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मुंबई एक टाइम में क्राइम का hotspot बन गया था. हाजी मस्तान से लेकर दाऊद इब्राहिम ने अंडरवर्ल्ड की दुनिया को grow किया. ये रूल करने लगे. फिर एक्शन पैक फिल्म की तरह एंट्री हुई ऑफिसर्स की. जहां एनकाउंटर स्पेशलिस्ट ऑफ़िसर्स ने अंडरवर्ल्ड को फ़िनिश कर दिया.

mumbai crime

dream city मुंबई में एक टाइम था जब अंडरवर्ल्ड रूल कर रहा था. 1970-80 में extortion calls काफ़ी कॉमन हो गए थे. हाजी मस्तान से लेकर करीम लाला और वर्धराजन मुदलियार जैसे नामों से अंडरवर्ल्ड शुरू हुआ. इसी के पीछे दाऊद इब्राहिम, अरुण गवली और छोटा राजन जैसे गैंगस्टर्स ने भी एंट्री की.

मुंबई क्राइम का पूरा hotspot बन गया था. Sea routes होने की वजह से smuggling के लिए ये परफेक्ट सेट-अप था. entry भी smooth, exit भी smooth… पूरी crime-friendly vibe यहां ग्रो हो रही थी. चलिए जानते हैं इस अंडरवर्ल्ड की पूरी इनसाइड स्टोरी

क्राइम को भी organize किया

हाजी मस्तान से सिटी में क्राइम की शुरुआत हुई. जिसने मुंबई में क्राइम को भी organize किया. हाजी मस्तान पहले तो बस एक छोटी-सी पंक्चर की दुकान रन करता था. लेकिन, धीरे-धीरे सिस्टम के loopholes समझकर उसने ऐसा गेम खेला कि वो मुंबई में रूल करने लगा.

मतलब मस्तान का जीरो से फुल पावर मोड ऑन हो गया. वो स्मगलिंग का किंग बन गया. इसी वक्त हाजी मस्तान के अलावा दो और लोगों ने भी illegal activity के ज़रिए मुंबई में शोहरत कमाई.

उनमें से एक था वर्धराजन मुदलियार उर्फ वर्दा भाई जो प्रोटेक्शन रैकेट्स, मटका गैंबलिंग और लेबर यूनियंस के जरिए अपनी पकड़ बनाई. वहीं करीम लाला ने हफ़्ता वसूली और कॉन्ट्रैक्ट किलिंग के ज़रिए अपना गेम strong किया.

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बॉलीवुड में अंडरवर्ल्ड की एंट्री

करीम लाला और वर्धराजन मुदलियार के बीच अक्सर फ़ाइट हुआ करती थी जिससे हाजी मस्तान को कई तरह की प्रॉब्लम हो रही थी. इसलिए हाजी मस्तान ने वर्धराजन मुदलियार और करीम लाला के बीच फ़्रेंडशिप कराई. बाद में तीनों ने मुंबई को अलग-अलग ज़ोंस में डिवाइड किया और फिर अपने-अपने ज़ोन में रूल करने लगे.

इससे मुंबई में क्राइम पूरी तरह ऑर्गेनाइज्ड और टेरिटोरियल हो गया. इसी के साथ पॉलिटिकल सपोर्ट मिलने की वजह से मुंबई में अंडरवर्ल्ड ने खुद को सिक्योर कर लिया. इसी के साथ अंडरवर्ल्ड ने बॉलीवुड में भी एंट्री की.

अंडरवर्ल्ड ने फिल्मों को फाइनेंस करना स्टार्ट कर दिया. मतलब reel और real दोनों worlds mix होने लगे. करीब 20 साल तक मुंबई में अंडरवर्ल्ड का ऐसा terror mode ऑन था कि कोई भी builder, trader या filmmaker हो, सबको अपनी कमाई का एक हिस्सा protection money के नाम पर इनको देना पड़ता था. मतलब बिना मनी दिए काम करना almost impossible हो गया था.

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दाऊद इब्राहिम एरा

1980 आते-आते अंडरवर्ल्ड का पूरा पावर सीन शिफ्ट होने लगा था. हाजी मस्तान से लेकर करीम लाला तक का जो पहले फुल dominance था, वो धीरे-धीरे फेड होने लगा. मतलब पुराने dons का era low-key sunset mode में जा रहा था. वर्धराजन मुदलियार की ग्रिप भी कम हो रही थी.

इसी दौरान एक नया नाम मुंबई में ट्रेंड करने लगा, वो था एक पुलिस कांस्टेबल का बेटा दाऊद इब्राहिम. दाऊद ने क्राइम का स्टाइल चेंज किया. उसने डी कंपनी को इस्टैब्लिश किया और उसने क्राइम को स्ट्रीट लेवल से उठाकर एक कॉर्पोरेट स्टाइल सिंडिकेट में बदल दिया. इसी टाइम मुंबई में दूसरे लोकल गैंगस्टर्स की भी एंट्री धीरे- धीरे हो रही थी.

गैंगस्टर अरुण गवली खुद को एक हिंदू डॉन के रूप में इस्टैब्लिश कर रहा था. उसने हफ्ता वसूली और कॉन्ट्रैक्ट किलिंग से earning शुरू की. इस बीच एक अलग चैलेंज ये बना कि गैंग के बीच में ही competition शुरू हो गया. आपस में ही फाइट हो गई. एक दूसरे गैंग के सदस्यों को सरेआम मारा जाने लगा. 

