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आपके सिस्टम में एक ऐसा पॉप अप ऐड जिसका क्लोज बटन ही गायब है. दिल रेस कर रहा है, सांसें अटक रही है और दिमाग चिल्ला रहा हो mayday. क्या ये वाकई कोई खतरा है या आपके बॉडी का एक स्केरी प्रैंक?

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यार कभी ऐसा हुआ है कि बैठे-बैठे अचानक तुम्हारी बॉडी mayday! mayday! चिल्लाने लगे. आप एक कमरे में हैं जहां सब कुछ शांत है, लेकिन आपके अंदर एक ऐसा शोर उठता है जो सुना नहीं, सिर्फ महसूस किया जा सकता है. ये कोई ड्रामा नहीं है, ये वो अनवांटेड पॉप अप ऐड है जिसे क्लोज करने का बटन ही नहीं मिल रहा.

कभी कभी ऐसा होता है ना जब दिल तेज तेज भागने लगता है. सांसें अटकने लगती है और दिमाग कंटिन्यू यही बोल रहा होता है समथिंग वैरी रॉंग इज गोइंग टू हैपन. आंखों के आगे मानो अंधेरा छा जाता है. उस पल लगता है जैसे कंट्रोल स्लिप हो रहा है. जैसे आपका इंटरनल सिस्टम बस क्रैश होने ही वाला है. यही होता है पैनिक अटैक!

आज की gen z जिस स्पीड, प्रेशर और सोशल मीडिया की परफेक्ट वाइब्स के बीच फंसी है, वहां ये एक कॉमन ग्लिच बन गया है. डॉ. हीना ओबेरॉय कहती हैं कि ये कोई वीकनेस नहीं है. "पैनिक अटैक कोई बीमारी नहीं है. बल्कि, ये एक महसूस की गई स्ट्रेसफुल सिचुएशन की तरफ बॉडी का रिएक्शन है जिसमें 'फाइट-ऑर-फ्लाइट' मोड ऑन हो जाता है."

जब ऑटोनोमिक नर्वस सिस्टम एक्टिवेट होता है, तो दिल की धड़कन बढ़ना और मसल्स में खिंचाव जैसे फिजिकल वाइब्स इतने इंटेंस होते हैं कि दिमाग का लॉजिकल हिस्सा खुद को शांत नहीं कर पाता, जिससे ये डरावना एक्सपीरियंस बिल्कुल रीयल महसूस होता है.

ट्रिगर्स और अचानक अटैक का लॉजिक
पैनिक अटैक अक्सर बिना वार्निंग के आता है, चाहे आप क्लास में हों या मेट्रो में. डॉ. हीना के मुताबिक, "ये मेनली इसलिए है क्योंकि पैनिक अटैक के दौरान इंसान इंटरनल बॉडी सेंसेशन पर बहुत ज्यादा ध्यान देने लगता है. आपका दिमाग बैकग्राउंड में इन छोटे-छोटे सिग्नल्स को नोटिस करता रहता है, इसलिए आपको ऐसा लगता है कि अटैक एकदम सडन आ गया."

इसके पीछे लंबे टाइम का स्ट्रेस, ओवरथिंकिंग, नींद की कमी या कैफीन का ओवरडोज हो सकता है जो आपके सिस्टम को हमेशा हाई अलर्ट पर रखता है." gen z के लिए स्ट्रगल और भी ज्यादा है क्योंकि, " gen z को क्रोनिक परफॉरमेंस प्रेशर, सोशल मीडिया पर कांस्टेंट कंपेरीज्जन और रिलैक्स होने के लिए डाउनटाइम न मिलना झेलना पड़ता है. ये स्ट्रेस और इमोशनल अनसीन पैनिक के लक्षणों को ट्रिगर कर देती है." ये बस एक सिग्नल है कि आपकी बॉडी ने बहुत कुछ अकेले मैनेज किया है और अब उसे ब्रेक चाहिए.

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ग्राउंडिंग और रिकवरी
द गुड न्यूज इज़ पैनिक अटैक एक टेम्पररी ग्लिच है, परमानेंट बग नहीं. डॉ. हीना बताती हैं कि ग्राउंडिंग और ब्रीदिंग हैक्स वाकई काम करते हैं "ये टेक्निक्स साइंटिफिकली प्रूवन हैं और पैरासिम्पैथेटिक सिस्टम को एक्टिव करके काम करती हैं, जिससे बॉडी की घबराहट कम होती है और दिमाग को 'सेफ्टी' का सिग्नल मिलता है."

अपने आसपास की आवाजों को सुनना या किसी ठंडे सरफेस को छूना आपको वापस हकीकत यानी की प्रेजेंट में लाता है. सबसे जरूरी बात ये है कि हेल्प मांगना एक स्मार्ट और ब्रेव मूव है.

"पैनिक अटैक का इलाज थेरेपी और मेडिकेशन से पूरी तरह पॉसिबल है. ज्यादातर लोग इसमें बड़ा सुधार महसूस करते हैं." अगर आप किसी और को इस सिचुएशन में देखें, तो "खुद शांत रहें, उन्हें भरोसा दिलाएं, धीरे-धीरे सांस लेने को कहें और उनके एक्सपीरियंस को 'छोटा' कहकर इग्नोर न करें." याद रखें, मेंटल हेल्थ भी उतना ही इम्पोर्टेन्ट है जितनी फिजिकल हेल्थ. ऑलवेज रिमेम्बर यू गॉट दिस.

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shivani doesn’t seek a title to fill a room. she is a quiet observer trying to understand the world. She wishes to be like rain falling on the sea, a quiet addition to a vast mystery. believing the best stories live between facts and feelings rather than in headlines, she writes about the invisible ways the world softens or breaks us. she isn't an expert at a finish line, but a traveler on the road, writing with a heart wide open to questions even when answers are few.