"वह छोड़कर क्यों नहीं चली गई?" या "उसने पहली बार में आवाज़ क्यों नहीं उठाई..." जब भी domestic violence का कोई केस सामने आता है तो society अक्सर यही सवाल पूछती है. हम अक्सर इसे एक 'कमज़ोरी' या 'गलत चुनाव' समझ लेते हैं, लेकिन हकीकत ये है कि एक टॉक्सिक और हिंसक रिश्ते में फंसी महिला के लिए 'बाहर निकलना' सिर्फ एक फैसला नहीं, बल्कि एक गहरा मनोवैज्ञानिक युद्ध (psychological warfare) होता है.
लेकिन ऐसा क्यों है? क्या यह सिर्फ 'लोग क्या कहेंगे' का डर है, या कहानी इससे कहीं ज़्यादा उलझी हुई है? इसे गहराई से समझने और ऐसे सवाल पूछने वाले लोगों के लिए, हम घरेलू हिंसा के पीछे छिपे उन गहरे मनोवैज्ञानिक और न्यूरोबायोलॉजिकल (neurobiological) कारणों को समझेंगे, जिन्हें अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है.एक महिला, खासतौर पर भारतीय महिला, एक अपमानजनक विवाह (abusive marriage) में रहना क्यों पसंद करती है या वह उससे बाहर क्यों नहीं निकल पाती. वे कौन से कारण हैं जो उसे उस शादी में खींच कर रखते हैं?
साइकोलॉजिस्ट नीति जोशी ने दिया जवाब
इन सवालों के जवाब ओर गहराई से जानने के लिए हमने clinical psychologist नीति जोशी और trauma-informed psychologist अमोला बंसल से बात की. उन्होंने हमें कई वजह बताईं, जिसकी वजह से महिलाएं domestic violence को सहती रहती हैं और सालों बीत जाने के बात भी Toxic Relationship से बाहर नहीं आ पाती. नीति ने कहा, "मैं इसका जवाब 'ट्रॉमा-इन्फॉर्म्ड' (आघात-आधारित) नज़रिए से दूंगी. घरेलू हिंसा या सामान्य रूप से किसी भी तरह की हिंसा को स्वीकार करना, एक सोचे-समझे विकल्प के बजाय एक 'ट्रॉमा रिस्पांस' (आघात के प्रति प्रतिक्रिया) के रूप में समझा जा सकता है."
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उन्होंने आगे कहा, "मूल रूप से, जब भी दुर्व्यवहार होता है, तो वह कभी भी निरंतर या एक जैसा नहीं होता; बीच-बीच में हमेशा मेल-मिलाप के छोटे दौर आते हैं, जिनमें बदलने के वादे और चीज़ों के बेहतर होने की उम्मीदें दी जाती हैं और अक्सर हम उन्हीं वादों और सुलह के उन बेहतर दिनों के कारण, अपने अपराधी या उस व्यक्ति के साथ एक बंधन (Bond) महसूस करने लगते हैं जो हमारे साथ हिंसा कर रहा होता है."
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gambling के जैसा होता है ये रिश्ता
अमोला बंसल कहती हैं, "पीड़ित इस उम्मीद का आदी हो जाता है कि वो पीस वाला फेज वापस आएगा. ये एक सुदृढ़ीकरण (reinforcement) के रूप में काम करता है, जो उन्हें शादी में बनाए रखता है. यह बिल्कुल जुए (gambling) की तरह हैं, क्योंकि आप कभी-कभार जीतते भी हैं, इसलिए आप खेलना जारी रखते हैं. इसी तरह, शादी में कभी-कभार मिलने वाले reinforcement की वजह से दिमाग में 'फील-गुड' हार्मोन डोपामाइन (dopamine) रिलीज होता है, जिससे शादी के लिए एक जैव रासायनिक लत (biochemical addiction) लग जाती है."
साइकोलॉजिस्ट अमोला बंसल ने बताया कि cycle of abuse में चार फेज होते हैं.
- तनाव का बढ़ना (Tension Building): दोनों के बीच बातचीत बंद हो जाती है और पीड़ित व्यक्ति लगातार डरा हुआ महसूस करता है.
- घटना (Incident): यह मिसबिहेव की वास्तविक घटना है, मौखिक, शारीरिक या भावनात्मक.
- सुलह (Reconciliation): मिसबिहेव करने वाला माफ़ी मांगता है, गिफ्ट लाता है या गले लगाने, चूमने या यौन टच जैसे प्यार के physical form दिखाता है.
- शांति (Calmness): रिश्ते में शांति और सुकून का दौर होता है.
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नीति जोशी ये भी बताती हैं कि ये एक continuous process है, जो इन महिलाओं को एक लूप में फंसाए रखता है. नीति जोशी ने कहा, "ये खतरे की मौजूदगी के बावजूद उनके साथ हमारे जुड़ाव को और मज़बूत कर देता है. अब 'क्रॉनिक एक्सपोज़र', यानी लंबे समय तक चलने वाली घरेलू हिंसा, हमारे संज्ञान (cognition) और हमारी न्यूरोबायोलॉजी में बदलाव लाती है. इस तरह का लगातार बना रहने वाला तनाव हमारे Nervous System को असंतुलित कर देता है, जिससे हमारी कार्यक्षमता (functionality) और भविष्य को ध्यान में रखकर फैसले लेने की पावर कमज़ोर हो जाती है."
psychologist से बात करने पर ये भी पता चला कि लंबे समय तक nervous system के असंतुलित रहने की दो मुख्य वजह 'ट्रॉमा रिस्पांस' सक्रिय होते हैं, जिन्हें 'फ़्रीज़' (Freeze) और 'फ़ॉन' (fawn) कहा जाता है. ये रिएक्शन पीड़ित महिलाओं को उस स्थिति को छोड़कर जाने नहीं देतीं. बल्कि, यह व्यावहारिक गतिहीनता (behavioral immobility) में बदल जाती हैं, यानी वो खतरे से दूर नहीं जा पाते.
