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दिखावे की भीड़ से भागकर, अब दुनिया 'डिजिटल दरवाजों' के पीछे छिप रही है. जब हर पोस्ट एक मुखौटा बन गई, तो सुकून के लिए 'प्रायवेसी' को हथियार बनाया गया. क्या ये सिर्फ एक ट्रेंड है, या एक गहरी मानसिक थकान का नतीजा?

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social media अब वैसा नहीं रहा जैसा पहले था. 2018 वाला वो 'आई नीड टू पोस्ट दिस' वाला टाइम और हर मूमेंट को फ्लेक्स करना अब पूरी तरह से आउट ऑफ फैशन हो चुका है. अगर आप अपनी प्रोफाइल चेक करें और वहां महीनों से कोई नई पोस्ट न दिखे, तो आप अकेले नहीं हैं. असल में, इंटरनेट पर एक बहुत बड़ा साइलेंट शिफ्ट आ रहा है जिसे हम गेटकीपिंग कह रहे हैं. आजकल की असली वाइब  लॉक्ड प्रोफाइल्स, क्लोज फ्रेंड्स लिस्ट और सीक्रेट इंस्टा यानी फिंस्टा (finsta) में है. हजारों अजनबियों को अपनी लाइफ में झांकने देने के बजाय, gen z अब अपने डिजिटल दरवाजे बंद करके एक सेफ कॉर्नर  ढूंढ रहा है.

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ये सिर्फ एक रैंडम ट्रेंड नहीं है, बल्कि बड़ा चेंज है जिसे एक्सपर्ट्स "the digital campfire theory" कहते हैं. इसका मतलब सीधा सीधा ये है कि लोग अब बड़ी पब्लिक फीड्स के शोर से थककर अपने छोटे और सेफ कैंपफायर्स (प्राइवेट ग्रुप्स और dms) की ओर लौट रहे हैं. ये एक डिजिटल बाउंड्री है जो हम अपने मेंटल पीस के लिए बना रहे हैं. जब दुनिया बहुत ज्यादा लाउड हो जाए, तो खुद को प्राइवेट कर लेना एक लग्जरी बन जाती है.

परफॉर्मेटिव पोस्टिंग को टाटा बाय बाय

कुछ साल पहले तक सोशल मीडिया का मतलब था दुनिया को ये साबित करना कि हम कितने कूल हैं. हमारी लाइफ कितनी लेविश है और हालांकि कही न कही वो अभी भी है. लेकिन अब सीन बदल रहा है. अब हमें हर किसी को ये बताने की जरूरत महसूस नहीं होती कि हम क्या खा रहे हैं या किसके साथ घूम रहे हैं. परफॉर्मेटिव पोस्टिंग यानी सिर्फ दूसरों से वैलिडेशन पाने के लिए कुछ पोस्ट करना अब बहुत ज्यादा एक्सहोस्टिंग लगने लगा है.

यहां एक थ्योरी काम करती है जिसे 'context collapse' कहा जाता है. ये तब होता है जब आपकी लाइफ के अलग-अलग हिस्से जैसे आपके ऑफिस वाले, पुराने स्कूल के दोस्त, रिश्तेदार और रैंडम अजनबी सब एक ही पोस्ट को जज कर रहे होते हैं. ऐसे में आप कभी रियल नहीं हो पाते क्योंकि आप अनजाने में सबको खुश रखने की कोशिश करने लगते हैं. 

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प्राइवेट अकाउंट्स हमें वो कंट्रोल वापस देते हैं जो हमने पब्लिक फीड्स के चक्कर में खो दिया था. किसे आपकी लाइफ देखनी है और किसे नहीं, ये पावर अब आपके हाथ में है. जब आपका अकाउंट प्राइवेट होता है, तो आप 'एस्थेटिक' होने के बजाय ऑथेंटिक होने पर ध्यान देते हैं. वहां आपको लाइक्स का प्रेशर नहीं होता और न ही 'स्ट्रेंजर डेंजर' का डर. सीधे शब्दों में कहें तो, पब्लिक प्रोफाइल पर आप एक 'ब्रांड' होते हैं, लेकिन प्राइवेट अकाउंट पर आप सिर्फ 'आप' होते हैं.

क्यूरेटेड हैप्पीनेस का प्रेशर और स्टेटस एंग्जायटी

हमें लगातार ये महसूस कराया जाता है कि हमारी लाइफ एकदम 'पिक्चर परफेक्ट' होनी चाहिए. इंस्टाग्राम पर दिखने वाली वो क्यूरेटेड हैप्पीनेस, जहां सिर्फ खुशी और कामयाबी के मूमेंट दिखाए जाते हैं, एक भारी इमोशनल प्रेशर पैदा कर रही है. साइकोलॉजी में इसे स्टेटस एंग्जायटी कहा जाता है. जब हम दूसरों की हाईलाइट रील्स  देखते हैं, तो अनजाने में अपनी असल जिंदगी की कंपेरीजन उनसे करने लगते हैं. इसी से जन्म लेता है 'साइलेंट बर्नआउट'. हर वक्त ट्रेंडी दिखने और खुश रहने की कोशिश हमें इमोशनली ड्रेन कर रही है. लगातार नोटिफिकेशंस और लोगों के जजमेंट ने एक अजीब सी दिमागी थकान पैदा कर दी है.

 रिसर्च फर्म gwi की एक रिपोर्ट कहती है कि लगभग 65% gen z यूजर्स अब अपनी मेन फीड पर पोस्ट करने के बजाय क्लोज फ्रेंड्स और dms में ज्यादा टाइम बिताते हैं. डेटा साफ है कि लोग अब पब्लिक अप्रूवल के बजाय प्राइवेट कम्युनिटी को ज्यादा वैल्यू दे रहे हैं.

प्राइवेसी: द न्यू डिजिटल लग्जरी

प्राइवेट अकाउंट में आपको हर बार 'बेस्ट' दिखने की जरूरत नहीं है. वहां आप अपने रैंडम थॉट्स और बिना फिल्टर वाले फोटोज बिना सोचे पोस्ट कर सकते हैं. ये 'क्वाइट मोड' हमें उस जहरीली होड़ से बाहर निकालता है और खुद से दोबारा जुड़ने में मदद करता है. सच तो ये है कि इंटरनेट का फ्यूचर अब 'विलेज' (यानी छोटे, भरोसेमंद ग्रुप्स) जैसा होगा.

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हम सब जानते हैं कि आज के दौर में फॉलोअर्स मैटर करते हैं, पर हमारी मेंटल हेल्थ उससे भी ज्यादा  मैटर करती है. यार, आखिर एक ही तो लाइफ है और हम सबको खुश करने के चक्कर में खुद को तो नहीं खो सकते न. इनसिक्योरिटी और जजमेंट के इस बोझ को ढोने से बेहतर है उन चंद लोगों के बीच रहना जो हमको समझते हैं. हमारी डिजिटल रियल एस्टेट कितनी बड़ी है, ये मायने नहीं रखती, बल्कि उसकी चाबी किन खास लोगों के पास है, असली फ्लेक्स वहीं है. गाइस कमओंन प्राइवेसी इज दा न्यू 'ब्लू टिक'.


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shivani doesn’t seek a title to fill a room. she is a quiet observer trying to understand the world. She wishes to be like rain falling on the sea, a quiet addition to a vast mystery. believing the best stories live between facts and feelings rather than in headlines, she writes about the invisible ways the world softens or breaks us. she isn't an expert at a finish line, but a traveler on the road, writing with a heart wide open to questions even when answers are few.