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8 नवंबर 2016 को नोटबंदी हुई, पर असली केऑस तब शुरू हुआ जब 11 नवंबर की शाम नमक rs 400 किलो बिकने लगा. एक रहस्यमयी ऑडियो और लखनऊ से दिल्ली तक मचा हाहाकार. क्या ये वाकई कोई कमी थी या महज एक सनकी अफवाह? जानिए उस 'साल्टी' सस्पेंस का पूरा सच.

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8 नवम्बर 2016. एक घोषणा और अक्खा इंडिया बन गया केऑस का मुजस्समा. लेकिन हमारी कहानी की स्टार अट्रैक्शन नोटबंदी नहीं है. हम उस घोषणा के तीन दिन बाद की एक घटना को याद करेंगे, जिसके बाद ही शायद इण्डियन ओशन ने कहा था - ‘देस मेरा रंगरेज़ रे बाबू, घाट-घाट यहां घटता जादू’. आइए लखनऊ चला जाए. 

लखनऊ. जहां एक अफ़वाह ने शहर की वर्ल्ड फ़ेमस तहज़ीब को शर्मिंदा कर दिया था. यूं तो शाम-ए-अवध की रूमानियत के मार्केट में भयंकर महिमा है लेकिन 11 नवंबर 2016 की शाम काफ़ी अलग थी. टेन्स और अफ़वाहों से डरी हुई. लोग परेशान थे. 

ऑब्वियस्ली नोट बदलवाने की टेंशन तो थी ही. लोग एटीएम की क़तारों में खर्च हुए जा रहे थे और ठीक-ठाक मात्रा में फ़्रस्ट्रेट हो रहे थे. और फिर… क़तार कहीं और भी लग गई. लखनऊ के अमीनाबाद में एक दुकान के आगे. 

अमीनाबाद का वो 'नमक युद्ध'

रात के दस बज रहे थे. दुकानदार दुकान बढ़ाने की तैयारी मे था. लेकिन अचानक उसकी दुकान पर इतने लोग आ जाते हैं कि लगे, यहां हमला हो रहा है. 25-30 लोगों का हुजूम पहुंचता है. एक ही डिमांड के साथ. नमक चाहिए. सिर्फ़ नमक और कुछ नहीं. नमक पर इतना फ़ोकस भारतवर्ष में सिर्फ़ तीन ही बार देखा गया था. 

एक प्रेमचंद की कहानी में, एक दांडी सत्याग्रह में और एक तब, जब कालिया ने गब्बर को अश्योरंस दी थी कि वो नमक के क़र्ज़ के चलते उसका वफ़ादार है. ये बात अलग है कि मारा फिर भी गया था. ख़ैर, एडिटर का ‘रेफ़्रेंसेज़’ डालने का आग्रह पूरा करने के बाद आगे बढ़ते हैं मूल कहानी की तरफ़. 

तो उस रात, उस दुकान में हर कोई नमक ख़रीदने पहुंचा था. किसी को पैसों की चिंता नहीं थी. 10 रुपए के नमक के लिए कोई 100 रुपए देने को तैयार था, तो कोई 200. एक भाई साहब तो आईपीएल टीम की बोली की तर्ज़ पर 500 रुपए रेट कोट कर दिए.

इतनी भीड़, इतनी अफ़रातफ़री देखकर दुकानदार थोड़ा झल्लाया, थोड़ा परेशान हुआ. दुकान का शटर भी गिरा दिया. लेकिन लोग नहीं माने. शटर के नीचे से हाथ डालकर नमक का पैकेट मांगने लगे. दुकान का शटर टूटना महज़ वक्त की बात थी. क्यों हो रहा था ऐसा? किसलिए सबको नमक ख़रीदने की इतनी जल्दी मची थी? वजह थी एक अफ़वाह. ऐसी अफ़वाह, जिस पर बाद में तो खूब हंसा गया लेकिन उस वक्त तो सबके मुंह का स्वाद ग़ायब हो ही गया था. 

