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गुलाबी स्टोरीज़ और girl boss कोट्स के पीछे की वो असलियत, जिसे हम अक्सर seen करके छोड़ देते हैं. क्या आप जानते हैं उन 10 औरतों के बारे में जिन्होंने बिना किसी हैशटैग के इतिहास का रुख बदल दिया? ये सिर्फ नाम नहीं, हमारे वजूद की नींव हैं...

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8 मार्च की सुबह होते ही इंस्टाग्राम फीड किसी पिंक-कलर की दुकान जैसा लगने लगता है. हर दूसरी स्टोरी पर वही घिसा-पिटा girl boss वाला स्टिकर और celebrate her वाले कोट्स.

इसे आज की lingo में performative posting कहते हैं. performative posting ही तो है, यानी बस दिखाने के लिए डाल दिया ताकि दुनिया को लगे कि हम तो बहुत progressive हैं.

लेकिन असलियत?

9 मार्च की सुबह होते ही वो सारे पोस्ट गायब से हो जाते हैं और दुनिया फिर से back to pavillion. जहां औरतों की मेहनत को नॉर्मल मानकर seen करके  छोड़  दिया जाता है. 

पर कभी सोचिए, उन औरतों का वीमेन्स डे कब होता है?

आजकल हम main character energy की बात करते हैं, lead, protagonist,  लेकिन उन औरतों का क्या जो पूरी लाइफ supporting role में गुज़ार देती हैं?

वो invisible work जो घर के किचन से शुरू होकर office की फाइलों तक फैला है. रिसर्च कहती है कि औरतें पुरुषों के मुकाबले 3 गुना ज्यादा unpaid labour करती हैं, पर उसे प्यार और फर्ज़ का टैग देकर हिसाब की किताब से बाहर कर दिया जाता है. इसे ही असली gender gap कहते हैं, जहां काम बराबर (या ज्यादा) है, पर क्रेडिट और करेंसी..... दोनों में कटौती है.

उस खिड़की के बाहर देखिए. उस कंस्ट्रक्शन साइट पर, जहां दोपहर की तपती धूप में पसीने से तर-बतर एक औरत अपने सिर पर ईंटें ढो रही है. उसके पास स्टेटस डालने का वक्त नहीं है, शायद उसे तो तारीख का इल्म भी नहीं.

पास के खेतों में मिट्टी से सने हाथों से भारी वॉटर-कैन उठाए जो मां पौधों को सींच रही है, वो सिर्फ पौधों को नहीं, अपने परिवार के सपनों को पाल रही है.

ये वो औरतें हैं जिनके लिए 'एम्पावरमेंट' कोई हैशटैग नहीं, बल्कि हर रोज़ की जद्दोजहद है. उनकी वॉर्म्थ उन रोटियों में है जो वो चूल्हे की आंच पर तपकर बनाती हैं और उनकी ताकत, उनकी ताकत उस चुप्पी में है जिससे वो पूरी दुनिया का बोझ सह लेती हैं. इस बार चलिए उस स्क्रीन से नजर हटाकर उन दरकी हुई हथेलियों को देखते हैं, जिनमें असली struggle की लकीरें छिपी हैं.

science की दुनिया में शोर मचाती खामोशियां

ये वो औरतें थीं जिन्होंने उस दौर में अपना लोहा मनवाया जब औरतों को सिर्फ घर संभालने की सलाह दी जाती थी. इनका काम किसी ट्रेंडिंग रील से कहीं ज्यादा गहरा और असरदार था. इन महिलाओं की दास्तां महज़ चंद तारीखों का हिसाब नहीं, बल्कि उस दौर के बंद पिंजरों को तोड़कर आसमान छूने की एक मुकम्मल कहानी है.

janaki ammal (botanist):

इन्हें 'the sugarcane lady' कहना गलत नहीं होगा. 1930s में जब भारत को मीठे गन्ने के लिए विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता था, तब इन्होंने कोयंबटूर में गन्ने की ऐसी हाइब्रिड वैरायटी बनाई जिसने भारत को 'sugar-sufficient' बना दिया.

1931 में अमेरिका से बॉटनी में phd करने वाली पहली भारतीय महिला और 1977 में पद्म श्री पाने वाली पहली महिला साइंटिस्ट.

शी इज़ द ओरिजिनल og!

asima chatterjee (organic chemist):

1944 में किसी भी इंडियन यूनिवर्सिटी से 'doctorate of science' पाने वाली पहली महिला. इन्होंने 40 साल तक औषधीय पौधों पर रिसर्च की और मलेरिया (ayush-64) and मिर्गी (epilepsy) की दवाएं बनाईं. आज भी मॉडर्न मेडिसिन में इनका contribution लाखों लोगों की धड़कनें बचा रहा है.

anna mani (meteorologist):
जब 'रिन्यूएबल एनर्जी' जैसा कोई फैंसी शब्द मार्केट में नहीं था, तब 1950s में अन्ना ने सोलर और विंड एनर्जी के डेटा पर काम शुरू कर दिया था. c.v. raman के साथ हीरा और माणिक (ruby) के गुणों पर रिसर्च की और मौसम विभाग के 100 से ज्यादा इंस्ट्रूमेंट्स को खुद डिजाइन व मैन्युफैक्चर किया. इन्हें 'weather woman of india' भी कहा जाता है.

dr. aditi pant (oceanographer):

