ashesh gaurav dubey profile imageashesh gaurav dubey

कैसे एक बाहुबली ने जेल से चुनाव जीतकर यूपी की राजनीति का dna बदल दिया? कल्याण सिंह से मायावती तक, हर सरकार में फिट रहने वाले हरिशंकर तिवारी के वर्चस्व और पतन की वो अनकही कहानी, जो आज भी रोंगटे खड़े कर देती है.

harishankar tiwari

अगर आपको लगता है कि 'mirzapur' और 'bhaukal' सिर्फ एक वेबसीरीज़ है तो आप थोड़ा रॉन्ग हैं क्योंकि आप शायद उत्तर प्रदेश की पॉलिटिकल हिस्ट्री के बारे में नहीं जानते हैं.

उत्तर प्रदेश की राजनीति की कहानी जितनी फिल्मी है उतनी शॉकिंग भी. यहां 'बाहुबली' का मतलब ही सबकुछ होता है. ये एक ऐसा राज्य है जहां कई बाहुबलियों ने बंदूक से बैलट तक का सफ़र तय किया है, आज हम ऐसे ही एक चेहरे के बारे में बताएंगे जो गोरखपुर में रहकर बिहार तक में अपना दबदबा बनाता रहा.

'हाता', एक अलग दुनिया! 

उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल का गोरखपुर, उस दौर में तो कहावत भी फ़ेमस थी कि गोरखपुर में रहना है तो हरिशंकर तिवारी कहना है. कहानी शुरू होती है 1980 के आसपास. गोरखपुर में विकास के नाम पर रेलवे और पीडब्ल्यूडी के ठेके दिए जा रहे थे. विकास के नाम पर अंधा पैसा खर्च किया जा रहा था, लेकिन उन पैसों पर नज़र थी पूर्वांचल के दो गुटों की.

एक तरफ थे हरिशंकर तिवारी तो और दूसरी ओर थे वीरेंद्र प्रताप शाही. दोनों के बीच वर्चस्व की लड़ाई भी थी, क्योंकि दोनों में से कोई भी एक कदम पीछे हटने के लिए रेडी नहीं थे. इसी के साथ गोरखपुर में 'ब्राह्मण v/s ठाकुर' की जंग की शुरुआत भी हो चली थी. हरिशंकर तिवारी का गोरखपुर में ही एक घर था. उस घर को 'हाता' के नाम से जाना जाता था क्योंकि वो सिर्फ एक बंगला नहीं था बल्कि वहां से एक पैरेलल कोर्ट चला करती थी.

गरीब अपनी फ़रियाद लेकर पुलिस थाने जाएं या ना जाएं, लेकिन हाता में ज़रूर जाते थे, क्योंकि उन्हें वहां न्याय की उम्मीद होती थी. हरिशंकर तिवारी का इंसाफ़ का तरीका भी ठीक वैसे ही होता था जैसे आज के वक्त में टॉलीवुड मूवीज़ में हीरो का होता है.

हरिशंकर तिवारी ने अपनी छवि एक 'मसीहा' की तरह बनाई, जो अपनी जाति और अपने लोगों के लिए किसी भी हद तक जा सकता था और इसी का फायदा हरिशंकर तिवारी को लंबे वक्त तक मिला. 

ये भी पढ़े:domestic violence सहती क्यों रहती हैं महिलाएं? 'पहले क्यों नहीं बोला' का जवाब ये है!

राजनीति में एंट्री से हिली सरकारें

राजनीति और अपराध का जब कॉकटेल होता है तो वर्चस्व सबसे important होता है. हरिशंकर तिवारी को ये समझ में आ चुका था कि अब भौकाल दिखाना पड़ेगा और इसके लिए सबसे बेस्ट है politics में एंट्री. हरिशंकर तिवारी ही थे जिन्होंने भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा लाइफ हैक तलाश लिया. हरिशंकर तिवारी ने सोचा कि अगर पुलिस और कानून से बचना है, तो खुद कानून बनाने वाला बन जाओ. 

1985 में तिवारी जेल के अंदर थे. उन पर दर्जनों केस थे. लेकिन उन्होंने चिल्लूपार विधानसभा सीट से निर्दलीय पर्चा भरा. नतीजा? उन्होंने जेल की सलाखों के पीछे से चुनाव जीता. हरिशंकर तिवारी ने जब चिल्लूपार विधानसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत हासिल की, उस समय up के cm वीर बहादुर सिंह थे और उनका भी राजनीतिक क्षेत्र गोरखपुर ही था.

हरिशंकर तिवारी की ओर से उस वक्त कहा गया था कि चुनाव लड़ने की वजह है सरकारी उत्पीड़न. राजनीति के जानकारों की ओर से ये भी कहा जाता है कि हरिशंकर तिवारी की चुनाव में हुई जीत महज़ विधानसभा में उनकी एंट्री नहीं थी बल्कि राजनीति में 'अपराध की एंट्री' भी थी.

इसी वक्त से अपराध और राजनीति के गठजोड़ की नहीं बल्कि अपराध के राजनीतिकरण की बहस शुरूआत हुई थी. हरिशंकर तिवारी के तरीके को अपनाते हुए ही अतीक अहमद और मुख़्तार अंसारी जैसे लोगों ने भी राजनीति में एंट्री ली थी. 

ये भी पढ़े: cibil score: वो 'भूत' जिससे सब डरते हैं, पर असल में आपकी financial freedom की चाबी है!

