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क्या वो वायरल प्रोडक्ट वाकई लाइफ़ चेंजिंग है या सिर्फ एक महंगा धोखा? क्या है सोशल मीडिया की चकाचौंध के पीछे छिपी ओवर-कंज़म्पशन की कड़वी सच्चाई ? क्या आप भी अनजाने में इस जाल में फंस रहे हैं? जानें कैसे बदल रहा है कूल का मतलब.

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let's be real कितनी बार ऐसा हुआ है कि आपने अपनी फीड स्क्रोल की, और कोई life changing वायरल लिप ऑयल देखा या 5,000 का esthetic home decor देखा, और अचानक लगा कि 'इसके बिना तो मेरी लाइफ एम्पटी है'?

गाइज़, हम सब इस add to cart वाली लत के शिकार रहे हैं. हमारा for you page अब बस एक 24/7 डिजिटल मॉल बन चुका है, जो हमें हर टाइम ये फील कराता है कि अगर हम हर हफ्ते कुछ ट्रेंडिंग नहीं मंगाएंगे, तो हम आउट ऑफ़ ट्रेंड हैं. but guess what? अब हवा बदल रही है. अंधाधुंध हॉल वीडियो और insta made me buy it का नशा अब उतर रहा है.

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welcome to the d-enfluencing era. यही अब नया कूल है. इंटरनेट अब कलेक्टिवली ये समझ रहा है कि ओवर-कंज़म्पशन थका देने वाला है. हर नई रील के साथ अपनी विशलिस्ट बढ़ाना अब फ्लेक्स नहीं रहा. अब असली स्वैग ये जानने में है कि क्या वाकई खरीदने लायक है और किन ओवर-हाइप्ड चीजों को NO कहना है.

क्या वो वाकई मस्ट हैव है या सिर्फ रिंग-लाइट का जादू?

हमें उस खास influencer वॉइस के बारे में बात करने की ज़रूरत है. आप जानते हैं न वही टोन जिसमें हर क्रीम लिटरली इंसेन होती है और हर गैजेट 'guys trust me it's a total game changer' या फिर 'गाइज़ गाइज़ गाइज़ यू जस्ट कांट मिस दिस".' लेकिन रिंग लाइट के पीछे की असली रियलिटी क्या है? क्या वो सच में गेम चेंजर है?  

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अक्सर वो मस्ट हैव प्रोडक्ट सिर्फ एक भारी मार्केटिंग बजट और एक बढ़िया फिल्टर का कमाल होता है. डी-इन्फ्लुएंसिंग का मतलब है रेडिकल ऑनेस्टी.

अब लोग खुलकर बोल रहे हैं, 'sis listen, ये 8,000 की सीरम मत खरीदना. ये सिर्फ एक फ़ैंसी बॉटल है और इससे बेटर आपका बेसिक मॉइस्चराइज़र काम करता है.'

ये हमारे एस्थेटिक लाइफस्टाइल के लिए एक रियलिटी चेक है. हमें अब समझ आ रहा है कि हर कलर की नई वॉटर बॉटल या हर हफ़्ते नए जूते खरीदने से हम ज़्यादा बेटर नहीं हो जाएंगे बस हमारा कमरा और डस्टबिन भर जाएगा.

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एक फ़ेमस ब्यूटी इन्फ़्लुएंसर कनक(बदला हुआ नाम), जिनके 6.78 लाख फॉलोअर्स हैं, ने zingabad से बातचीत में बताया कि उन्होंने एक ब्यूटी प्रोडक्ट का प्रमोशन किया था. शुरुआत में सब ठीक लगा, लेकिन बाद में उन्हें समझ आया कि वो प्रोडक्ट उनकी स्किन को सूट ही नहीं कर रहा था. इसके बाद उन्हे एक्ने की दिक्कत हो गई. 

