2025 के एंड में 'धुरंधर' का कलेक्शन देख कर सिनेफाइल्स में जो हाइप थी, वो तो ब्रो नेक्स्ट लेवल थी. अब तक करीब 1,304.50 करोड़ का ओवर ऑल बिज़नेस! पहली बार हिंदी सिनेमा ने ऐसा मेन कैरेक्टर फील दिया है. लोग कह रहे हैं कि 'सिनेमाहॉल वापस आ गए हैं' और पोस्ट-कोविड वाला जो डर था कि 'थिएटर खत्म हो रहे हैं,' वो शायद गलत साबित हो गया!
पर क्या सच में? या ये सिर्फ एक फैंसी फ़िल्टर है?
फिल्म का हिट होना सिर्फ इस पर डिपेंड नहीं करता कि कितने लोग उसे देखने गए यानी की footfalls, बल्कि इस पर भी कि आपकी जेब कितनी ढीली हुई. सिंपल मैथ समझिए, अगर 100 लोग 100 रुपये वाली टिकट पर फिल्म देखें, तो कमाई 10k यानी 10,000 होगी. लेकिन अगर सिर्फ 30 अमीर लोग 500 रुपये की टिकट ले लें, तो कलेक्शन 15k यानी 15000 हो जाएगा. तो फिर सक्सेस क्या है? ज्यादा लोग या ज्यादा पैसे? ये सवाल सच में सिचुएशन को थोड़ा डेलीकेट बना देता है.
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2023-24 का डेटा चेक
ऑरमैक्स की रिपोर्ट कहती है कि 2020-21 के 'लो फेज' में 22.5 से 42.7 करोड़ टिकटें बिकी थीं. जबकि प्री-कोविड ये नंबर 83 करोड़ था.
2023 में 94.3 करोड़ टिकटें बिकीं नो डाउट, ये साल स्ले कर गया, पर क्रेडिट जाता है शाहरुख खान की हैट्रिक (जवान, पठान, डंकी) और गदर 2 के कल्ट क्रेज को. लेकिन बॉस, हर साल तो srk की तीन फिल्में या ऐसे कल्ट सीक्वल नहीं आएंगे न? राइट?
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2024 तो और भी शॉकिंग रहा. मनीकंट्रोल के अकॉर्डिंग, जब तेलुगु सिनेमा के पास 'पुष्पा 2' जैसा मॉन्स्टर था, तब भी दर्शकों की संख्या 2023 के 24 करोड़ से घटकर 18 करोड़ रह गई. 'पुष्पा 2' को करीब 6 करोड़ लोगों ने देखा, जिसमें से मेजर चंक (4 करोड़) हिंदी बेल्ट का था. अगर 'पुष्पा 2' न होती, तो बॉक्स ऑफिस की हालत काफी मिड ही होती.
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धुरंधर भी फीकी निकली?
1,304.50 करोड़ वाली धुरंधर हो या 600 करोड़ वाली छावा, लो-बजट सैयारा से महावतार नरसिम्हा तक पैसा तो खूब आया, पर लोग कम आए.
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धुरंधर की कुल टिकटें 3.5 करोड़ बिकीं. अब जरा फ्लैशबैक में जाइए. 25 साल पहले गदर ने 90 करोड़ कमाए थे, पर उसे 5 करोड़ से ज्यादा लोगों ने थिएटर में देखा था. तो भाई, असली गदर किसने मचाई? साफ है कि आज की फिल्में सिर्फ महंगे टिकट्स के दम पर 'धुरंधर'5 बन रही हैं.
हाथी के दांत दिखाने के कुछ और...
सिनेफाइल्स अक्सर सिनेमा को लेकर ओवर ऑप्टिमिस्टिक हो जाते हैं, पर ये कड़वा सच है. पिछले 4 सालों में एवरेज टिकट प्राइस 20% से ज्यादा बढ़ गया है. ये बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी vvip के आने पर स्लम एरिया को बड़े-बड़े होर्डिंग्स से ढक दिया जाता है और सड़कें चमका दी जाती हैं. सब कुछ एस्थेटिक और सुंदर लगता है, पर जैसे ही वो वीआईपी गाड़ी निकलती है, अंदर की असली और डरावनी कहानी सामने आ जाती है.
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बॉक्स ऑफिस के ये हज़ार करोड़ वाले आंकड़े शायद मेकर्स की तिजोरियां भर दें, लेकिन जिस दिन सिनेमा आम आदमी की पहुंच से दूर होकर सिर्फ प्रीमियम क्लास का लग्ज़री शौक बन गया, उस दिन इंडियन सिनेमा अपनी रूह खो देगी. आखिर तालियां और सीटियां बैलेंस शीट से नहीं, खचाखच भरे थिएटरों की भीड़ से गूंजती हैं.
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