22 फरवरी 2026 को तेलंगाना के आसिफाबाद में देश के सबसे टॉप नक्सली कमांडर देव जी ने सरेंडर किया. ये सरेंडर बंदूक की नोक पर नहीं बल्कि emotional तरीके से हुआ. देवजी एक ऐसा नक्सली कमांडर था जिससे जंगल का पत्ता-पत्ता कांपता था.
40 सालों से देवजी पुलिस की आंखों में धूल झोंक रहा था. 40 साल तक देश में नक्सलवाद का सबसे बड़ा चेहरा रहे देव जी की एक फोटो तक पुलिस के पास नहीं थी. जो भी तस्वीरें थी, उनमें देव जी को पहचाना भी नहीं जा सकता था. न ही किसी ने उसे करीब से देखा था. लेकिन, वो पुलिस की हिट लिस्ट में था. देव जी के ऊपर ढाई करोड़ का इनाम था.
वो जंगलों में घूमता, नए लड़कों को भर्ती करता और बड़े हमलों की प्लानिंग बनाता था, लेकिन कभी कोई सुराग पीछे नहीं छोड़ता था. देव जी को तकनीक की भी अच्छी जानकारी थी. उसने नक्सलियों को सिखाया कि कैसे ड्रोन, जीपीएस और एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग का इस्तेमाल किया जाता है.
कितना खूंखार था देवजी
देव जी पर 131 जवानों की हत्या का आरोप था. 6 अप्रैल 2010 को छत्तीसगढ़ के ताड़मेटला में नक्सलियों ने सीआरपीएफ की एक पूरी कंपनी को घेर लिया और गोलियां बरसाईं. इस हमले में 76 जवान मारे गए थे.
ये जवानों पर हुआ अब तक का सबसे बड़ा हमला माना जाता है. इस हमले का ब्लूप्रिंट देवजी ने ही तैयार किया था. इसके अलावा 15 मार्च 2007 को रानीबोदली में हुए हमले में 55 जवान शहीद हुए थे. इस हमले की प्लानिंग भी देव जी ने की थी.
धीरे-धीरे देव जी देश का सबसे बड़ा नक्सली बन गया. जिसे पकड़ने के लिए सुरक्षा बलों ने कई नाकाम कोशिशें की थीं. एक समय के बाद तो ये भी लगने लगा था कि देव जी अब कभी नहीं पकड़ा जाएगा. लेकिन, तभी सीन में एंट्री होती है 2005 बैच की आईपीएस बी सुमति की. उन्होंने देवजी की फाइल को बंदूकों के दम पर नहीं, उसके इमोशनल कनेक्शन के जरिए खोलना शुरू किया.
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बी सुमति ने ऐसे कराया सरेंडर
बी सुमति की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है. उनका जन्म तेलंगाना के जोगुलंबा गद्वाल जिले में हुआ था. 10 अक्तूबर 1975 को. पिता 10 सालों तक गांव के सरपंच रहे, लेकिन जीवन की सबसे बड़ी inspiration दादी बनीं. दादी चाहती थीं कि सुमति पुलिस अधिकारी बनें और दादी की ज़िद पर सुमति को महज 4 साल की उम्र में कॉन्वेंट स्कूल भेज दिया गया.
कॉन्वेंट स्कूल से पढ़ाई और फिर ग्रेजुएशन के बाद साल 2001 में सुमति ने पहले ही अटेंप्ट में स्टेट सिविल सर्विस को क्रैक किया और अनडिवाइडेड आंध्र-प्रदेश की पहली महिला डीएसपी बनीं. उनके शानदार काम की बदौलत साल 2005 में उन्हें ips कैडर मिल गया.
बी सुमति का पूरा करियर पॉवर से ज्यादा patience और empathy के लिए जाना जाता है. उन्होंने हमेशा माना कि पुलिस का काम सिर्फ डंडा चलाना नहीं बल्कि सोसायटी के साथ एक कनेक्शन बनाना है. लंबे समय तक sp के तौर पर वो counter-intelligence cell में रहीं, जहां उन्होंने indian mujahideen और lashkar-e-taiba जैसे संगठनों के खिलाफ काम किया.
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emotional strategy आई काम
बी सुमति ने देखा कि बड़े एनकाउंटर्स और बड़े नक्सलियों के सरेंडर के बावजूद देव जी बाहर नहीं आ रहा है. उन्होंने strategy बदली और जासूसी नेटवर्क छोड़कर इंसानी नेटवर्क बनाया.
उन्हें पता चला कि देश का सबसे खूंखार नक्सली असल में एक बीमार व्यक्ति भी है. देव जी की पत्नी भी बीमार है. सालों से अपने पति की एक झलक देखने को तरस रही है. सुमति ने डंडा छोड़ा और पहुंच गईं देवजी के परिवार के पास.
उन्होंने उन्हें डराया नहीं, बल्कि ये यकीन दिलाया कि देवजी का असली ठिकाना ये जंगल नहीं, उसका परिवार होना चाहिए. उन्होंने promise किया कि अगर देवजी वापस आता है, तो उसे बेहतरीन इलाज और सम्मान के साथ जीने का मौका दिया जाएगा.
महीनों तक ये साइलेंट ऑपरेशन चला. बी सुमति ने देवजी और पुलिस के बीच भरोसे का एक ऐसा पुल बनाया, जिसे सालों की दुश्मनी भी नहीं तोड़ पाई़. फिर 22 फरवरी 2026 को 44 साल तक पुलिस के हाथ न आने वाला देवजी, अपने हथियार छोड़ कर चुपचाप आईपीएस बी सुमिति के सामने आ खड़ा हुआ. कोई एनकाउंटर नहीं, कोई खून-खराबा नहीं.
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बी सुमति का स्वैग
बी सुमति फिलहाल तेंलंगाना में स्पेशल इंटेलीजेंस ब्यूरो की इंचार्ज हैं. उनके sib की इंचार्ज रहते हुए 500 से ज़्यादा नक्सलियों ने mainstream में वापसी की है. साल 2026 में उन्हें पुलिस मेडल से सम्मानित भी किया गया. आईपीएस बी सुमति ने दुनिया को दिखाया कि एक ऑफिसर की सबसे बड़ी ताकत उसकी गन नहीं, बल्कि उसकी empathy होती है.
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