आजकल कॉर्पोरेट वर्ल्ड का सीन काफी वियर्ड हो गया है. कुछ सीनियर्स को लगता है कि जैसे ही उनके नाम के आगे 'सीनियर' या 'मैनेजर' का टैग लगा, वो सीधे भगवान बन गए. Bro wake up respect can’t be demanded, it should be earned. अगर आप अपने इंटर्न्स और जूनियर्स से ये उम्मीद रखते हो कि वो एकदम punctual रहें, इंटीग्रिटी दिखाएं और हमेशा humility के साथ सिर झुकाकर काम करें, तो क्या वही रूल्स आप यानी सीनियर्स पर लागू नहीं होते?
लीडरशिप का मतलब सिर्फ हुकुम चलाना नहीं होता, बल्कि एक स्टैंडर्ड सेट करना होता है. अगर आप खुद ऑफिस लेट आते हो और दूसरों को Punctuality पर लेक्चर देते हो, तो आप सिर्फ एक clown बन रहे हो जिसे कोई सीरियसली नहीं लेता. कॉर्पोरेट की इस भागदौड़ में हम अक्सर भूल जाते हैं कि सामने वाला भी एक इंसान है, कोई रोबोट नहीं, जिसे आप अपनी मर्जी से प्रोग्राम कर सकें.
गॉड कॉम्प्लेक्स: कुर्सी मिली है भाई, वरदान नहीं
सबसे पहले बात करते हैं corporate culture में उन सीनियर्स की जो जूनियर्स के हार्ड वर्क को अपना बताकर बॉस के सामने हीरो बनते हैं. ये सबसे बड़ा 'L' मूव है जो कोई सीनियर कर सकता है. क्रेडिट स्टील करना उन लोगों की निशानी है जिनके पास खुद का कोई ओरिजिनल आईडिया नहीं होता. जब एक इंटर्न पूरी रात जागकर रिसर्च करता है और आप मीटिंग में "i found this" या "my strategy" बोलकर सारी वाहवाही लूट लेते हो, तो आप सिर्फ क्रेडिट चोरी नहीं कर रहे, बल्कि उस जूनियर का मोटिवेशन भी मार रहे हो. ये बिहेवियर आपकी इन्सिक्योर पर्सनैलिटी को चिल्ला-चिल्लाकर दुनिया को दिखाता है.
दूसरों की मेहनत पर अपना स्टिकर चिपकाना बंद करो
असल में, जब आप अपने ही जूनियर्स के टैलेंट से डरने लगते हो, तो आप एक अच्छे गाइड बनने के बजाय उनके करियर के रास्ते का पत्थर बन जाते हो. इनसिक्योर सीनियर हमेशा कोशिश करता है कि उसका जूनियर उससे आगे न निकल जाए, इसलिए वो उसे जरूरी इन्फो नहीं देता या जानबूझकर गलतियां निकालता है. ये टॉक्सिक बिहेवियर पूरी टीम की ग्रोथ को रोक देता है.
एक कॉन्फिडेंट सीनियर वो होता है जो प्राउडली कहे कि "ये अमेजिंग काम मेरे जूनियर ने किया है." क्रेडिट शेयर करने से आपकी वैल्यू कम नहीं होती, बल्कि लोग आपकी रिस्पेक्ट करना शुरू कर देते हैं. लेकिन अगर आप क्रेडिट चोर बने रहे, तो लोग आपके पीछे आपकी बुराई ही करेंगे और आपकी रिस्पेक्ट कभी नहीं करेंगे.
एक लीडिंग आईटी कंपनी में इंटर्नशिप कर चुकी कशिश कहती हैं, "लगा था कि कुछ सीखने को मिलेगा, लेकिन हमें सिर्फ फ्री लेबर समझा गया. लास्ट में सिर्फ एक ही लाइन सुनने को मिलती थी 'तुम्हें आता ही क्या है?' ये न केवल डिमोटिवेटिंग था, बल्कि हमारे सेल्फ-कॉन्फिडेंस पर एक गहरा वार था.''
