sahreen profile imagesahreen

मनमोहनदास देसाईं इंडियन सिनेमा के एक ऐसे डायरेक्टर थे, जिन्होंने फिल्मों में लॉजिक नहीं इमोशन को डाला और एक के बाद एक हिट दीं. उनकी ज़िंदगी भी उनकी फिल्मों की तरह ड्रामेटिक रहा.

manmohan desai

साल 1977... इंडियन सिनेमा में एक unprecedented revolution हो रहा है. लगभग सभी सिंगल स्क्रीन थिएटर हॉल में housefull का बोर्ड लगा है और अंदर चल रही है एक करिश्माई फ़िल्म... वो फिल्म जिसने अनहोनी को होनी कर दिखाया.  

इसके title credits एक ख़ास जगह आते हैं. एक हॉस्पिटल के सीन में, एक बूढ़ी औरत है. ज़िंदगी और मौत के बीच बफर कर रही है. स्क्रीन पर लगे हैं तीन बेड... उन पर लेटे हैं, उस era के तीन superstars. तीनों की नसों से खून निकल रहा है, एक कांच की बोतल में mix and match हो रहा है और बिना किसी क्रॉस-चेकिंग के सीधे उस बूढ़ी औरत की बॉडी में जा रहा है. बैकग्राउंड में गाना चल रहा है, जिसके लिरिक्स है- ‘यह सच है कोई कहानी नहीं, खून-खून होता है पानी नहीं’.

इस सीन को देखने के बाद मेडिकल साइंस ने rage quit कर दिया, physics कहीं कोने में बैठकर रो रही थी और लॉजिक? लॉजिक को तो ये सीन देखने के बाद 11 मुल्कों की पुलिस भी नहीं ढूंढ पाई. बाद के सालों में क्रिटिक्स ने इस सीन का खूब मज़ाक़ उड़ाया. बड़े-बड़े आर्टिकल्स लिखे गए कि ये सीन कितना absurd और delusional है. इसे ridiculous, सर्कस सिनेमा  और ना जाने क्या-क्या label मिला. 
 
लेकिन यहां ऑडियंस का क्या सीन था? audience थिएटर में खड़ी होकर तालियां बजा रही थी. लोग रो रहे थे, सीटियां भी मार रहे थे. किसी को फर्क नहीं पड़ा कि ये possible है या नहीं. फर्क सिर्फ़ इस बात से पड़ा कि ये सीन उन्हें कैसा feel करा रहा है और यही वो मोमेंट था, जिसने इंडियन सिनेमा का पूरा syllabus बदल दिया. इस chaos के architect को पता था public को क्या चाहिए. उन्होंने logic को mute किया और audience को वो vibes दीं, जो इंडस्ट्री ने पहले कभी imagine भी नहीं की थी. 

इंडियन सिनेमा को कर डाला चेंज

हम एक ऐसे डायरेक्टर की बात कर रहे हैं, जिसने अपनी main character एनर्जी से इंडियन सिनेमा को हमेशा के लिए चेंज कर दिया, उनका नाम है... मनमोहन देसाई. 1947 के बाद का इंडिया सिर्फ़ independent ही नहीं था. वो emotionally burnout भी था. partition, poverty, unemployment और सिस्टम का स्लो पेस. ये सब उस era की harsh reality थी. लोगों की ज़िंदगी में stability नहीं थी, certainty नहीं थी और justice अक्सर delayed या denied था. 

इंडियन सिनेमा भी उसी mood में था. थोड़ा sober, थोड़ा serious और full-on socially conscious. सिनेमा सोसाइटी का आईना बना हुआ था और ऐसा मीडियम था, जो इन सभी टॉपिक्स को बड़े artistic way में शो करता था. 1950s और 60s में filmmakers ऐसी फिल्में बना रहे थे, जो डीप थीं, poetic थीं, socially responsible थीं. फिर चाहे वो गुरु दत्त की 'प्यासा' हो, जिसमें सोसाइटी की टॉक्सिक बेरुखी थी या राज कपूर की 'श्री 420' का innocent स्ट्रगल. mother india में राधा अपने ही बेटे को गोली मार देती है. क्योंकि moral law की supremacy है.
 
ये फ़िल्में masterpeace थीं, no caps, लेकिन ये ऑडियंस से एक इमोशनल होमवर्क डिमांड करती थीं. ये movies ऑडियंस को सोचने पर मजबूर करती थीं और लोग पहले ही overthinking के विक्टिम थे. ऑडियंस को इन सबसे एक ब्रेक चाहिए था. उन्हें एक ऐसा हीरो चाहिए था, जो सिस्टम से beef ले सके और ऐसी दुनिया जहां एंडिंग हमेशा happy हो. इसी खाली स्लॉट को भरने के लिए एंट्री होती है मनमोहन देसाई की, जो अपने radical ideas से इस सोबर सिनेमा का glow up करने वाले थे. 

