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अगर आप किसी ऐसी महिला को जानती हैं जो 35 की दहलीज़ पर है और अचानक थकावट महसूस कर रही है, तो ये उनके लिए है. ये थकान बस 'बर्नआउट' है या बॉडी का कोई secret mission? क्या आप मेनोपॉज के उन खामोश इशारों को डिकोड कर पा रही हैं?

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40 is the new 20 कहना सुनने में जितना कूल लगता है, असलियत उतनी ही थकाऊ है. जिसे हम अक्सर वर्क स्ट्रेस या मामूली थकान समझकर नज़रअंदाज कर देते हैं, वो दरअसल शरीर के अंदर होने वाली एक बड़ी हलचल यानी early menopause का शुरुआती इशारा होता है. सालों तक हर महीने cramps का टॉर्चर सहने के बाद ये कोई मेडिकल फेलियर नहीं, बल्कि एक नेचुरल एग्जि़ट गेट है.

आज हम बात कर रहे हैं 'मेनोपॉज' की.....

एक औरत की ज़िंदगी किसी फिल्म जैसी ही तो होती है, नहीं? ड्रामा होता है, इमोशन होता है और ज़िम्मेदारियां तो ढेर सारी...लेकिन कहानी में कभी दि एंड नहीं आता और अफ़सोस... इसमें कोई इंटरमिशन भी नहीं होता. ये एक ऐसी नज़्म है जिसे ज़माना पढ़ता तो बड़े शौक से है, पर इसके अल्फाज़ों की थकान कोई नहीं देखता. कैफ़ी आज़मी कहते है,

'क़द्र अब तक तेरी तारीख़ ने जानी ही नहीं,
तुझ में शोले भी हैं बस अश्क-फ़िशानी ही नहीं.'

कहानी ऐसी नदी की है, जो बचपन की बेफ़िक्र वादियों से निकलती है और हर मोड़ पर लोगों की खुशियों के लिए अपना रास्ता बदल लेती है. कभी दोस्त बनकर सहारा देती है, तो कभी 'सुपरवुमन' बनकर पूरी सोसाइटी को संभालती है.

हमारे देश के कई पार्ट्स में, जैसे साउथ इंडिया में, जब एक लड़की को उसका पहला पीरियड आता है, तो 'ऋतु सुधि' जैसे फ़ेस्टिवल्स मनाए जाते हैं. रेशमी साड़ियां, ढेर सारे गिफ्ट्स और वो स्पेशल एहसास... पूरी दुनिया को प्राउडली बताया जाता है कि, 'look, she’s grown up now!' ये इस बात का जश्न होता है कि अब उसके पास क्रिएशन की पावर है.

लेकिन फिर, अचानक ये साइलेंस कैसा?

literally, एक औरत होना इस society में कितना confusing और मुश्किल है. मतलब हिपोक्रेसी देखो, अगर पीरियड्स मिस हो जाएं तो जान हलक में आ जाती है कि कोई मेडिकल इश्यू तो नहीं और अगर आ जाएं, तो आपको इम्प्योर को टैग मिल जाता है.

जो चीज आपके हेल्दी होने का सबसे बड़ा प्रूफ है, उसे ही सोसाइटी ने सबसे 'डर्टी सीक्रेट' बना रखा है. पैड्स को काली पन्नी और पुराने अखबार में ऐसे लपेटकर दिया जाता है जैसे हम कोई ड्रग्स की स्मगलिंग कर रहे हों. कुदरत के इस नॉर्मल प्रोसेस को एक क्राइम जैसा बना दिया है.

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visual representation Photograph: (ai generated)

हद तो तब हो जाती है जब हम progressive होने का ढोंग करते हैं. एक तरफ़ पहले पीरियड्स पर ढोल-नगाड़े बजते हैं क्योंकि अब आप वंश बढ़ा सकती हैं, लेकिन जैसे ही वही शरीर मेनोपॉज की दहलीज पर खड़ा होकर थोड़ा ठहरना चाहता है, तो सबको सांप सूंघ जाता है.

मेनोपॉज को ऐसे इग्नोर किया जाता है जैसे ये कोई एक्सपायरी डेट हो. जिस शरीर ने सालों तक हर महीने उस टॉर्चर को सहा ताकि लाइफ की साइकिल चलती रहे, आज जब उसे सपोर्ट की जरूरत है, तो हम उसे ये तो चिड़चिड़ी या बीमार ही रहती है, कहकर एक कोने में बिठा देते हैं. ये सिर्फ एक नेचुरल फेज़ है यार. पर पता नहीं क्यों, इस सोसाइटी को नॉर्मल चीजें हजम ही नहीं होतीं. 

