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कनॉट प्लेस के एक रेस्टोरेंट से उठती लपटें और 'बटर' की खुशबू के पीछे छिपा था एक ऐसा डार्क सच जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी. जब एक रसूखदार नेता का शक उसकी सनक बन गया, तो अंजाम हुआ हिंदुस्तान का सबसे शॉकिंग मर्डर. क्या था उस रात का असली सच?

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जहां एतबार होता है, वहां खामोशियां तक पढ़ ली जाती हैं लेकिन सच्चाई ये भी है कि अगर इसमें शक की एंट्री हो जाए, वहां लफ्ज़ भी अक्सर झूठे लगने लगते हैं.

आज प्यार, शक और एक मर्डर की कहानी हम बताने वाले हैं. जिस तंदूर में रोटियां बनाई जाती हैं अगर उस तंदूर में किसी को जलाकर मार दिया जाए तो? वो भी किसी ऐसे को जिसे आप कभी हद से ज्यादा चाहते थे.

सुनने में थोड़ा अजीब लगता है लेकिन ऐसा हुआ था, वो भी दिल्ली के वीवीआईपी इलाके में. इस केस को ज़्यादातर लोग तंदूर कांड के नाम से जानते हैं. तंदूर कांड हिंदुस्तान का पहला ऐसा मर्डर केस था जिसमें मर्डर के तरीके और लाश को छुपाने के तरीके को जब लोगों ने सुना तो सबके रोंगटे खड़े हो गए थे.

इस कहानी के दो मेन कैरेक्टर हैं, एक नैना साहनी जो कि कांग्रेस की एक महिला कार्यकर्ता थीं और दूसरा सुशील शर्मा जो कि दिल्ली यूथ कांग्रेस का तत्कालीन अध्यक्ष था.

सीक्रेट मैरिज और शक का रेड फ्लैग

ये कहानी है 2 जुलाई 1995 की. दिल्ली में हर साल की तरह इस साल भी गर्मी काफी थी. दिन के वक्त सड़क पर साइलेंस रहता था लेकिन शाम होते ही चहलकदमी होने लगती थी. इसी तारीख़ की रात कुछ ऐसा हुआ जिसने सभी को झकझोर कर रख दिया.

दिल्ली के दिल कनॉट प्लेस में स्थित एक रेस्टोरेंट के तंदूर में जब एक महिला की लाश जलती हुई मिली, तो राजनीति से लेकर पुलिस महकमे तक हड़कंप मच गया. सुशील शर्मा और नैना साहनी दोनों कांग्रेस पार्टी में थे.

सुशील एक उभरता हुआ नेता था, जो शायद एक बड़ी कुर्सी भी पा सकता था, तो दूसरी ओर नैना साहनी कांग्रेस पार्टी की एक कार्यकर्ता. दोनों के बीच मेल मुलाकातें हुई, दोस्ती हुई और दोनों के बीच इश्क हुआ.

सबसे बड़ी बात ये है कि प्यार तो हुआ लेकिन प्यार किसी की नजरों में नहीं आया. मतलब ये चीजें इतनी छिपी रहीं कि नैना और सुशील ने शादी की ये भी किसी को पता नहीं चला. 

शायद सुशील को डर था कि शादी की ख़बर उसके राजनीतिक करियर को खराब कर देगी. हालांकि कुछ लोगों को भनक थी कि नैना और सुशील दिल्ली के गोल मार्केट इलाके के एक फ्लैट में साथ रहते हैं. खैर, शुरुआत में वाइब अच्छी थी लेकिन चीजें धीरे-धीरे बिगड़ती गईं, क्योंकि इश्क में शक की एंट्री हो चुकी थी.

वो 'रिडायल' बटन और शक का 'ब्रेन फेड'

दरअसल यहां एक और शख्स की एंट्री होती है, मतलूब करीम. मतलूब नैना का पुराना दोस्त था और कांग्रेस का कार्यकर्ता भी था. अब दोनों अच्छे दोस्त थे लिहाजा मिलना जुलना होता रहता था लेकिन ये मुलाकातें सुशील को पसंद नहीं थीं.

कह सकते हैं कि सुशील नैना को लेकर ओवर-पजेसिव था. बात 2 जुलाई 1995 की शाम की है जब सुशील अपने फ्लैट पर पहुंचा तो उसने देखा कि नैना किसी से फोन पर बात कर रही है, लेकिन सुशील के आते ही नैना ने फोन काट दिया.

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सुशील को यहां शक हुआ कि आखिर कौन सी बात हो रही थी जो नैना ने उसे देखते ही फोन काट दिया. उस वक्त लैंडलाइन का जमाना था. सुशील ने पहले नैना से जानने की कोशिश की कि आखिर वो किससे बात कर रही थी, लेकिन नैना ने मतलूब का नाम नहीं लिया.