एक whatsapp ऑडियो और 'नमक' का अकाल

गुणीजन जब उस अफ़रातफ़री के रूट कॉज़ तक पहुंचने का जतन करने लगे, तो पता चला कि उन तमाम लोगों को whatsapp पर एक ऑडियो मैसेज मिला था. उस ऑडियो में एक आदमी घबराई हुई आवाज़ में कह रहा था, 'मुरादाबाद में फैक्ट्रियों पर ताले लग गए हैं. सरकार ने नमक की सप्लाई रोक दी है, ताकि लोग नोटों को भूल जाएं'. बस फिर क्या था! नमक सिक्योर करने की होड़ मच गई.

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visual representation Photograph: (ai generated)

पहला केऑस अमीनाबाद में नज़र आया. भीड़ इतनी बेक़ाबू थी कि हालात संभालने के लिए पुलिस को सड़कों पर उतरना पड़ा. और जैसा कि पुलिस के यूज़र मैनुअल में ही लिखा है, लाठी चार्ज की रस्म भी अदा हुई. लेकिन फिर हालात बिगड़े. और इतने बिगड़े कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को मीडिया के सामने आना पड़ा. अखिलेश यादव ने साफ़ किया कि प्रदेश में नमक की कोई कमी नहीं है, लोग अफवाहों पर ध्यान न दें. बाद में कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने एडवाइज़री जारी की. जगह-जगह पुलिस सड़कों पर उतरी.

अफवाह के इस सिलसिले की शुरुआत हुई थी, उत्तर प्रदेश के संभल से. देश में नोटबंदी हुए अभी 3 दिन ही हुए थे. लोग किसी भी तरह नोट बदलवाने के जुगाड़ मे थे. पूरा देश एटीएम की लाइन में खड़ा था. ऊपर से कुछ ही महीने पहले लॉन्च हुई जियो सिम के सदके बहुतों के पास फ्री का डाटा भी था. और यही डाटा इस्तेमाल हुआ, फॉरवर्ड नाम के पवित्र रिचुअल में दबाकर आहुति देने में. 

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11 नवंबर को शाम करीब 5 बजे यूपी के संभल में लोगों के whatsapp पर एक वॉइस मैसेज आया. इसमें एक सनसनीखेज़ दावा किया जा रहा था कि नमक की फैक्ट्री बंद हो गई है. अब देश में नमक नहीं बनेगा. शुरुआत में लोगों ने इसे डिमॉनिटाइज़ेशन की तरह ही हल्के में लिया. लेकिन जब बैक टू बैक मैसेज आने शुरु हो गए और एक ही अपील की बॉम्बार्डिंग हो गई, तो मामला सीरियस हो गया. लोग एक क़तार से निकलकर दूसरी में जा लगे. इस तरह के मैसेज भी चल रहे थे कि रात 12 बजे के बाद नमक 500 रुपए किलो मिलेगा. अब हिंदुस्तान का मिडिल क्लास ऐसे हाहाकारी सिनारियो से डरेगा ही. 

आप ज़रा माहौल समझिए. लोगों के पास कैश नहीं था, ऊपर से घर के राशन की सबसे ज़रूरी चीज़ यानी नमक के गायब होने की खबर. देखते ही देखते इस अफ़वाह की आग मुरादाबाद से दिल्ली, मेरठ, लखनऊ और फिर पूरे उत्तर भारत में फैल गई. हर जगह भीड़ ही भीड़. 

रात 8 बजते बजते अफवाह की दिल्ली मे एंट्री हुई. दिल्ली के ओखला और सीलमपुर में रात 9 बजे सड़कों पर ऐसा ट्रैफिक जाम लगा, जैसे लंबे वीकेंड के लिए दिल्ली वाले मनाली की तरफ़ कूच कर रहे हों. कई जगहों पर दुकानदारों ने शटर गिरा लिए. जब भीड़ ने हंगामा किया, तो उन्होंने पीछे के दरवाजे से 300 से 400 रुपए प्रति किलो में नमक बेचना शुरू किया. लोग रो रहे थे, गिड़गिड़ा रहे थे लेकिन नमक 'स्टॉक' कर रहे थे.

