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women's day के मौके पर जब महिलाओं के होने को celebrate किया जा रहा होता है, तो अक्सर एक सवाल मन में आता है कि क्या सच में इस खास दिन का कोई मतलब है या फिर ये symbolic ही बनकर रह गया है.

womens day special

पूरी दुनिया का वजूद किस एक चीज पर टिका है? कुछ सेकेंड लो और सोचो....सोच लिया? दिमाग में क्या आया? peac, love, non violence वाले बड़े-बड़े vibes? सही है. लेकिन इतना overthink मत करो. असली जवाब थोड़ा micro है. मैं बता देता हूं. असल में पूरी दुनिया का गेम एक छोटे से फूल और छोटी सी मधुमक्खी या तितली पर टिका है.

ये छोटी-छोटी जानें ज़िंदगी भर दो फूलों के बीच की distance कम करती रहती हैं. मेल फूल का पराग फीमेल फूल तक पहुंचाती हैं. और उसी से पैदा होता है हमारे खाने-पीने का बड़ा स्टॉक.

nature की og engineering

ये है नेचर की og इंजीनियरिंग. ai के आने से हजारों-लाखों-करोड़ों साल पहले की टेक्नोलॉजी. नेचर… जो दिखती कम है, feel ज्यादा होती है. उसने एक बेसिक रूल सेट किया कि उसकी दुनिया में कोई भी जान छोटी नहीं होगी. हर एक का रोल है.

अब सवाल ये है कि जब सब कुछ इतना इटर्नल है, तो 1977 में एक इटर्नल चीज को ऑफिशियली मान्यता देने की जरूरत क्यों पड़ी?

international women's day और मधुमक्खी-तितली connection

यूएन को इंटरनेशनल वीमेन्स डे को ऑफिशियली रिकग्नाइज करना पड़ा. क्यों? क्योंकि दुनिया में औरतों की हालत ऐसी थी, या है… कि एक दिन अलग से बोलना जरूरी था कि हां, महिलाएं भी इंसान हैं. उनमें भी जान है.

थोड़ी देर पहले फूल और मधुमक्खी की बात हुई थी. डायरेक्ट कनेक्शन नहीं है महिलाओं से. लेकिन एक वाइब कनेक्शन तो है. वही छोटा सा लेकिन सुपर इंपॉर्टेंट रोल वाला कनेक्शन. हर women's day को सोशल मीडिया में खूब रील्स, पोस्ट आती हैं लेकिन सीन वही… ढाक के तीन पात. सब कुछ सिम्बॉलिक.

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womens day
womens day Photograph: (ai)

women's day सिर्फ़ symbolic है?

लेकिन ये सब symbolic लगता है. जैसे restaurant के बाहर burger की वो फोटो जो असल में फोटोशॉप का चमत्कार होती है. खरीदो तो पता चलता है असली गेम तो फोटोग्राफर का था. थर्माकॉल, आलू, प्लास्टिक, परफेक्ट लाइटिंग… और हम बोले वाह.

क्यों सिम्बॉलिक? जवाब है डेटा. और डेटा कभी-कभी बहुत अनकंफर्टेबल होता है. ncrb का 2022 डेटा कहता है कि हर घंटे 51 महिलाओं के साथ कुछ गलत हो रहा है.

51 सुनकर अजीब लगा? क्योंकि ये फुल पिक्चर नहीं है. ये सिर्फ रिपोर्टेड केस हैं. अनरिपोर्टेड वाली फाइल तो खुलती ही नहीं. रोज़ बाज़ार, घर, स्कूल, ऑफ़िस में बहुत कुछ ऐसा होता है जो एक्सट्रीम लेवल पर घिनौना है. लेकिन वो आंकड़ों में नहीं आता.

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महिलाएं क्यों ज़रूरी हैं?

महिलाएं क्यों जरूरी हैं. क्यों होनी चाहिए दुनिया में? ऐसा क्या है कि इनके बिना दुनिया चल नहीं सकती. साइंस तो आगे भाग रही है. फ़्यूचर में शायद कोख की जरूरत भी न पड़े. टेस्ट ट्यूब बेबी ऑप्शन तो पहले से है.

ये सवाल उनका हो सकता है जो महिलाओं को सेकेंड क्लास सिटिजन समझते हैं. जवाब वही है जो पहले कहा था. नेचर की इंजीनियरिंग. यहां कोई मशीन नहीं, कोई टूल नहीं. यहां सिर्फ रिस्पेक्ट, लव और अफ़ेक्शन है. और जब ये टॉप प्रायोरिटी पर हों, तो फिजिकल ताकत मायने नहीं रखती.

जरा इमेजिन करो एक दुनिया जहां सब कुछ पहले जैसा है, लेकिन किसी बच्ची की हंसी नहीं है. बहन नहीं है. मां नहीं है. कोई ऐसा नहीं जिसके कंधे पर सिर रख सको. कैसी लगेगी वो दुनिया?

womens day special
womens day special Photograph: (ai)

matrubhoomi a nation without women

अगर सच में जानना है, तो bollywood film 'मातृभूमि अ नेशन विदाउट वीमेन' ज़रूर देख लो. 2003 में आई इस फिल्म में डिस्टोपियन इंडिया की कहानी है. 

डिस्टोपिया मतलब ऐसा फ्यूचर जहां सब गड़बड़ हो चुका है. इस दुनिया में महिलाएं नहीं हैं. जैसे किसी ने उन्हें सिस्टम से डिलीट कर दिया हो. वजह वही घटिया सोच कि महिलाएं कमज़ोर हैं.

