up के क्राइम वर्ल्ड की हिस्ट्री में बहुत से नाम आए और गए, लेकिन श्रीप्रकाश शुक्ला जैसा आतंक न कभी देखा गया, न ही सुना गया. महज़ 25 साल की उम्र में एनकाउंटर में गेम ओवर हो गया था इस गैंगस्टर का.
ये गैंगस्टर सिर्फ 5 साल एक्टिव रहा, लेकिन इन 5 सालों में उसने यूपी, बिहार और दिल्ली पुलिस की नींद हराम कर दी थी. वो इंडिया का पहला ऐसा क्रिमिनल था जिसने ak-47 को अपना सिग्नेचर वेपन बनाया और तो और सीधे cm की ही सुपारी ले ली.
एक टीचर का बेटा कैसे बना जल्लाद?
गैंगस्टर्स की कहानियों में अक्सर एक पैटर्न दिखता है, फ़ैमिली का पावरफुल पोजीशन पर होना. दाऊद इब्राहिम के पिता पुलिस में थे, तो श्रीप्रकाश शुक्ला के पिता एक रिस्पेक्टेड स्कूल टीचर थे. गोरखपुर के मामखोर गांव में जन्मा श्रीप्रकाश बचपन में पहलवानी का शौकीन था. वो अखाड़ों में घंटों पसीना बहाता था. उसकी भारी कद-काठी और फुर्ती देख गांव वालों को लगता था कि वो तो कुश्ती में इंडिया का नाम रौशन करेगा, लेकिन डेस्टिनी ने उसके लिए खून से लथपथ रास्ता चुना था.
श्रीप्रकाश ने 20 साल की उम्र तक कोई बड़ा कांड नहीं किया था. कहानी शुरू होती है 1993 के एक मेले से, जहां उसकी बहन के साथ राकेश तिवारी नाम के लड़के ने छेड़खानी की. एक पहलवान भाई के लिए ये बर्दाश्त के बाहर था. श्रीप्रकाश ने आव देखा न ताव, राकेश तिवारी को सीधे खत्म कर दिया. ये उसका फर्स्ट मर्डर था. इसके बाद वो गिरफ़्तारी से बचने के लिए नेपाल के रास्ते बैंकॉक भाग गया. यहीं से एक पहलवान लड़का पूरी तरह क्रिमिनल माइंडसेट में स्विच हो गया.
बैंकॉक से वापसी
जब श्रीप्रकाश बैंकॉक से लौटा, तो वो कोई छोटा-मोटा गुंडा नहीं रह गया था. अब उसकी आंखों में पैसा, ख़ौफ़ और सत्ता की भूख थी. उसने रियलाइज़ किया कि सोलो काम करने से बेहतर है किसी बड़े सिंडिकेट से जुड़ना. उसने बिहार के मोकामा के बाहुबली सूरजभान सिंह के साथ कोलैब किया. सूरजभान को एक शार्पशूटर चाहिए था और श्रीप्रकाश को मॉडर्न हथियारों की तलाश थी.
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सूरजभान ने ही श्रीप्रकाश को यूपी-बिहार के सबसे प्रॉफिटेबल धंधे, रेलवे टेंडर से इंट्रोड्यूस कराया. 90 के दशक में रेलवे स्क्रैप और कोयले के ठेकों पर कब्जा करने के लिए लाशें बिछना आम था. सूरजभान के प्रोटेक्शन में श्रीप्रकाश को पहली बार ak-47 मिली.
इसके बाद उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा. उसने ठेकेदारों को धमकाना शुरू किया और जो नहीं माना, उसे सरेआम गोलियों से भून दिया. उसकी दहशत का लेवल ये था कि उसके टेंडर डालने के बाद कोई दूसरा फ़ॉर्म भरने का डेयर नहीं करता था.
रूह कंपा देने वाले हाई-प्रोफाइल कांड
श्रीप्रकाश शुक्ला के नाम से पुलिस और नेता क्यों कांपते थे? इसके पीछे की कहानी भी है.
- 1997: लखनऊ के सिटी स्टेशन के पास राजनेता वीरेंद्र शाही को उनकी भारी-भरकम सुरक्षा के बावजूद श्रीप्रकाश ने ak-47 से छलनी कर दिया. वीरेंद्र शाही खुद एक बड़ा नाम थे, लेकिन श्रीप्रकाश ने दिनदहाड़े इस कांड को अंजाम देकर लखनऊ को हिला दिया.
- 1998: 13 जून को श्रीप्रकाश ने अपने जीवन का सबसे हाई-प्रोफ़ाइल कत्ल किया. बिहार सरकार के दिग्गज मंत्री बृज बिहारी प्रसाद पटना के अस्पताल में थे. श्रीप्रकाश और उसके साथी पुलिस की वर्दी में लाल बत्ती की गाड़ी से अंदर घुसे और कमांडो की मौजूदगी में मंत्री को भून दिया.
इस मर्डर के बाद देश की पॉलिटिक्स में भूचाल आ गया. इसके बाद पूर्णिया के विधायक अजीत सरकार को भी उसने अपना निशाना बनाया. रेलवे टेंडर और पॉलिटिकल पावर की इस लड़ाई में श्रीप्रकाश अब एक सुपारी किलर से ऊपर उठकर किंगमेकर बनने की कोशिश कर रहा था.