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घरेलू हिंसा को स्वीकार करने का कॉनसेप्ट
एक और concept है जो बताता है कि कुछ लोग घरेलू हिंसा को क्यों स्वीकार करते हैं. इसे 'learned helplessness' (सीखी हुई लाचारी) कहा जाता है. यह स्थिति उस समय पैदा होती है, जब स्थिति को बदलने या उससे बचने की बार-बार की गई कोशिशें असफल हो जाती हैं, जिससे आपका खुद पर से कंट्रोल या कुछ भी कर पाने का आत्मविश्वास कम हो जाता है और एक लंबे समय के बाद, आप उसे बदलने की कोशिश करना भी बंद कर देते हैं. क्योंकि आप यह मानने लगते हैं. यानी आप सीख चुके होते हैं कि आप लाचार हैं.
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आपने बचपन में एक छोटे हाथी की कहानी सुनी होगी, जिसे रस्सी से बांधकर रखा जाता है. वह आज़ाद होने की बहुत कोशिश करता है, लेकिन असफल रहता है. क्योंकि वह छोटा होता है और रस्सी मज़बूत होती है. जब वह हाथी बड़ा और शक्तिशाली हो जाता है और रस्सी तोड़ सकता है, तब भी वह कोशिश नहीं करता. क्योंकि उसके दिमाग ने सीख लिया है कि वह उस रस्सी के सामने कमज़ोर है. ऐसे ही इस तरह की शादी में फंसी महिला ने शुरुआत में बाहर निकलने की कई कोशिशें की होंगी, लेकिन उसे अक्सर चुप करा दिया जाता है या "सहन करने" के लिए कहा जाता है.
खासतौर पर भारत में, जहां परिवार की इज़्ज़त, परिवार को जोड़कर रखना और बच्चों की ज़िम्मेदारी महिला के कंधों पर डाल दी जाती है. जब उसकी भागने की बार-बार की गई कोशिशें विफलता या और अधिक दुर्व्यवहार की ओर ले जाती हैं तो उसका दिमाल आखिर में solution खोजना बंद कर देता है. वह "सीख" जाती है कि रिजल्ट पर उसका कोई कंट्रोल नहीं है और वह कोशिश करना छोड़ देती है.
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लोग क्या कहेंगे और सामाजिक कलंक का डर
अमोला बंसल ने 2024 की एक research का हवाला देते हुए कहा कि मिसबिहेव करने वाली सिर्फ 14.2% महिलाएं ही मदद के लिए आगे बढ़ती हैं, चाहे औपचारिक रूप से या अनौपचारिक रूप से. इसका मतलब है कि 86% महिलाएं अपनी शादी में दुर्व्यवहार सहती रहती हैं, चाहे वह भावनात्मक हो, शारीरिक हो या मौखिक हो. इसके बाद कुछ सामाजिक-सांस्कृतिक कारण (socio-cultural reasons) भी हैं. वहां "लोग क्या कहेंगे" और सामाजिक कलंक (stigma) का डर होता है. इस बात का डर होता है कि अगर यह खबर बाहर आई तो परिवार और समाज कैसी प्रतिक्रिया देगा या इसका भाई-बहनों की शादी की संभावनाओं पर क्या असर पड़ेगा. ये महिलाएं प्रत्याशित चिंता (anticipatory anxiety) के बहुत हाई लेवल का भी सामना करती हैं.
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अगर हम इसे phases of marriage की तरह देखें तो First to third year of marriage में फीमेल एक denial में जी रही होती है कि, "you know, maybe this is just a phase या फिर मैंने उसको provoke कर दिया होगा, मुझे थोड़ा और try करना चाहिए, he will change." फिर आता है third to seventh year, ये बारगेनिंग फेज़ होता है, जहां पर वो परफेक्ट वाइफ बनने की कोशिश कर रही होती है, stop the violence. अगर लड़ाई अच्छा खाना बनाने पर हुई हैं तो वो और कोशिश करेगी, घर को ठीक से नहीं रखने पर हुई हैं तो वो और ज़्यादा कोशिश करेगी, she will try her best to be the perfect wife.
जब शादी को सात से ज़्यादा साल हो जाते हैं
जब शादी को सात से ज़्यादा साल हो जाते हैं और वो इस सब को झेल रही होती है. फिर state of exhaustion आता है . कॉम्प्लेक्स ट्रॉमा अक्सर इस स्टेट में होता, क्योंकि महिला इतने लंबे टाइम से ये झेल रही है और अब वो जान चुकी है कि ये नहीं रुकने वाला है. उसकी self-esteem पर बहुत ज़्यादा इम्पैक्ट पड़ता है और वो डिप्रेशन से गुज़र रही होती है . या फिर उसके ब्रेन की रिवयरिंग हो चुकी होगी, जिसकी वजह से उसके ब्रेन में मौजूद प्री-फ्रंटल कॉर्टेक्स, जिससे हम लॉजिकली सोच पाते हैं, फंक्शन नहीं कर पाता. इसी वजह से महिलाओं के लिए escape plan करना Almost Impossible हो जाता.
digital nomadism: फ्रीडम का 'अल्टीमेट फ्लेक्स' या बर्नआउट का हसीन जाल?
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