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क्या ये रस्म सिर्फ एक प्रेयर है या प्यार की अग्नि परीक्षा? जलती बत्ती का और नई दुल्हन के सब्र का इम्तिहान. मिथिलांचल की 'टेमी दगाई' परंपरा आखिर आस्था है या पुराने वक्त की बेड़ियां?

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इमैजिन करिए, बाहर सावन की मस्त बारिश हो रही है, बैकग्राउंड में सुहागिनों के लोकगीत बज रहे हैं, और अचानक एक जलती हुई रूई की बत्ती यानी wick एक नई नवेली दुल्हन के घुटनों पर रख दी जाती है. अजीब लगा न? सुनकर ही रोंगटे खड़े हो गए? इसे कहते है टेमी दगाई. 

मिथिलांचल में मधुश्रावणी का ये आखिरी दिन सिर्फ एक रिचुअल नहीं, अपने साथ कई सवाल भी लेकर आता है. सवाल प्यार की परीक्षा का? नई दुल्हनें जब टेमी दगाई की रिचुअल करती  हैं, तो वो सिर्फ ट्रेडिशन नहीं दोहरातीं, बल्कि उस सोच से भी टकराती हैं जिसे आज की gen z नए सिरे से समझना चाहती है. ट्रेडिशन, फेथ और बदलते वक्त के बीच खड़ी ये रिचुअल आज मिथिलांचल से निकलकर सोशल मीडिया तक पहुंच चुकी है.

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सावन का महीना यानी जुलाई से अगस्त आते ही मिथिलांचल में मधुश्रावणी की शुरुआत हो जाती है. ये उन औरतों के लिए खास होता है जिनकी नई शादी हुई होती हैं. आमतौर पर ये त्योहार 15 दिनों तक चलता है. इस दौरान दुल्हनें व्रत रखती हैं. शिव गौरी समेत नाग देवता और बिशहरी माता की पूजा करती हैं साथ ही रोज लोककथाएं सुनती हैं. गीत, नचारी (शिव के भजन) और पूजा के साथ ये टाइम नई जिंदगी में ढलने का दौर माना जाता है.

टेमी दगाई की रस्म और मान्यता

मधुश्रावणी के लास्ट दिन टेमी दगाई की रिचुअल को मनाया जाता है. इसमें ब्राइड के घुटनों  के पास जलती हुई बत्ती लाकर दागा जाता है. माना जाता है कि दुल्हन जितनी तकलीफ सहती है उतनी ही पति की उम्र लंबी होती है. गांवों में इसे फेथ और ट्रेडिशन से जोड़कर देखा जाता है. बड़े बुजुर्ग का कहना हैं कि हमारी मां, दादी, नानी ने भी यही किया था. उनका ये भी  मानना है कि इससे लड़की की पहचान होती है की वो मुश्किल वक्त में अपने परिवार के साथ खड़ी रहेगी या नही. गांव मे शादी को प्राइवेट नहीं बल्कि सोशल इवेंट माना जाता है इसलिए इस रिचुअल को निभाना आम बात है. टेमी दगाई मुख्य रूप से मिथिलांचल के बिहार और नेपाल के सीमा पार क्षेत्र में मनाई जाती है, जैसे कि: बिहार (भारत): दरभंगा, मधुबनी, जहानाबाद, गहड़िया, जंझारपुर,कसरौड़ और आसपास के गांव.
नेपाल: मिथिला- संस्कृति वाले सीमा पार के कुछ गांव

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gen z और मिलेनियल्स की बदलती सोच
हाल के सालों में gen z और मिलेनियल्स इस रिचुअल को नए नजरिए से देख रहे हैं. उनके लिए शादी एक नई जर्नी की शुरुआत होनी चाहिए ना की उनके पेशेंस का टेस्ट. वो मानते हैं कि लम्बी उम्र की विश बिना दर्द के भी मांगी जा सकती है. इसी सोच से टेमी दगाई के सोफ्ट वर्जन जैसे की शीतल दगाई सामने आए हैं जहां रिचुअल को करने की फीलिंग तो रहती है मगर जलती हुई बत्ती नहीं रहती है. कई परिवार इसे ट्रेडिशन और सेफ्टी  के बीच का बैलेंस मानते हैं.