सत्ता बदली लेकिन भौकाल कम नहीं हुआ

हरिशंकर तिवारी को अगर एक्सीडेंटल mla कहा जाए तो ये बिलकुल ग़लत होगा, ऐसा इसलिए क्योंकि पहली बार के बाद हरिशंकर तिवारी ने एक के बाद एक कई बार चुनाव में जीत हासिल की और लगातार 22 साल तक विधायक रहे. सरकार चाहे bjp की हो या फिर sp और bsp की, हरिशंकर तिवारी का दबदबा कभी भी कम नहीं हुआ.

शुरुआत कल्याण सिंह के मंत्रिमंडल से हुई इसके बाद up में जब राजनाथ सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी तब भी हरिशंकर तिवारी का नाम कैबिनेट मंत्री की लिस्ट में रहा और ये सिलसिला मायावती से लेकर मुलायम सिंह यादव मंत्रिमंडल में भी चलता रहा.

हरिशंकर तिवारी पहली बार कल्याण सिंह सरकार में 1998 में मंत्री बने, उस वक्त हरिशंकर तिवारी को science and technology विभाग सौंपा गया था. फिर साल 1999 में जब सरकार बदली तो हरिशंकर तिवारी राम प्रकाश गुप्ता की सरकार में वो स्टांप रजिस्ट्रेशन मंत्री बनाए गए.

इसके पीछे एक ख़ास वजह भी थी, दरअसल पूर्वांचल में ब्राह्मणों के बीच हरिशंकर तिवारी बहुत ही famous थे, इस वजह से उनकी पूछ सरकार में होती रही क्योंकि जातीय समीकरण साधने के लिए ब्राह्मणों को साथ लेकर चलना उस वक्त up में जरूरी था.

माना ये जाता था कि उस वक्त जिस भी पार्टी में हरिशंकर तिवारी होंगे उसी पार्टी को पूर्वांचल में ब्राह्मण वोट भी जाएगा. माना जाता है कि 1980 के दौर में हरिशंकर तिवारी का इतमे मज़बूत हो चुके थे कि गोरखपुर इलाके में कोई भी सरकारी ठेका हो वो बिना हरिशंकर तिवारी के मंजूरी के किसी को भी नहीं मिलता था. हरिशंकर तिवारी के जो ख़ास लोग होते उन्हें ही सरकारी ठेके दिए जाते थे और सपोर्ट हरिशंकर तिवारी का रहता था.

हरिशंकर तिवारी ख़ुद ये कहते थे कि अपराध से उनका कोई लेना-देना नहीं है लेकिन माना ये जाता है कि हरिशंकर तिवारी ही वो शख्स थे जिनकी नज़र पहली बार उत्तर प्रदेश में उभर रहे गैंगस्टर श्रीप्रकाश शुक्ला पर पड़ी थी. कहा ये भी जाता है कि श्रीप्रकाश शुक्ला को आगे बढ़ाने में बहुत हद तक हरिशंकर तिवारी का ही हाथ था. 

ये भी पढ़े: box office: रिकॉर्ड कलेक्शन के बावजूद क्या सिनेमा हॉल में मूवी देखना खत्म हो रहा है?

जब 'हाता' की नींव हिली 

कहते है कि कोई भी साम्राज्य हो, उसका अंत ज]रुर होता है. कुछ ऐसा ही हुआ हरिशंकर तिवारी के साम्राज्य का. साल 2007 में पहली बार हरिशंकर तिवारी को चुनाव में ये महसूस हुआ कि उनका वर्चस्व कम हो गया है, क्योंकि इसी साल हुए चुनाव में पहली बार हरिशंकर तिवारी को हार का सामना करना पड़ा. bsp के उम्मीदवार राजेश त्रिपाठी जो उस वक्त कुछ ख़ास बड़े नेता नहीं थे उन्होंने हरिशंकर तिवारी को चुनाव में हराया था.

इसके बाद धीरे धीरे हरिशंकर तिवारी के दिन ढलने शुरू हो गए थे. साल 2017 में जब up में योगी आदित्यनाथ के विज़न में bjp की सरकार बनी तब हाता में भी हलचल शुरु हो गई. ये पहली बार था जब हरिशंकर तिवारी के हाता में पुलिस की छापेमारी हुई थी. ये छापेमारी एक मैसेज के रूप में भी थी कि कुछ भी हो, लेकिन क़ानून से ऊपर हाता नहीं हो सकता है.

साल 2023 में हरिशंकर तिवारी का निधन हुआ लेकिन उससे पहले हरिशंकर तिवारी ने ये ज़रूर सिखाया कि अगर बाहुबली बनना है तो सिर्फ ख़ौफ़ पैदा करके नहीं बल्कि उसके लिए प्लानिंग और सत्ता का सपोर्ट भी जरूरी है.

हरिशंकर तिवारी अब इस दुनिया में भले ही न हों लेकिन हरिशंकर तिवारी की ओर से बाहुबली सिर्फ खौफ से नहीं, बल्कि 'सोशल इंजीनियरिंग' और 'सत्ता के संरक्षण' से बनता है. आज भले ही वह नहीं हैं, लेकिन यूपी की राजनीति की रग-रग में उनकी शुरू की गई 'बाहुबली स्क्रिप्ट' के निशान आज भी मिलते हैं.

ये भी पढ़े:trauma : क्या आप भी 60-सेकंड वाली थेरेपी के शिकार हैं?

ashesh gaurav dubey profile imageashesh gaurav dubey
14 saal se journalism ke battlefield me active, ashesh gaurav dubey sirf khabrein nahi likhte,woh unhe decode karte hain. digital ho ya tv, studio ki roshni se lekar crime scene ki khamoshi tak, inka focus seedha wahaan hota hai jahan story sirf headline nahi, system ka x-ray hoti hai. Ye un sawaalon ko uthate hain jinke jawab aksar file ke neeche daba diye jaate hain. gen-z vibe ke saath old-school reporting ka combo, jahan narrative tight hota hai aur angle hatke.