ऐसा ही कुछ कहना था कनक का जो एक बड़े मीडिया चैनल में काम करती थी. वो बताती हैं, "एक बार तो ऐसा हुआ कि मैंने एक आर्टिकल लिखा और करेक्शन के नाम पर सीनियर ने अपना नाम लिख कर फॉरवर्ड कर दिया. जब पूछा गया तो उन्होंने कहा कि तुम्हारे आर्टिकल में बहुत गलतियां थी इसीलिए शुरू से मुझे लिखना पड़ा जबकि सारा आर्टिकल सेम था. "
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जब टैलेंटेड जूनियर्स से आपको डर लगने लगे
जब भी कोई नया इंटर्न या जूनियर कोई फ्रेश आईडिया लेकर आता है, तो उसे बिना सुने डिसमिस कर देना आजकल का नया फ्लेक्स बन गया है. "तुम्हें क्या पता", "ये कॉर्पोरेट है, तुम्हारी कॉलेज लैब नहीं", या "ये यहां नहीं चलता" जैसे डिसमिसिव कमेंट्स देना बहुत ही टॉक्सिक बिहेवियर है.
ये छोटे-छोटे कमेंट्स किसी के कॉन्फिडेंस को पूरी तरह क्रश कर सकते हैं. आप सीनियर हो इसका मतलब ये नहीं कि आपके पास दुनिया का सारा ज्ञान है. कभी-कभी एक फ्रेशर वो देख लेता है जो सालों से काम कर रहे लोग नहीं देख पाते.
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काम खत्म तो घर जाना क्राइम नहीं, हक है
इसके बाद नंबर आता है गिल्ट ट्रिप का जो आजकल हर ऑफिस की कहानी है. अगर कोई अपना काम खत्म करके टाइम से लीव ले या घर जाए, तो उसे ऐसे देखना जैसे उसने कोई क्राइम कर दिया हो. "आज जल्दी निकल रहे हो?", "काम कम है क्या?", ये सब बोलकर उसे बुरा फील कराना बंद करो. काम का प्रेशर डालना प्रोफेशनल लाइफ का पार्ट हो सकता है, पर किसी की पर्सनल लाइफ की बाउंड्रीज की रिस्पेक्ट न करना सरासर गलत है.
अगर आप खुद काम के नाम पर ऑफिस में फालतू बैठे रहते हो, तो दूसरों से भी वही उम्मीद करना बेवकूफी है. एक अच्छा सीनियर जानता है कि हार्डवर्क और बर्नआउट के बीच एक पतली लकीर होती है जिसे क्रॉस नहीं करना चाहिए.
फीडबैक के नाम पर कैरेक्टर असेसिनेशन बंद करो
प्रोफेशनल लाइफ में फीडबैक देना बहुत जरूरी है, लेकिन बात को पर्सनल लेवल पर ले जाना और जूनियर की डिग्निटी को हर्ट करना सबसे बड़ा रेड फ्लैग है. काम में गलती होना नॉर्मल है, पर उस गलती की वजह से किसी के कैरेक्टर, उसके बैकग्राउंड या उसकी काबिलियत पर वार करना सही नहीं है. अपनी ईगो को सैटिस्फाई करने के लिए किसी के हार्डवर्क का मजाक उड़ाना या उसे सबके सामने नीचा दिखाना आपको पावरफुल महसूस करा सकता है, पर असल में आप अपनी डिग्निटी खो रहे होते हो.
हुकुम चलाना आसान है, इज्जत कमाना मुश्किल
एक सीनियर को ये समझना चाहिए कि ह्यूमिलिटी और इंटीग्रिटी दोनों तरफ से होनी चाहिए. अगर आप चाहते हो कि आपकी टीम आपकी जेन्युइनली रिसपेक्ट करे, तो आपको भी उनके साथ वैसा ही बर्ताव करना होगा जैसा आप अपने सीनियर्स से अपने लिए चाहते हो. अपनी कुर्सी का रौब झाड़ना आसान है, पर एक इंस्पायरिंग लीडर बनना मुश्किल. बिना ह्यूमिलिटी के आप सिर्फ एक टास्क मास्टर बनकर रह जाओगे जिसे लोग सिर्फ डर की वजह से झेलते हैं. जिस दिन आप उस कुर्सी से हटोगे, कोई आपको याद तक नहीं करेगा. इसलिए, बॉस बनना छोड़िए और एक ऐसा इंसान बनिए जिसे लोग अपनी मर्जी से फॉलो करें न कि मजबूरी में.
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