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एनकाउंटर स्पेशलिस्ट का स्वैग

like every action packed film, जब अंडरवर्ल्ड ग्रो करता है. गैंगस्टर रूल करते हैं. इसी प्वाइंट पर एंट्री होती है एक दबंग पुलिस वाले की. ऐसा ही मुंबई में हुआ. मुंबई पुलिस गैंगस्टर्स को फ़िनिश करने के लिए एक्टिव हो गई.

1991 में मुंबई पुलिस ने एक्शन लिया. दाऊद के 7 लोग लोखंडवाला में एक बिल्डिंग में छेपे थे. मुंबई ATS ने एक टिप के बेस पर रेड मारी और encounter में दाऊद के 7 लोगों को फ़िनिश कर दिया. इस हाई वोल्टेज एक्शन सीन से अंडरवर्ल्ड काफ़ी हिट हुआ. इस प्वाइंट से गेम पलट रहा था. सबको समझ आ गया कि अब सीन पहले जैसा नहीं रहने वाला.

मुंबई terrorist attack

मुंबई में चीज़ें हीट-अप होती जा रही थी. 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने का इम्पैक्ट मुंबई में दिखाई दिया. 12 मार्च 1993 को मुंबई में terrorist attack करवाया गया. इस दिन 12 blast हुए जिनमें 257 लोगों की डेथ हो गई और 700 से ज्यादा लोग injured हुए.

1993 ब्लास्ट के बाद ये तो क्लियर था कि अंडरवर्ल्ड सिर्फ़ एक क्राइम प्रॉब्लम ही नहीं अब नेशनल सिक्योरिटी थ्रेट है. इसी के साथ अंडरवर्ल्ड को रूट्स से ही खत्म करने के लिए मास्टर प्लान रेडी किया गया और मुंबई क्राइम ब्रांच ने एनकाउंटर स्पेशलिस्ट की एक स्पेशल स्क्वाड बनाई. इस स्पेशल स्क्वाड का मिशन था नो वॉरंट, नो अरेस्ट, फ़ैसला ऑन द स्पॉट. मतलब सीधा action, zero delay

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अंडरवर्ल्ड सिस्टम हुआ शेक

मुंबई को सुधारने में और गैंगस्टर्स को फ़िनिश करने में सख्त क़ानून बनाए जाने के साथ-साथ मुंबई police का बहुत बड़ा हाथ रहा, ख़ासकर कुछ ऐसे पुलिसवाले जिनका मिशन सिर्फ एक था, अंडरवर्ल्ड फ़्री मुंबई.

एनकाउंटर स्पेशलिस्ट दया नायक, प्रदीप शर्मा, विजय सालास्कर जैसे ऑफिसर्स का ये राइज़िंग एरा था. ये मुंबई में अंडरवर्ल्ड पर कहर बनकर टूटे. पूरा अंडरवर्ल्ड सिस्टम शेक हो गया था. मैसेज क्लियर था. अब पावर का equation बदल चुका है.

6 मई 1993 को 36 गैंग वॉर में इनवॉल्वड सुभाष मकड़वाला पर ऑफ़िसर विजय सालस्कर, प्रदीप शर्मा और इंस्पेक्टर शंकर कांबले ने इंटेंस फायरिंग की. 13 गोलियां मारकर मकड़वाला का चैप्टर ही क्लोज़ कर दिया.

इस एनकाउंटर की चर्चाएं भी खूब हुईं. इसी मोमेंट से एंड बैक टू बैक एनकाउंटर शुरू हो गए. जिसमें डी कंपनी समेत कई गैंग्स के टॉप शूटर्स मारे गए. वहीं, अरुण गवली गैंग और अमरनाथ गैंग पर भी पुलिस ने ज़बरदस्त एक्शन लिया. इन एनकाउंटर्स को लेकर गैंगस्टर्स के बीच पुलिस का डर पैदा हुआ और मुंबई अंडरवर्ल्ड के खात्मे की इंटेंस स्टोरी शुरू हो गई.

जो गैंगस्टर्स पहले खुलेआम घूमते थे वो अंडरग्राउंड हो गए. जैसे-जैसे एनकाउंटर्स बढ़े वैसे-वैसे एनकाउंटर स्पेशलिस्ट की पॉपुलैरिटी भी बढ़ती चली गई. उनका aura नेक्स्ट लेवल पहुंच गया. इस स्क्वाड ने अपने ऑपरेशंस में 600 से ज्यादा गैंगस्टर्स को एलिमिनेट या न्यूट्रलाइज किया.

2005 तक मुंबई से underworld का almost clean-up हो चुका था. मतलब जो सिटी कभी पूरे terror mode में थी, वो धीरे-धीरे wipe out हो गया. शहर ने सेफ़ ब्रीद करना शुरू कर दिया.

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14 saal se journalism ke battlefield me active, ashesh gaurav dubey sirf khabrein nahi likhte,woh unhe decode karte hain. digital ho ya tv, studio ki roshni se lekar crime scene ki khamoshi tak, inka focus seedha wahaan hota hai jahan story sirf headline nahi, system ka x-ray hoti hai. Ye un sawaalon ko uthate hain jinke jawab aksar file ke neeche daba diye jaate hain. gen-z vibe ke saath old-school reporting ka combo, jahan narrative tight hota hai aur angle hatke.