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जब उन्होंने ब्रांड से इस बारे में बात करनी चाही, तो उनकी बात को सीरियसली नहीं लिया गया. इसी इन्फ़्लुएंसिंग का शिकार हुई राबिया ने बताया, ''मैंने एक ऐसा हेयर सीरम इस्तेमाल किया, जो बाल तेजी से उगाने का दावा करता था. लेकिन असर होने की बजाय उसे स्कैल्प एलर्जी हो गई और बाद में मुझे और भी बड़ी प्रॉब्लम्स का सामना करना पड़ा.''

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शॉपिंग का नशा और प्लैनेट का कचरा

चलो थोड़ा डीप चलते हैं. हम बार-बार इस ओवर-कंज़म्पशन के जाल में क्यों फंसते हैं? जवाब है द डोपामीन हिट. ऑर्डर प्लेस्ड का मैसेज आते ही जो एक सेकंड की खुशी मिलती है, वो बहुत एडिक्टिव होती है. लेकिन जैसे ही पार्सल घर पहुंचता है, शुरू होता है बायर्स रिमोर्स यानी कि " यार ये मैंने क्यों ले लिया?" वाला पछतावा.

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सोशल मीडिया ने एक टॉक्सिक प्रेशर बना दिया है कि हमेशा कुछ "नया" शो-ऑफ़ करना है. पर सच तो ये है कि माइक्रो ट्रेंड हमारे प्लैनेट और मेंटल हेल्थ को मार रहे हैं. फास्ट फैशन ब्रांड्स ऐसे कपड़े बना रहे हैं जो तीन वॉश के बाद बेकार हो जाते हैं, और इन 'वायरल पार्सल्स' की प्लास्टिक पैकिंग हमारे प्लैनेट को चोक कर रही है.

डी-इन्फ्लुएंसिंग सिर्फ पैसे बचाना नहीं, बल्कि सस्टेनेबिलिटी को कूल बनाना है. एक पुराने फ़ेवरेट हुडी को बार-बार पहनना किसी फेक परफ़ेक्ट लाइफ से कहीं ज्यादा ऑथेंटिक और क्लासी है.

हाउ टू बी अ 'डी-इन्फ्लुएंसर' इन ए डिजिटल वर्ल्ड
तो, बिना 'fomo' के आप इस न्यू  वेव का पार्ट कैसे  बन सकते हैं? बस अपना माइंडसेट 'i want this' से बदलकर 'do i really need this' पर शिफ्ट करना है. बाकी ये रही आपकी एंटी शॉपिंग सर्वाइवल किट:

  • द 72-आवर रूल:  जब भी कोई चीज 'मस्ट-बाय' लगे, 3 दिन रुकें. 72 घंटे बाद वो जरूरत अक्सर गायब हो जाती है.
  • शॉप योर क्लोजेट: नया खरीदने से पहले अपनी अलमारी के पीछे दबे हुए कपड़े निकालें. ट्रस्ट मी, आपको ऐसी चीजें मिलेंगी जो आप भूल ही चुके थे.
  • क्वालिटी > क्वांटिटी: 10 सस्ती और बेकार चीजें लेने से अच्छा है एक ऐसी चीज में इन्वेस्ट करें जो सालों-साल चले. वो क्या कहते है, महंगा रोए एक बार, सस्ता रोए बार-बार.
  • अनफॉलो द पुशर्स: जो इनफ्लुएंसर आपको हर रोज कुछ नया खरीदने को मजबूर करे, उसे तुरंत म्यूट या अनफॉलो करें. और हां अगर कुछ काम नहीं आए तो आस्क योर मदर. वो समझा देंगी किस चीज की ज़रुरत है और किसकी नहीं(iykyk)

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जब हमने इशिका कोहली (@ishikakohliii) से बात की, तो सबसे बड़ा ट्विस्ट यही था. वो खुद एक इनफ़्लुएंसर और लाइफ़स्टाइल जर्नलिस्ट हैं. यानी वो ग्रिड के इस पार भी हैं और उस पार भी.