फिर सुशील ने फौरन उस लैंडलाइन फोन से 'रिडायल' का बटन दबाया. दूसरी तरफ से फोन रिसीव हुआ और उधर से मतलूब की आवाज़ आई.

बस यहां सुशील का माथा ठनका. उसका शक और बढ़ गया और उसने गुस्से में ही अपनी लाइसेंसी पिस्तौल से नैना पर तीन गोलियां चलाईं. नैना की ऑन-द-स्पॉट डेथ हो गई थी.

डेड बॉडी को ठिकाने लगाने का 'मास्टरप्लान'

अब कत्ल हो चुका था और सुशील को समझ आ चुका था कि वो बड़ी मुसीबत में फंस चुका है, लेकिन उसे अपने पॉलिटिकल करियर की भी चिंता थी. सुशील के सामने सबसे बड़ा चैलेंज था नैना की बॉडी को ठिकाने कैसे लगाया जाए.

उसने नैना की लाश को एक बोरी में बंद किया. उसने अपनी मारुति कार की डिग्गी में लाश को डाला और ठिकाने लगाने के लिए निकल पड़ा. पहले सुशील ने सोचा कि लाश को आईटीओ के पास पुराने पुल से यमुना में फेंक देगा, लेकिन भारी ट्रैफिक और जाम होने के कारण उसे लगा कि कोई ना कोई ज़रूर देख लेगा. पकड़े जाने के डर से उसने तुरंत उस प्लान को ड्रॉप किया और वहां से वापस आ गया.

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बटर, तंदूर और वो एक 'बड़ा ब्लंडर'

वो वापस कनॉट प्लेस की ओर आया. वहां एक होटल के नीचे 'बगिया रेस्टोरेंट' था जिसे सुशील ही चलाता था. सुशील रात 10:15 बजे बगिया पहुंचा और मैनेजर केशव कुमार को कार के पास बुलाकर बताया कि उससे 'बड़ी गलती' हो गई है. उसने मैनेजर को रेस्टोरेंट खाली कराने का टास्क दिया.

केशव ने अपने मालिक के ऑर्डर को फॉलो किया, ग्राहकों को जल्दी विदा किया और कर्मचारियों को पैसे देकर घर भेज दिया. रेस्टोरेंट खाली होने के बाद, उन्होंने लाश के बंडल को किचन के तंदूर के पास पहुंचाया.

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उन्होंने तंदूर में लाश को डालकर आग लगा दी. बस यहां एक गलती कर दी गई थी जिसके वजह से ये राज बाहर आ गया. आग को तेज करने के लिए उसमें बटर डाल दिया गया. ऐसा इसलिए ताकि लाश जल्दी जल जाए, लेकिन बटर की वजह से आग की लपटें 30-35 फीट ऊंची उठने लगीं और सफेद धुंआ आसमान में छा गया, जिससे लगा कि आग लग गई हो.

पुलिस की 'थर्ड आई' और इंसाफ का अंत

रात करीब 11:25 बजे, दिल्ली पुलिस के कांस्टेबल अब्दुल नज़ीर कुंजू गश्त पर थे. धुंआ देखकर वे रेस्टोरेंट पहुंचे. मैनेजर ने उन्हें गुमराह करने की कोशिश की कि पोस्टर जलाए जा रहे हैं, लेकिन पुलिस को मांस पकने जैसी अजीब गंध आई. वे दीवार फांदकर अंदर पहुंचे और तंदूर को कुरेदा तो वहां एक जली हुई लाश मिली.

जांच में सुशील के फ्लैट पर खून के धब्बे और गोली के निशान मिले. नैना के दोस्त मतलूब ने उसकी चांदी की पायलों से पहचान की. बाद में डीएनए टेस्ट ने साबित कर दिया कि लाश नैना की ही थी. सुशील 10 जुलाई 1995 को बेंगलुरु में पकड़ा गया.

साढ़े आठ साल चले ट्रायल के बाद उसे फांसी की सजा सुनाई गई, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद में बदल दिया. 23 साल जेल में बिताने के बाद, 2018 में उसे रिहा कर दिया गया.

आज सुशील शर्मा एक नई पहचान के साथ गुमनाम जिंदगी जी रहा है, लेकिन 'तंदूर कांड' का वो खौफनाक किस्सा आज भी दिल्ली के इतिहास का सबसे काला चैप्टर माना जाता है.

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14 saal se journalism ke battlefield me active, ashesh gaurav dubey sirf khabrein nahi likhte,woh unhe decode karte hain. digital ho ya tv, studio ki roshni se lekar crime scene ki khamoshi tak, inka focus seedha wahaan hota hai jahan story sirf headline nahi, system ka x-ray hoti hai. Ye un sawaalon ko uthate hain jinke jawab aksar file ke neeche daba diye jaate hain. gen-z vibe ke saath old-school reporting ka combo, jahan narrative tight hota hai aur angle hatke.