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वहीं कानपुर की आभा झा जो genz हैं, अपनी शादी के दौरान किए गए मैथिली रिचुअल टेमी दगाई को लेकर अपनी बात रखती है. हाल के दिनों में इस रस्म को लेकर सोशल मीडिया पर काफी बात  हो रही है. ऐसे में आभा का कहना हैं, "मेरे हिसाब से ये एक ऐसा रिवाज है जिसका कोई पक्का साइंटिफिक कारण होना जरूरी नहीं है. बहुत सी चीजें हम इसलिए करते हैं क्योंकि उनसे हम इमोशनली और स्पिरिचुअलि तरीके से जुड़ पाते हैं.  मैंने इसे लॉजिक से ज्यादा स्पिरिचुअल तरीके से लिया और इसी वजह से इसका सपोर्ट किया." उनके मुताबिक ये रस्म उनके बडे़ बुजुर्गों से चली आ रही है. "मैंने इसे साइंस की तरह नहीं बल्कि एक रिचुअल और एक इमोशन की तरह देखा,". आभा का कहना है कि एक मैथिल होने के नाते टेमी दगाई उनके लिए अपनी जड़ो से जुड़ने का तरीका है.  जहां आज की जनरेशन  परंपराओं  पर सवाल उठा रही है वहीं आभा जैसी आवाजें ये भी दिखाती हैं कि मॉडर्न सोच और पुरानी परंपराएं साथ साथ चल सकती हैं.

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मेडिकल वर्ल्ड का लॉजिक मोड 
लेकिन जब हम इमोशन्स से हटकर साइंस की बात करते हैं, तो तस्वीर थोड़ी सीरीअस हो जाती है. मणिपाल कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेस के स्टूडेंट अभिषेक कश्यप इस पर एक जरूरी मेडिकल नजरिया रखते हैं. इस रस्म पर अभिषेक कहते है,"एक डॉक्टर के तौर पर मैं कहूंगा कि हालांकि ये सिर्फ सतही त्वचा यानी superficial skin को जलाना है और अपने आप में हेल्थ के लिए बड़ा रिस्क नहीं है.

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स्किन जलाना भले ही छोटा लगे,पर असली खतरा हाइजीन की कमी से होने वाले इन्फेक्शन का है. घुटना की हड्डी यानी tibia के बहुत करीब होता है और अगर इन्फेक्शन वहां तक पहुंचा, तो ये जानलेवा हो सकता है. अगर ट्रेडिशन निभानी ही है, तो प्रॉपर मेडिकल केयर और मेंटल सपोर्ट सबसे जरूरी है.

शहर और गांव के बीच फर्क
शहरी इलाकों में इस बदलाव को ज्यादा आसानी से अपनाया जा रहा है. परिवार बातचीत करते हैं और लड़की की मर्जी को समझा जाता है. वहीं गांवों में सोसाइटी का पॉइंट ऑफ व्यू अब भी जरूरी है. ये चेंज किसी रिचुअल के सपोर्ट या अप्पोस की कहानी नहीं है बल्कि ये दिखाता है कि मधुश्रावणी और उससे जुड़ा ट्रेडिशन आज किस तरह वक्त और जेनरेशन के साथ बदलती  सोच के बीच खड़ा हैं.

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shivani doesn’t seek a title to fill a room. she is a quiet observer trying to understand the world. She wishes to be like rain falling on the sea, a quiet addition to a vast mystery. believing the best stories live between facts and feelings rather than in headlines, she writes about the invisible ways the world softens or breaks us. she isn't an expert at a finish line, but a traveler on the road, writing with a heart wide open to questions even when answers are few.