असल में मेनोपॉज क्या है?

मेनोपॉज कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक बायोलॉजिकल प्रोसेस है. जब एक वीमेन के अंडाशय यानी ovaries अंडे बनाना बंद कर देते हैं और शरीर में एस्ट्रोजन जैसे हार्मोन्स का लेवल गिर जाता है, तो मासिक धर्म यानी पीरियड्स हमेशा के लिए रुक जाते हैं. डॉक्टरी lingo (भाषा) में, जब लगातार 12 महीनों तक पीरियड्स न आएं, तब उसे मेनोपॉज माना जाता है. 

कब होता है? आमतौर पर ये 45 से 55 साल की उम्र के बीच दस्तक देता है, लेकिन आज के स्ट्रेस और लाइफस्टाइल की वजह से कई वीमेन में ये 40 के करीब भी शुरू हो जाता है यानी early menopause. पेरी-मेनोपॉज: मेनोपॉज से कुछ साल पहले का वो वक्त, जब पीरियड्स इर्रेगुलर होने लगते हैं और शरीर में उथल-पुथल शुरू हो जाती है.

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दिमाग और हार्मोन का गहरा कनेक्शन

हालिया रिसर्च (psychological medicine) बताती है कि मेनोपॉज के दौरान दिमाग के उस हिस्से में बदलाव आते हैं जो memory यानी याददाश्त और emotions को कंट्रोल करते हैं.

अल्जाइमर का खतरा: एस्ट्रोजन दिमाग के लिए सुरक्षा कवच है. इसकी कमी से दिमाग में 'बीटा-अमाइलॉइड प्लाक' बन सकते हैं, जो अल्जाइमर की वजह बनते हैं. यही कारण है कि दुनिया के दो-तिहाई अल्जाइमर मरीज महिलाएं हैं.

brain fog: अगर आप चीजें भूल रही हैं या फ़ोकस नहीं कर पा रही हैं, तो ये आपका वहम नहीं, हार्मोनल बदलाव है.

सेलिब्रेशन वर्सेस ऑप्रेशन

irony देखिए, शुरुआत में हम उसे देवी कहते हैं, लेकिन उसी जर्नी के दौरान उसे किचन से दूर रखना, इंम्पयोर मानना और लास्ट में मेनोपॉज होने पर उसे यूजलेस समझ लेना यही हमारी सच्चाई है. seriously, ladies... ये आपकी कहानी का the end नहीं. अब वक्त है अपनी बॉडी की lingo को समझने का और खुद को प्रायोरिटी देने का.

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वो अंधविश्वास जो पीछा नहीं छोड़ते

आज के दौर में भी मेनोपॉज को लेकर कई फालतू बातें फैली हुई हैं. असल में ये बातें एक औरत के मन में इतना गहरा घर कर जाती हैं कि उसे सच लगने लगता है:

  • myth: मेनोपॉज मतलब बुढ़ापा और लाइफ खत्म.
    fact: भाई, ये तो नई शुरुआत है! बिना पीरियड्स के दर्द और पैड्स की झंझट के आप अपनी लाइफ को और भी एन्जॉय कर सकती हैं.
  • myth: ये सिर्फ hot flashes का नाम है.
    fact: ये सिर्फ शारीरिक नहीं, मेंटल हेल्थ का भी मामला है. मूड स्विंग्स, एंग्जायटी और नींद न आना भी इसी का हिस्सा हैं.
  • myth: वजन बढ़ना compulsory है.
    fact: मेनोपॉज सीधे वजन नहीं बढ़ाता, बल्कि मेटाबॉलिज्म स्लो होने और स्ट्रेस की वजह से पेट (midriff) के पास फैट जमा होने लगता है.

let thy food be thy medicine

मेनोपॉज के दौरान शरीर को एक्स्ट्रा केयर की जरूरत होती है. जब शरीर में एस्ट्रोजन का लेवल गिरता है, तो वो दिल और हड्डियों को खतरे में डाल देता है.

हड्डियों की मजबूती: उम्र के साथ हड्डियां कमजोर होने लगती हैं. इसके लिए कैल्शियम और विटामिन d बहुत जरूरी है. रागी, सोया, लो-फैट दूध और पनीर को अपनी डाइट का हिस्सा बनाएं.

