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जब घर का माहौल चिल होने के बजाय toxic authority वाला होता है, तब बच्चे ओबेडिएंट नहीं बल्कि मैनिपुलेटर बन जाते हैं. क्या आप अनजाने में अपने बच्चे की क्रिएटिविटी को सिर्फ कहानियां कुक-अप करने में लगा रहे हैं?

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कई बार हमारे आसपास ऐसे बच्चे होते हैं जो शायद कुछ गलत नहीं कर रहे होते, पर वो ऐसी सिचुएशन में फंस जाते हैं कि उन्हें झूठ बोलना ही पड़ता है. जैसे एक बच्चा जो अपने दोस्त के घर स्कूल या कोचिंग के बाद पढ़ाई करने गया, पर घर आकर झूठ बोल देता है कि "मम्मी, कोचिंग लेट खत्म हुई." अब सवाल ये है कि उसने झूठ क्यों बोला? वो तो एक्चुअली पढ़ाई ही कर रहा था, कोई मस्ती तो नहीं, फिर भी उसने सीधे-सीधे क्यों नहीं कहा? इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह पेरेंट्स का स्ट्रिक्ट होना हो सकता है.

देखिए, बच्चे बहुत ही नाज़ुक होते हैं, उनकी पेरेंटिंग सही तरीके से होना सुपर इम्पोर्टेन्ट है. अगर बच्चे ने पहली बार झूठ बोला और आपने उसे पकड़ लिया, तो उस पर चिल्लाने से कोई फायदा नहीं होगा. वो बच्चा आगे चलकर उस झूठ को छिपाने के लिए और भी झूठ बोलेगा. लेकिन इसी सिचुएशन में अगर आपने उसे प्यार से समझाया कि झूठ बोलना कितना गलत है, तो वो बात उसे हिट करेगी और वो आगे से झूठ नहीं बोलेगा.

स्ट्रिक्ट पेरेंटिंग का रिवर्स असर

आजकल कई पेरेंट्स को लगता है कि बच्चे को परफेक्ट बनाना है तो स्ट्रिक्ट होना पड़ेगा. फिर शुरू होता है डांट और स्ट्रिक्ट रूल्स का सिलसिला. लेकिन अक्सर इसका उल्टा असर होता है. स्ट्रिक्ट पेरेंटिंग में बच्चों की हर गलती पर डांट या सज़ा मिलती है. ऐसी सिचुएशन में बच्चों की बात या उनकी फीलिंग्स को सुना ही नहीं जाता. बच्चा क्या चाहता है, ये समझने के बजाय बस फैसले सुना दिए जाते हैं. ऐसे में बच्चे को लगता है कि "सच बोलना सेफ नहीं है," और वो खुद को बचाने के लिए झूठ का सहारा लेता है.

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बच्चे झूठ क्यों बोलते हैं? 

  • डांट और सज़ा का डर: बच्चों को लगता है कि सच बोलने पर रिएक्शन खराब होगा, इसलिए वो खुद को प्रोटेक्ट करने के लिए झूठ बोलते हैं.
  • पेरेंट्स को अपसेट न करना: कई बच्चे इसलिए झूठ बोलते हैं ताकि उनके मम्मी-पापा उनसे हैप्पी रहें. उन्हें डर होता है कि सच जानने पर वो नाराज़ हो जाएंगे.
  • ज़्यादा रोक-टोक और कंट्रोल: हर टाइम की निगरानी से बच्चा परेशान हो जाता है. ऐसे में झूठ बोलना उसे थोड़ी पर्सनल स्पेस और आज़ादी देता है.

समझदारी vs सख़्ती

इसलिए कहा जाता है कि बहुत ज़्यादा स्ट्रिक्ट पेरेंट्स अक्सर बेस्ट लायर्स तैयार कर देते हैं. जब बच्चों को हर बात पर डर और जजमेंट का सामना करना पड़ता है, तो उन्हें सच बोलना रिस्की लगता है. असल में, हद से ज़्यादा सख़्ती बच्चों को ओबेडिएंट नहीं, बल्कि 'प्रो-लेवल मैनिपुलेटर' बना देती है. अगर घर का माहौल चिल नहीं होगा, तो बच्चे अपनी गलतियों को सुधारने के बजाय अपनी 'हिस्ट्री डिलीट' करने और कहानियां  कुक-अप करने में ही अपनी सारी क्रिएटिविटी लगा देंगे.

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अगर हम वाकई चाहते हैं कि बच्चे ऑनेस्ट बनें, तो हमें 'टॉक्सिक ऑथोरिटी' छोड़कर उनके लिए एक सेफ स्पेस बनना होगा. स्ट्रिक्टनेस डिसिप्लिन नहीं, बल्कि सिर्फ़ फेक वाइब्स पैदा करती है. sirf हेल्दी कन्वर्सेशन और ट्रस्ट ही बच्चों को बिना डरे सच बोलना सिखाता है." वो क्या कहते हैं," कम्युनिकेशन इज़ द की."

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supriya srivastava is a dedicated media professional with a deep-seated passion for impactful storytelling. Her journey in journalism began with contributing insightful articles on social issues and current affairs to monthly magazines. currently, supriya serves as a dynamic anchor and producer at zingabad. driven by the belief that media is a vital tool for inspiration and change, she continues to bridge the gap between complex information and public engagement through her versatile skill set.