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शहरों में independent women के लिए घर ढूंढना अभी भी एक मेजर स्ट्रगल है. सोसाइटी का पुराना माइंडसेट, बैचलर टैबू और आइडेंटिटी क्राइसिस पर बेस्ड ये आर्टिकल हाउस हंटिंग की कड़वी सच्चाई को अनफिल्टर्ड दिखाता है.

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इमैजिन करो तुम्हें तुम्हारा ड्रीम कॉलेज मिल गया, या किसी कूल सिटी में जॉब लग गई. पैकिंग डन है, वाइब सेट है, बस अब शिफ्ट करना बाकी है. सॉर्टेड, राइट? बट ब्रो, असली 'क्लेश' तो अब शुरू हुआ है. आज की वीमेन इंडिपेंडेंस के लिए शहरों में मूव तो कर रही हैं, लेकिन बॉस house hunt आज भी किसी फाइट से कम नहीं है.

सोसाइटी का टॉक्सिक माइंडसेट 

कई वीमेन का कहना है कि असली प्रॉब्लम घर की नहीं, बल्कि सोसाइटी के पुराने माइंडसेट की होती है. अकेली रहने वाली वीमेन को फ्लैट देखने के दौरान ऐसे 'अनकम्फर्टेबल' सवालों का सामना करना पड़ता है जैसे वो रेंट एग्रीमेंट नहीं, बल्कि अपनी पूरी लाइफ की कुंडली दे रही हों. शादी कब होगी?, लेट नाइट क्यों आती हो?, क्या मेल फ्रेंड्स का आना-जाना है? ये सवाल नॉर्मल इन्क्वायरी नहीं, बल्कि प्राइवेसी में सीधा दखल महसूस होते हैं.

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बैचलर होने का टैबू

जैसे ही आप कहो कि आप बैचलर हो, आधे दरवाजे तो वहीं बंद हो जाते हैं. हम जेंडर इक्वलिटी की रील तो बना लेते हैं, पर क्या रियलिटी वैसी है? मीडिया प्रोफेशनल उत्कर्षा अपना एक्सपीरियंस शेयर करते हुए बताती हैं, 'जब मेरी भोपाल में जॉब लगी, तो लैंडलॉर्ड ने लिटरली कहा कि एक बॉयफ्रेंड है तो ठीक है, उससे ज्यादा हुए तो फ्लैट नहीं मिलेगा. उन्होंने ये भी कंडीशन रखी कि रात 8 बजे गेट लॉक हो जाएगा, तो अपनी जॉब टाइमिंग्स उसी हिसाब से देख लेना.' like, seriously?

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आइडेंटिटी पर अटैक

ये डिस्क्रिमिनेशन सिर्फ जेंडर तक नहीं रुकता, अब इसमें कास्ट और रिलीजन का एंगल भी जुड़ गया है. लखनऊ में वर्किंग बुशरा शाहिद ने बताया कि उन्हें सिर्फ इसलिए मना कर दिया गया क्योंकि वो मुस्लिम हैं. कुछ ब्रोकर्स ने तो उन्हें अपनी आइडेंटिटी तक छुपाने की सलाह दी ताकि वो एक्सेप्टेड दिख सकें. वो कहती हैं, "एक ब्रोकर ने मुझे खुद को हिंदू दिखाने को कहा." हालांकि, नोएडा के रियल एस्टेट एजेंट विवेक जैसे लोग भी हैं जो मानते हैं कि वर्किंग वीमेन ज्यादा डिसिप्लिन्ड और रेंट को लेकर सॉर्टेड होती हैं.

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फ्रीडम और डिग्निटी की तलाश

आज की gen z वीमेन सिर्फ फ्लैट नहीं ढूंढ रहीं, बल्कि रिस्पेक्ट और मेंटल पीस चाहती हैं. उनके लिए हाउस हंटिंग अब सिर्फ एक जरूरत नहीं, बल्कि सेल्फ-रिस्पेक्ट का मुद्दा है. शहर मॉडर्न हो रहे हैं, वीमेन फाइनेंशियली इंडिपेंडेंट हो रही हैं, लेकिन हाउसिंग को लेकर सोच अभी भी 'बूमर' एरा' में अटकी है. जब तक सोसाइटी वीमेन को एक 'रिस्क' के बजाय एक 'इक्वल रेजिडेंट' की तरह नहीं देखेगी, तब तक ये स्ट्रगल खत्म नहीं होगा.

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supriya srivastava is a dedicated media professional with a deep-seated passion for impactful storytelling. Her journey in journalism began with contributing insightful articles on social issues and current affairs to monthly magazines. currently, supriya serves as a dynamic anchor and producer at zingabad. driven by the belief that media is a vital tool for inspiration and change, she continues to bridge the gap between complex information and public engagement through her versatile skill set.