अकॉर्डिंग टू हर 'बीइंग एन इन्फ़्लुएंसर, मैं देख पा रही हूं कि कैसे सोशल मीडिया ने हमारी नीड्स और वॉन्ट्स के बीच की लाइन को ब्लर कर दिया है. इन्फ़्लुएंसर्स अपनी पोस्ट पर और अलग-अलग जगहों पर चीज़ों को इस तरह से शो करते हैं कि उसकी इतनी हाइप बन जाती है कि हमें लगता है कि हमें इसे एक बार ट्राई करना ही चाहिए, चाहे हमें उसकी ज़रूरत हो या न हो.'

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हमने ऋषिका से डी-इन्फ्लुएंसिंग के बारे में पूछा, तो उन्होंने साफ़ किया कि वो अपनी ऑडियंस के साथ धोखा नहीं करतीं. उनके मुताबिक, वो कभी उन चीज़ों को प्रमोट नहीं करतीं जिन्हें वो खुद यूज़ नहीं करतीं, क्योंकि उनके लिए अपनी ऑडियंस के लिए लॉयल्टी सबसे ऊपर है और अगर वो सिर्फ हाइप के लिए कुछ भी गलत दिखाएंगी, तो उनकी क्रेडिबिलिटी हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी जो एक इन्फ्लुएंसर के लिए सबसे बड़ा नुकसान है.

साथ ही उनका कहना था कि कई ब्रांड्स उन्हें फ़ेक टैन करने के लिए कहते हैं फिर उन्हें अपने फ़ेयरनेस क्रीम एड करने के लिए कहते हैं. अनऑफ़िशियली उन्होंने ज़िंगाबाद को चैट्स दिखाए उन ब्रांड्स के जो काफ़ी नामी हैं.

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जब हमने अनुराग से बात की, जो खुद मार्केटिंग के स्टूडेंट हैं और फ़्रीलांस राइटिंग की दुनिया को करीब से देखते हैं, तो उनका नज़रिया एकदम नो-कैप था. उन्होंने मार्केटिंग के उस टैक्टिक्स का पर्दाफ़ाश किया जो ब्रैंड्स हमें इन्फ्लुएंस करने के लिए इस्तेमाल करते हैं. और जिससे हमारी जेब खाली होती है.

अकॉर्डिंग टू हिम "मार्केटिंग में हमें सिखाया जाता है कि कैसे लोगों के फ़ियर, ग्रीड (लालच) और एंगर को टैप करना है. जब भी हम मार्केटिंग करते हैं, तो एक 'सेन्स ऑफ़ ट्राइबल' यानी एक कम्युनिटी का अहसास पैदा करते हैं.

हमें लगता है कि अगर हम उस ट्रेंड या कम्युनिटी का हिस्सा नहीं बने, तो हम समाज से 'बाहर' कर दिए जाएंगे. और जब हमें ऐसा लगता है, तो हमारा ब्रेन 'डेंजर' सिग्नल देता है क्योंकि इवोल्यूशनल साइकोलॉजी यहीं से आती है."

असली कीमत क्या है?
ढेर सारे डिब्बों का ढेर लगाकर पिक लेना अब ओल्ड फ़ैशन्ड हो गया है. सस्टेनेबल होना, पैसे बचाना और एक ऐसी पर्सनैलिटी होना जो ब्रांड्स की मोहताज न हो, यही असली gen z फ़्लेक्स है.

सो अगली बार जब आप किसी वायरल प्रोडक्ट को देखकर बाई नाउ की तरफ बढ़ें, तो रुकें और सोचें क्या ये आपकी लाइफ वाकई बेहतर बनाएगा, या बस आपके क्रेडिट कार्ड का बिल बढ़ाएगा? स्मार्ट बनें, ऑथेंटिक रहें, नो कैप ब्रो, बट अब डी-इन्फ्लुएंसिंग ही असली ट्रेंड है.

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shivani doesn’t seek a title to fill a room. she is a quiet observer trying to understand the world. She wishes to be like rain falling on the sea, a quiet addition to a vast mystery. believing the best stories live between facts and feelings rather than in headlines, she writes about the invisible ways the world softens or breaks us. she isn't an expert at a finish line, but a traveler on the road, writing with a heart wide open to questions even when answers are few.