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क्या 5 लाख का बैग वाकई 5000 रुपये वाले से बेहतर है या ये सिर्फ आपके दिमाग का एक केमिकल लोचा है? डोपामाइन रश से लेकर वेबलेन इफेक्ट तक, जानिए क्यों दुनिया ब्रांड्स के पीछे पागल है और क्या महंगी चीज़ें वाकई आपकी वैल्यू बढ़ाती हैं.

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आजकल फ्लेक्स करना एक फुल-टाइम जॉब बन गया है. इंस्टाग्राम स्क्रोल करो तो हर दूसरा इन्फ्लुएंसर किसी gucci की बेल्ट या prada के बैग के साथ 'main apni favourite hoon' वाली वाइब दे रहा होता है.

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि एक 500 रुपये का बैग और 5 लाख का बैग, दोनों का काम तो आखिर सामान ढोना ही है, फिर लोग अपनी किडनी बेचने (just kidding), तैयार क्यों हो जाते हैं?

कहते हैं, 'शौक बड़ी चीज़ है, पर जब शौक हैसियत से बड़े हो जाएं, तो वो साइकोलॉजी बन जाते हैं.'

असल में, लक्ज़री खरीदना सिर्फ शॉपिंग नहीं है, ये एक इमोशनल रोलरकोस्टर है. ये सारा खेल सिर्फ नोटों का नहीं, बल्कि हमारे neurons का है. चलिए, आज ज़रा इस लग्ज़री के पीछे की साइकोलॉजी को डिकोड करते हैं.

self esteem का boost

लग्ज़री गुड्स खरीदना अक्सर खुद को वैलिडेट करने का तरीका होता है. जब हम कोई महंगा परफ्यूम यूज़ करते हैं या ब्रैंडेड watch पहनते हैं, तो हमारे दिमाग में डोपामाइन का लेवल ऐसे रॉकेट बनता है कि हमें अपनी वैल्यू अचानक से बढ़ी हुई लगने लगती है.

ये सिर्फ showoff नहीं है, ये एक तरह की रिटेल थेरेपी है. 'मैंने दिन-रात घिसकर काम किया है, क्या मैं एक छोटा सा louis vuitton भी डिजर्व नहीं करता?' ये ख्याल हमें वो protagonist वाली फीलिंग देता है.

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visual representation Photograph: (ai generated)

जैसे मोहल्ले की शादियों में लोग अपनी सबसे महंगी साड़ी सिर्फ इसलिए निकालते हैं ताकि पड़ोस वाली आंटी की आंखें फटी रह जाएं, वैसे ही हम अपनी लाइफ के लो-फेज से बाहर निकलने के लिए या सोसाइ़टी में अपनी जगह पक्की करने के लिए इन महंगे ब्रांड्स का सहारा लेते हैं. ये हमें एक सेंस ऑफ बिलॉन्गिंग देता है, जैसे हम भी उस खास एलीट क्लब के मेंबर हैं जहां एंट्री सिर्फ ब्रांड्स से मिलती है.

महंगा मतलब best वाला वहम 

हमारे बुजुर्ग कह गए हैं, 'सस्ता रोए बार-बार, महंगा रोए एक बार.' इसी बात को हमने लग्ज़री पर भी फिट कर दिया है. हमारे दिमाग में एक पुरानी कोडिंग है, 'जितना गुड़ डालोगे, उतना मीठा होगा' यानी जितनी बढ़िया कीमत, उतनी ही बढ़िया क्वालिटी.

इसे साइकोलॉजी में veblen effect कहते हैं. कई बार एक simple 2000 का बैग और 200000 का डिजाइनर बैग लगभग एक ही तरह के लेदर से बने होते हैं, लेकिन हमें लगता है कि कीमत ज्यादा है तो क्वालिटी भी गॉड-लेवल होगी.

apple के साथ भी यही सीन है. भले ही मार्केट में उससे आधे दाम में ज्यादा फीचर्स वाले फोन मिल जाएं, पर 'कटे हुए सेब' का जो स्वैग है.

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यहां कंज्यूमर लॉजिक की खिड़की बंद कर देता है और ब्रांड की हाइप से सोचने लगता है. हमें लगता है कि हम सिर्फ एक गैजेट नहीं, बल्कि परफेक्शन की खरीद रहे हैं.

ggsipu से मास्टर्स कर रही स्नेहा ने ज़िंगाबाद को बताया, 'पिछले हफ्ते मैं बहुत ज़्यादा लो फील कर रही थी और मूड एकदम खराब था. तो बस, खुद को थोड़ा पैम्पर करने के लिए मैंने ढेर सारे कपड़े और कुछ हाई-एंड मेकअप ले लिया. honestly, वो मेरे लिए एक प्रॉपर 'रिटेल थेरेपी' थी और उसके बाद i was very happy!'

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ओल्ड मनी वाइब और लेजिट होने का सुकून

कई लोग सिर्फ शोर-शराबे वाले ब्रांड्स नहीं, बल्कि क्वाइट लग्ज़री के दीवाने होते हैं. इसे ओल्ड मनी वाइब भी कहते हैं, यानी ऐसी चीज़ें जो लाखों की हैं, पर उन पर ब्रांड का नाम चीख-चीख कर नहीं लिखा होता. इसके पीछे की साइकोलॉजी यह है कि आप सिर्फ उन्हीं को अपना स्टेटस दिखाना चाहते हैं जो उस क्लास को समझते हैं.

साथ ही, इंसान के अंदर असली चीज़ों की तरफ एक खास लगाव होता है. रिसर्च का कहना है कि नकली चीज़ दूसरों को तो धोखा दे सकती है, पर हमारे अंदर के कॉन्फिडेंस को वो बूस्ट नहीं दे पाती जो एक ओरिजिनल प्रोडक्ट देता है.

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जब आप असली लग्ज़री पहनते हैं, तो आप खुद को बताते हैं कि आप फेक नहीं हैं, आपकी मेहनत लेजिट है. लग्ज़री बुरी चीज़ नहीं है, बशर्ते वो आपकी जेब पर भारी न पड़े.

असली लग्ज़री महंगे कपड़ों में नहीं, बल्कि आपके कॉन्फिडेंस में होती है. किसी ने सच कहा है, 'दौलत शोर मचाती है, लेकिन शोहरत खामोशी से चलती है.' असली लग्ज़री शोर मचाने वाले logo में नहीं, बल्कि आपकी पर्सनैलिटी और आपके कॉन्फिडेंस में होती है.

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shivani doesn’t seek a title to fill a room. she is a quiet observer trying to understand the world. She wishes to be like rain falling on the sea, a quiet addition to a vast mystery. believing the best stories live between facts and feelings rather than in headlines, she writes about the invisible ways the world softens or breaks us. she isn't an expert at a finish line, but a traveler on the road, writing with a heart wide open to questions even when answers are few.