जब cm कल्याण सिंह की ली सुपारी
श्रीप्रकाश की सबसे बड़ी गलती और उसके अंत की शुरुआत तब हुई, जब सीक्रेट एजेंसीज़ को एक ऐसी इन्फ़र्मेशन मिली जिसने सत्ता के गलियारों में सन्नाटा खींच दिया. पता चला कि श्रीप्रकाश शुक्ला ने up के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की हत्या के लिए 6 करोड़ रुपये की सुपारी ली है.
ये पहली बार था जब किसी क्रिमिनल ने सीधे-सीधे के मुखिया को ओपन चैलेंज दिया था. पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया. अब ये केवल लॉ एंड ऑर्डर का मामला नहीं था, बल्कि राज्य की साख और cm की सुरक्षा का सवाल था. लोकल पुलिस श्रीप्रकाश को पकड़ने में पूरी तरह फ़ेल साबित हो रही थी.
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थानों की पुलिस उसकी ak-47 के आगे खुद को बेबस पाती थी. तब यूपी पुलिस के सीनयर ऑफ़िसर्स ने तय किया कि एक ऐसी फ़ोर्स चाहिए जो सिर्फ और सिर्फ श्रीप्रकाश शुक्ला जैसे स्पेशलाइज्ड क्रिमिनल्स से निपटे.
यहीं से जन्म हुआ stf यानी special task force का. 4 मई 1998 को ऑफ़िशियली यूपी एसटीएफ़ का गठन हुआ. अजय राज शर्मा इसके पहले चीफ़ बने.
इस फोर्स को सबसे मॉडर्न हथियार, लेटेस्ट सर्विलांस टेकनीक और यूपी पुलिस के बेहतरीन 50 शार्पशूटर दिए गए. एसटीएफ़ का इकलौता वन पॉइंट एजेंडा था श्रीप्रकाश शुक्ला, चाहे जिंदा या मुर्दा.
गर्लफ़्रेंड, मोबाइल और 14 सिम कार्ड
श्रीप्रकाश शुक्ला जितना खूंखार था, उतनी ही उसकी लाइफ़स्टाइल लग्ज़री और हाई-टेक भी. उसे दिल्ली के 5-स्टार होटलों में रुकना, महंगी गाड़ियों (सिएलो और पजेरो) में घूमना और ब्रांडेड कपड़े पहनना पसंद था.
वो टेक्नोलॉजी का बहुत बड़ा शौकीन था. 1998 के उस दौर में जब मोबाइल फ़ोन एक लग्ज़री था, श्रीप्रकाश के पास हमेशा फोन रहता था. वो पुलिस को चकमा देने के लिए 14 अलग-अलग सिम कार्ड का इस्तेमाल करता था. वो हर कॉल के बाद सिम बदल देता था.
लेकिन उसकी सबसे बड़ी कमजोरी उसकी गर्लफ़्रें बनी, जो दिल्ली-गाजियाबाद इलाके में रहती थी. श्रीप्रकाश कितना भी बड़ा गैंगस्टर था, लेकिन वो अपनी प्रेमिका से लंबी बातें करने का मोह नहीं छोड़ पाया.
stf ने टेकनीक का सहारा लिया और उसकी प्रेमिका के करीबियों के फ़ोन सर्विलांस पर डाल दिए. महीनों की मशक्कत के बाद, उसका लोकेशन गाजियाबाद के पास ट्रेस होना शुरू हुआ.
22 सितंबर 1998, खूनी क्लाइमेक्स
21 सितंबर की रात से ही एसटीएफ की टीम गाजियाबाद और दिल्ली के बॉर्डर पर मुस्तैद थी. 22 सितंबर 1998 की सुबह एसटीएफ को पक्की खबर मिली कि श्रीप्रकाश गाजियाबाद के एक pco से अपनी प्रेमिका से बात कर रहा है और वो नीली कार में अपने साथियों के साथ दिल्ली की तरफ़ निकलने वाला है.
अरुण कुमार (stf sp) के लीड में टीम ने उसकी कार का पीछा किया. दिल्ली के पास वसुंधरा एन्क्लेव के सुनसान इलाके में stf ने उसकी कार को ओवरटेक कर रास्ता रोक दिया. पुलिस ने उसे सरेंडर करने को कहा, लेकिन श्रीप्रकाश जानता था कि सरेंडर का मतलब भी द एंड ही है.
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उसने अपनी ak-47 निकाली और पुलिस पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी. जवाब में sft ने भी गोलियों की बौछार कर दी. करीब 15 मिनट तक चले इस खूनी मुकाबले में श्रीप्रकाश शुक्ला को कई गोलियां लगीं. 25 साल का वो गैंगस्टर, जिसने पूरे नॉर्थ इंडिया में अपनी दहशत का साम्राज्य खड़ा किया था, अपनी ही कार के पास खून से लथपथ पाया गया.
श्रीप्रकाश की मौत के बाद जब उसकी तलाशी ली गई, तो उसकी कार से एक डायरी मिली. इस डायरी ने पूरे सिस्टम को एक्सपोज़ कर दिया. इसमें कई बड़े नेताओं, ias ऑफ़िसर और यहां तक कि कुछ पुलिस वालों के सीक्रेट कोड और नंबर लिखे थे.
ये इस बात का सबूत था कि एक मामूली टीचर का बेटा महज़ 5 साल में इतना बड़ा इसलिए बन पाया क्योंकि उसे सफ़ेदपोशों का सपोर्ट था. वो एक ऐसा क्रिमिनल था जिसकी वजह से up police का ढांचा हमेशा के लिए बदल गया और stf जैसा प्रोफ़ेशनल यूनिट सामने आया, लेकिन अपनी ही तकनीक की लत और फ़्लेक्स करने की आदत की भेंट चढ़ गया.
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