1983 में जब अंटार्कटिका जाना किसी सपने जैसा था, तब वहां कदम रखने वाली ये पहली भारतीय महिला बनीं. भारत के तीसरे अंटार्कटिक मिशन के दौरान इन्होंने माइनस डिग्री तापमान में समुद्र की गहराइयों के डेटा को डिकोड किया, जिससे भारत को वहां 'दक्षिण गंगोत्री' बेस बनाने में मदद मिली.

tessy thomas (scientist):

'missile woman of india.' 1988 में drdo जॉइन करने के बाद इन्होंने agni-IV और agni-V जैसे बड़े मिसाइल प्रोजेक्ट्स की कमान संभाली. ये भारत की पहली महिला हैं जिन्होंने किसी मिसाइल प्रोजेक्ट को लीड किया और दुनिया को दिखाया कि 'रॉकेट साइंस' पर किसी एक जेंडर का कॉपीराइट नहीं है.

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tessy thomas Photograph: (x)

the og rebels

इन महिलाओं ने society के उन रूल्स को डिलीट किया जो अब आउटडेटेड हो चुके थे. इनका struggle आज के ऑनलाइन एक्टिविज्म से कहीं ज्यादा मुश्किल और रिस्की था.

dr. rakhmabai (physician & feminist):

11 साल में हुई शादी को 1884 में 'ना' कहने का जो जिगरा इन्होंने दिखाया, उसी से 1891 के 'age of consent act' की नींव पड़ी. बाद में 1894 में लंदन से डॉक्टर बनकर लौटीं और अपनी पूरी लाइफ महिलाओं के मेडिकल ट्रीटमेंट और पर्दा प्रथा के खिलाफ लड़ने में लगा दी.

fatima sheikh (educator):

1848 में सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर इन्होंने लड़कियों के लिए भारत का पहला स्कूल खोला. जब समाज ने फुले परिवार को घर से निकाल दिया, तब फातिमा और उनके भाई उस्मान शेख ने उन्हें अपने घर में पनाह दी. पहली मुस्लिम महिला टीचर, जिन्होंने बिना किसी शोर के असली हीरो की तरह काम किया!

c.b. muthamma (diplomat):

1949 में भारत की पहली महिला ifs ऑफिसर बनीं. इन्होंने उस discrimination वाले नियम को 1979 में सुप्रीम कोर्ट में घसीटा जिसमें महिला अफसरों को शादी के लिए सरकार से परमिशन लेनी पड़ती थी. जस्टिस कृष्णा अय्यर के साथ मिलकर इन्होंने ब्यूरोक्रेसी के पुराने जेंडर रूल्स को ही हैक कर दिया.

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c.b. muthamma Photograph: (x)

कैमरा और इतिहास का दबदबा

इनके पास हुनर का वो बेजोड़ अंदाज़ था जिसने दुनिया को अपना कायल बना लिया और आर्ट के क्षेत्र में जेंडर की दीवारों को धूल चटा दी.

homai vyarawalla (photojournalist):

'dalda 13' के नाम से famous भारत की पहली महिला photo journalist. 1938 में करियर शुरू किया और 1970 तक आज़ादी की हर बड़ी याद चाहे वो नेहरू की सिगरेट जलाती तस्वीर हो या गांधी जी की विदाई, इन्हीं के लेंस की पैदाइश है. 2011 में इन्हें पद्म विभूषण से नवाजा गया.

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homai vyarawalla

sharan rani (musician):

'queen of sarod.' सरोद को सदियों तक सिर्फ मर्दों का instrument माना गया, पर शरान ने उसे अपनी उंगलियों पर नचाया. ये पहली महिला सरोद वादक थीं और इन्होंने 450 से ज्यादा दुर्लभ म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट्स नेशनल म्यूजियम को दान किए. that's pure legacy!

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sharan rani

8 मार्च की स्टोरीज और पोस्ट्स के शोर में ये नाम कहीं दबने नहीं चाहिए. 

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किस्सा कोताह ये है कि इन 10 महिलाओं ने हमारे लिए वो रास्ता बनाया है जिस पर आज की पीढ़ी आज़ादी से चल पा रही है. विमेंस डे का मतलब सिर्फ एक दिन का सेलिब्रेशन नहीं, बल्कि उन 364 दिनों की मेहनत को समझना है जो अक्सर अनदेखी रह जाती है.

असली रिस्पेक्ट पोस्ट करने में नहीं, इन कहानियों के मर्म को समझने और उस महिला का हाथ बंटाने में है जो बिना किसी शोर के दुनिया बदल रही है.

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तो इस बार जब happy women’s day का मैसेज टाइप हो, तो make sure कि respect सिर्फ स्क्रीन की पिक्सेल तक limited न रहे बल्कि उस सोच में झलके जो society को बदलती है.

फेमिनिज्म सिर्फ़ बराबरी की मांग नहीं है, ये उस हर औरत के वजूद का जश्न है जो टूटकर भी खुद को और अपने परिवार को जोड़ना जानती है.

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shivani doesn’t seek a title to fill a room. she is a quiet observer trying to understand the world. She wishes to be like rain falling on the sea, a quiet addition to a vast mystery. believing the best stories live between facts and feelings rather than in headlines, she writes about the invisible ways the world softens or breaks us. she isn't an expert at a finish line, but a traveler on the road, writing with a heart wide open to questions even when answers are few.