अब बची है सिर्फ टॉक्सिक मर्दानगी. भाइयों को नहीं पता बहन क्या होती है. बाप को नहीं पता बेटी क्या होती है. पति का कॉन्सेप्ट ही खत्म. जो लोग अपोजिट जेंडर की तरफ अट्रैक्ट होते हैं, वो अजीब रास्ते खोज रहे हैं अपनी फ्रस्ट्रेशन दूर करने के.

ट्विस्ट तब आता है जब अचानक एक लड़की किसी लुप्तप्राय स्पीशीज की तरह मिलती है. जैसे पोस्ट-एपोकैलिप्टिक मूवी में आखिरी पेड़ दिख जाए. उसका पिता उसे छुपाकर रखता है. उसे पता है ये फ्रस्ट्रेशन भरी दुनिया उसकी बेटी को निगल जाएगी.

लेकिन एंट्री होती है गरीबी और स्वार्थ की. पिता अपनी हालत को बेटी से ऊपर रखता है. और उसे बेच देता है. दूसरा पिता उसे अपने पांच बेटों के लिए खरीदता है. सब कुछ समाज के बनाए नियमों के अंदर. लाल जोड़ा, सात फेरे… सब नॉर्मल पैकेजिंग में.

फिर शुरू होता है वो सब जो देखकर स्क्रीन से नजर हटाने का मन करता है. पांचों भाइयों में रेस लगी है कि पहली रात कौन जाएगा. और तभी कहानी में एंटर करता है असली प्लॉट ट्विस्टर… लड़की का ससुर.

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writer ने समझाया असली डर

राइटर यहां पूरा गेम फ्लिप कर देता है. वो पिता बेटों से पहले खुद बहू के साथ पहली रात बिताना चाहता है. उसकी भूख इतनी डरावनी है कि सीन देखते वक्त सिर पकड़ने का मन करता है. वो रोता है, इमोशनल ड्रामा करता है, बच्चों को गिल्ट ट्रिप पर भेज देता है. बच्चे टूट जाते हैं.

आखिर में वही बाप अपना हक ले लेता है. रोकर, गिड़गिड़ाकर, हर ट्रिक यूज करके. उसके चेहरे की हैवानियत किसी हॉरर विलेन से कम नहीं लगती. फिल्म में कोई क्लियर हीरो नहीं, कोई क्लियर विलेन नहीं. सब ग्रे. बस शेड अलग-अलग.

अब फिर सोचो, लड़कियां नहीं होंगी तो दुनिया कैसी होगी. डायरेक्टर मनीष झा को ये आइडिया तब आया जब उन्होंने गुजरात के एक ऐसे गांव के बारे में पढ़ा जहां महिलाएं नहीं थीं. रिसर्च इतनी डीप कि फिल्म एक थीसिस जैसी लगती है.

butterfly
butterfly effect Photograph: (envato)

butterfly effect भी समझ लो

बटरफ्लाई इफ़ेक्ट को फिल्म ऐसे समझाती है जैसे कोई थ्रेड खोलते-खोलते पूरा सिस्टम एक्सपोज कर दे. ऐसा तो खुद केयॉस थ्योरी देने वाले मैथमैटीशियन एडवर्ड लॉरेन्ज भी नहीं समझा पाए थे. एक छोटा सा फैसला और उसका असर बहुत दूर तक.

फॉर एग्जैम्पल 12वीं का एक लड़का है जो कॉलेज जाना चाहता है, लेकिन क्लास में बंक मारता है. पढ़ाई नहीं करता. रिजल्ट आता है तो फेल हो जाता है. फेल हुआ तो कॉलेज नहीं गया.

अब इसके पीछे की असली वजह क्या है कि वो कॉलेज नहीं जा पाया तो सीधा सा जवाब है कि वो फ़ेल हो गया. पर यहां भी एक पेंच है.

असल में फेल होने की वजह से उसका कॉलेज का सपना नहीं टूटा. बल्कि इसलिए टूटा क्योंकि उसने क्लास बंक किए थे. वहीं से फे़लियर की पूरी चेन शुरू हो गई. यानी एक छोटा सा फैसला और बहुत बड़ा नतीजा.

बिल्कुल वैसे ही लड़कियों को दोयम समझने की सोच से शुरू हुआ सफर आखिर में किस लेवल की तबाही तक पहुंचता है, ये फिल्म बिना चिल्लाए दिखा देती है. ख़ैर बात फ़िल्म की थी ही नहीं, बात थी उन फूलों और मधुमक्खियों को बचाने की जो दुनिया संभाल कर रखती हैं. फ़िल्म तो बस एक सटीक उदाहरण भर थी.

राहत की बात ये है कि ये रियल फ्यूचर नहीं है. बेबी बूमर्स से मिलेनियल्स और फिर Gen Z तक एक चीज आई है. अवेयरनेस. सवाल पूछने की हिम्मत. और Gen Z तो फुल ऑन कॉल आउट मोड में है. सिस्टम से सवाल कर रही है. तो उम्मीद है कि अगली बार जब एनसीआरबी का डेटा आए, तो उसमें ये ट्रेंड साफ दिखे कि क्राइम अगेंस्ट वीमेन जीरो की तरफ मूव कर रहे हैं. यही असली सेलिब्रेशन होगा.

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