेपी का एक नया शॉर्टकट ढूंढ लिया है सेल्फ डायग्नोसिस. ज़िंगाबाद ने जब रील कल्चर के जोखिमों पर सवाल किया, तो अमोला ने कहा, "एक मनोवैज्ञानिक कभी भी एक रील या एक सेशन में डायग्नोसिस नहीं देता. रील कहेगी 'यू हैव ब्रेन फोग सो यू हैव adhd ,' जबकि ब्रेन फॉग थायराइड या न्यूट्रिशन की कमी से भी हो सकता है. खुद को लेबल देने से एक 'प्लेसेंस इफेक्ट' शुरू हो जाता है. आप अपनी पर्सनालिटी उसी बीमारी के इर्द-गिर्द बुनने लगते हैं. लोग कहने लगते हैं, 'मैं डिप्रेस्ड हूं इसलिए आज लेट हो गया.' इससे आपकी 'सेल्फ-इफेक्टिवनेस' कम हो जाती है और बीमारी आपकी लाइफ कंट्रोल करने लगती है."

एस्थेटिक ट्रेंड और 'अग्ली' रियलिटी 
आजकल मेंटल इलनेस को एक वाइब की तरह ट्रीट किया जा रहा है. अमोला के अकॉर्डिंग, सोशल मीडिया पर लोग अपनी बीमारी को एक पहचान की तरह पेश करते हैं ताकि उन्हें अटेंशन या 'सेकेंडरी बेनिफिट्स' मिल सकें. असलियत में मेंटल डिसऑर्डर 'अग्ली', बोरिंग और थका देने वाले होते हैं. अगर कोई 'क्लीनिंग ocd' को कैजुअल कहता है, तो वो ये नहीं जानता कि असली ocd इंसान को अंदर से खोखला कर देती है.

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क्या करें अगर थेरेपी महंगी लगे?
लास्ट में, जब टीम ने सस्ते ऑप्शंस के बारे में पूछा, तो अमोला ने कुछ क्रेडिबल तरीके बताए:

  • मुफ्त हेल्पलाइन्स: भारत में Telemanas (14416) जैसी सेवाएं 24/7 मुफ्त उपलब्ध हैं.
  • सपोर्ट सर्कल्स: अमोला खुद हर महीने फ्री सपोर्ट सर्कल ऑर्गेनाइज करती हैं, जो उन लोगों के लिए बेहतरीन है जो थेरेपी अफोर्ड नहीं कर सकते.
  • सही एक्सपर्ट चुनें: किसी 'लाइफ कोच' के बजाय उस मनोवैज्ञानिक को फॉलो करें जिसके पास कम से कम मास्टर्स डिग्री हो (जैसे Coheal by Amola). बहुत से साइकोलॉजिस्ट स्टूडेंट्स को 10% तक का डिस्काउंट भी देते हैं.

अपनी मेंटल हेल्थ को सबसे ऊपर रखें, लेकिन इंटरनेट की रील्स को अपनी मेडिकल हिस्ट्री मत बनने दें. असली सुधार ईमानदारी से खुद को समझने और सही एक्सपर्ट से बात करने में है.

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shivani doesn’t seek a title to fill a room. she is a quiet observer trying to understand the world. She wishes to be like rain falling on the sea, a quiet addition to a vast mystery. believing the best stories live between facts and feelings rather than in headlines, she writes about the invisible ways the world softens or breaks us. she isn't an expert at a finish line, but a traveler on the road, writing with a heart wide open to questions even when answers are few.