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 पुलिस का एक्शन और आधी रात का ऑपरेशन

जब रात के 11 बजे तक देश के कई हिस्सों में दंगे जैसी स्थिति बनने लगी, तब प्रशासन और भी शिद्दत से हड़बड़ाकर जागा. यूपी और दिल्ली पुलिस ने अपनी पीसीआर वैन निकालीं. पुलिस ने सादे लिबास में दुकानों पर छापा मारा. कानपुर और लखनऊ में उन दुकानदारों को रंगे हाथों पकड़ा गया जो 15 का पैकेट 200 में दे रहे थे. उन पर 'कालाबाज़ारी' की धाराओं में केस दर्ज हुआ.

पूरे उत्तर प्रदेश में पुलिस एक्शन में आई. सबसे पहले उन लोगों को ट्रैक करना शुरू किया जिन्होंने whatsapp पर सबसे पहले मैसेज भेजे थे. लखनऊ एसएसपी मंज़िल सैनी ने साइबर सेल को एक्टिव किया और उन ग्रुप एडमिन्स को नोटिस भेजे, जहां से गलत खबरें चल रही थीं. गाजियाबाद और नोएडा पुलिस ने लोनी और खोड़ा इलाकों से 7 लोगों को हिरासत में लिया, जो इस अफवाह-यज्ञ में योगदान दे रहे थे. 

केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने रात को ही बयान जारी किया कि भारत में नमक का स्टॉक सरप्लस है. साइबर सेल ने उन पोस्ट्स को डिलीट करवाना शुरू किया, जो पैनिक फैला रहे थे. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ट्टवीट किया कि देश में और दिल्ली में नमक की कोई कमी नहीं है.

रात के 12 बजे तक सारे न्यूज़ चैनल सिर्फ एक ही खबर चला रहे थे. रिपोर्टर्स को नमक के गोदामों में भेजा गया. कैमरे पर दिखाया गया कि नमक की बोरियां छतों तक लगी हुई हैं.

हेडलाइन थी 'नमक की कमी नहीं, अक्ल की कमी है!' 12 नवंबर की सुबह तक लोगों को समझ आ गया कि वो एक बड़ी बेवकूफी का शिकार हुए हैं. बाजारों में नमक वापस 15-20 रुपयों पर आ गया था. जो लोग रात को 20 किलो नमक खरीदकर लाए थे, वो अगले दिन पड़ोसियों से नज़रें चुरा रहे थे.

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नमक की नहीं, अक्ल की कमी

जब लोग पहले से डरे हुए हों तो उन्हें डराना आसान होता है. नोटबंदी से हकबकाए लोगों ने एक और डरावने मैसेज पर आसानी से भरोसा कर लिया. आपदा या डर के समय कुछ लोग मदद के बजाय लूटने का मौका तलाशते हैं और ऐसे लोगों ने कालाबाजारी और अफवाहों को बढ़ावा दिया. एक छोटे से गांव से उठी अफवाह ने चंद घंटों में पूरे उत्तर भारत को हिला कर रख दिया. 

2016 की ये घटना हमें एक बहुत बड़ा सबक देती है. अफवाहें नमक से भी ज़्यादा कड़वी होती हैं. जब भी आप ऐसी कोई खबर सुनें, तो 'panic buying' करने के बजाय थोड़ा रुकें और फैक्ट्स चेक करें. क्योंकि आपका पैनिक ही ब्लैक मार्केटियर्स के लिए अवसर है.

नमक को लेकर ये फैक्ट कोई याद रखता तो इतने तमाशे की नौबत ही नहीं आती…. कि चीन और अमेरिका के बाद भारत तीसरा सबसे बड़ा नमक उत्पादक देश है. हम हर साल करीब 250 से 300 लाख टन नमक पैदा करते हैं. जबकि हमारी खपत सिर्फ़ 60 लाख टन नमक की है. यानी कि हम अपनी ज़रूरत से लगभग 4 से 5 गुना नमक पैदा करते हैं. गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों में नमक के इतने बड़े ढेर लगे हैं कि उन्हें खत्म करना लगभग नामुमकिन है.

इसलिए हे पार्थ, अफ़वाह पर न जा, अपनी अकल लगा. अफ़वाह को पहचानना सीखना ही वो ब्रह्मास्त्र है, जिसकी मदद से टेक्नॉलजी युग में हम सबकी नैया भवसागर पार करेगी.  

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