हार्ट हेल्थ: पहले एस्ट्रोजन बैड कोलेस्ट्रॉल (ldl) को कंट्रोल रखता था. अब इसके लेवल को बैलेंस करने के लिए अखरोट, अलसी के बीज और साल्मन मछली खाएं.

फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट्स: दिन में कम से कम 300 ग्राम सब्जियां और 100 ग्राम फल खाएं. ये शरीर के 'फ्री रेडिकल्स' से लड़ते हैं और वेट कंट्रोल में हेल्प करते हैं.

क्या न खाएं: ज्यादा कैफीन, बहुत स्पाइसी खाना और शराब. ये चीजें हॉट फ्लैशेस को और खराब कर सकती हैं.

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विटामिन्स और मिनरल्स का रोल

मेनोपॉज के सफर को आसान बनाने के लिए ये न्यूट्रिएंट्स किसी वरदान से कम नहीं हैं:

विटामिन b कॉम्प्लेक्स: यह थकान और डिप्रेशन को कम करता है. साबुत अनाज, केले और दालों में ये भरपूर होता है.

विटामिन e: इसे 'मेनोपॉज़ल विटामिन' कहा जाता है क्योंकि ये हॉट फ्लैशेस से राहत दिलाता है.

मैग्नीशियम: ये ऑस्टियोपोरोसिस और एंग्जायटी से लड़ने में मदद करता है. अंजीर और बादाम इसके अच्छे सोर्स हैं.

फाइटोएस्ट्रोजेन: गाजर, अनार और सोयाबीन जैसे पौधों में ऐसे तत्व होते हैं जो शरीर में एस्ट्रोजन की कमी को नेचुरल तरीके से पूरा करने की कोशिश करते हैं.

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हेल्दी कुकिंग और लाइफस्टाइल हैक्स 

सिर्फ क्या खाना है, ये काफी नहीं बल्कि  उसे कैसे बनाना है, ये भी जरूरी है:

  • cooking smart: सब्जियों को काटकर धोने के बजाय धोने के बाद काटें. तेल का यूज कम करें (महीने में एक इंसान के लिए आधा लीटर काफी है). स्टीमिंग और रोस्टिंग बेस्ट मेथड्स हैं.
  • stay active: मेटाबॉलिज्म बूस्ट करने के लिए डेली एक्सरसाइज करें. इससे मसल मास बना रहता है.
  • hydration: दिन भर में कम से कम 8 गिलास पानी पिएं. ग्रीन टी या हर्बल टी भी अच्छे options  हैं.

डॉक्टर से कब कंसल्ट करें?

मेनोपॉज नेचुरल है, लेकिन कभी-कभी एक्सपर्ट की सलाह लेना must हो जाता है:

  • अगर 12 महीने पीरियड्स बंद रहने के बाद अचानक ब्लीडिंग या spotting हो.
  • अगर हॉट फ्लैशेस इतने ज्यादा हों कि आपकी नींद और डेली लाइफ डिस्टर्ब हो रही हो.
  • अगर आप बहुत ज्यादा डिप्रेशन या एंग्जायटी फील कर रही हों.

no more hiding, no more taboo!

मेनोपॉज के दौरान ज्यादातर वीमेन लगभग 2 किलो वजन बढ़ा लेती हैं और उनकी हड्डियों का घनत्व यानी density कम होने लगती है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि आप हार मान लें. ये वक्त खुद को रिटायर मानने का नहीं, बल्कि खुद से दोबारा दोस्ती करने का है.

इंडिया के हर कोने में महिलाओं को इस फेज के बारे में खुलकर बात करनी चाहिए. मेनोपॉज को एक ब्रेक की तरह नहीं, बल्कि एक ब्रेकथ्रू की तरह देखें. सही डाइट रेगुलर एक्सरसाइज और फैमिली के सपोर्ट से ये सफर बहुत खुशनुमा हो सकता है. no more hiding, no more awkward vibes. it’s time to own this phase! 

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shivani doesn’t seek a title to fill a room. she is a quiet observer trying to understand the world. She wishes to be like rain falling on the sea, a quiet addition to a vast mystery. believing the best stories live between facts and feelings rather than in headlines, she writes about the invisible ways the world softens or breaks us. she isn't an expert at a finish line, but a traveler on the road, writing with a heart wide open to questions even when answers are few.