मनमोहन देसाई की लाइफ 

मनमोहन देसाई का जन्म 1937 में एक proper film family में हुआ. उनके father किकुभाई देसाई पैरामाउंट स्टूडियो के ओनर थे और मोस्टली स्टंट फ़िल्में बनाते थे. मनमोहन देसाई या एमडी का बचपन फिल्मी सेट्स के बीच ही बीता था और सिनेमा उनके dna का हिस्सा था. जब वो सिर्फ 4 साल के थे, तब उनकी लाइफ का canon event आया. उनके पिता की डेथ हो गई. इससे उनकी फैमिली की economic condition काफी low हो गई थी. 

md की upbringing मुंबई के गिरगांव की चॉल्स में हुई, जहां real middle-class india रहता था. यहीं उन्होंने नोटिस किया कि एक आदमी जो दिन भर पसीना बहाता है, वो शाम को फ़िल्म में philosophy लेक्चर या reality नहीं देखना चाहता, उसे चाहिए escape, pure, guilt-free escape. यही बाद में उनकी कोर philosophy बनी. उनके बड़े भाई सुभाष देसाई भी producer थे. उन्होंने ही एमडी को पहला ब्रेक दिया. साल 1960 में फ़िल्म 'छलिया' से. md उस वक्त सिर्फ 23 साल के थे और उनके सामने चैलेंज था राज कपूर और नूतन जैसे established लेजेंड को डायरेक्ट करना. 

जब राज कपूर हो गए थे एमडी के फैन

इसी फिल्म की शूटिंग के टाइम राज कपूर और एम डी के बीच एक गाने पर creative difference का issue हुआ. इतना बड़ा कि राज कपूर उन्हें फिल्म से निकालने वाले थे, लेकिन जब ये गाना आया और राज कपूर ने इसे देखा तो वो खुद एमडी के फैन हो गए थे. यही ट्रैक बाद में उस era के सबसे memorable गानों में से एक बना. गाना था ‘डमडम डिगा डिगा’ फिल्म हिट हुई और एमडी के career ने ग्रोथ पकड़ी. 

md का vision insanely based था. उन्होंने उस टाइम के cinema os को uninstall किया और अपना custom os launch किया. इस नए सिस्टम में उन्होंने सिनेमा को आर्ट की जगह एक थीम पार्क की तरह ट्रीट किया. वो फिल्मों को rides की तरह design करते थे, जिसमें सभी एलिमेंट्स होते थे. पहले comedy का ride, फिर emotional dip, फिर आता था action का loop और फिर song का colourful distraction. उनके os में smooth transition important नहीं था, important था कि audience bore न हो. 
इसी वजह से क्रिटिक्स उन्हें सर्कस वाला कहते थे और देसाई एक gigachad की तरह जवाब देते थे "हां, बिल्कुल मेरा सिनेमा सर्कस है और देखो मेरे सारे टिकट्स sold out' हैं.

ये भी पढ़ें: history repeats: israel ने egypt में मचाई थी ऐसी तबाही, बदल गया था world map

एमडी का खास चीट कोड

एमडी की मूवीज के constant हिट होने की वजह थी उनका एक खास चीट कोड, जो पब्लिक को बेहद पसंद था. यह सिर्फ एक कोड ही नहीं था, बल्कि उस एरा का सबसे पोपुलर ट्रेंड भी बना. यह hashtag था lost and found + coincidence का. चाहे कुंभ का मेला हो, तूफान आए या thanos का स्नैप हो जाए, एमडी के यूनिवर्स में एक चीज़ पक्की थी: बचपन में बिछड़ना और एंड में किसी 'wild coincidence' की वजह से मिल जाना.
 
आज के गूगल मैप्स और आधार कार्ड्स टाइम्स में ये फार्मूला लॉस्ट लग सकता है, लेकिन उस वक्त ये इमोशन का पीक था. md ने इस mo को बार-बार use किया. आज हमें lazy writing लग सकती है, लेकिन md school of thought में ये indian storytelling का core था. उनके अकॉर्डिंग इंडियन ऑडियंस बचपन से ही फोक  stories सुनती आ रही है, जो destiny driven है. जैसे महाभारत, रामायण वग़ैरह. इंडियन ऑडियंस probability नहीं, डेस्टिनी समझती है और यहीं बना उनका स्ट्रॉंग पॉइंट.

देसाई के फिल्मी करियर का फेज़

एमडी का करियर ओवरनाइट explode हुआ. 1960s में 'ब्लफ मास्टर' और 'छलिया' जैसी मूवीज से वो ऑडियंस की पल्स को समझते हैं. ये था लर्निंग फेज़, फिर आता है 1970 से 1983 तक का टाइम जिसे उनका 'गॉड मोड फेज़' भी कह सकते हैं. 1977 में उन्होंने वो flex किया, जो वर्ल्ड सिनेमा में कोई नहीं कर पाया. एक ही साल में 4 mega blockbusters दीं. इनमें ‘धरम वीर’, ‘चाचा भतीजा’, ‘परवरिश’ और ‘अमर अकबर एंथनी’ शामिल थीं. वो एक ऐसी 'money machine' बन गए थे, जिसमें एक तरफ से स्क्रिप्ट डालो और दूसरी तरफ से 'box office records' टूट कर निकलते थे. हर स्टार उनके साथ काम करना चाहता था. यानी complete domination... 

80s के era के एंड तक सिस्टम थोड़ा स्लो होने लगा था. 'मर्द' और 'कुली' हिट तो थीं, लेकिन उनमें कुछ भी new नहीं था. just like iPhone 14, 15 and 16 का डिजाइन. फिर आई 'गंगा जमुना सरस्वती' जो बुरी तरह फ्लॉप हुई. ऑडियंस का टेस्ट चेंज हो रहा था. अब मार्केट में आए थे आमिर खान और सलमान खान जैसे चॉकलेट हीरोज. एमडी का लाउड और बड़ा मसाला अब आउटडेटेड लगने लगा था और धीरे धीरे, लाइक ब्लैकबेरी, वो इंडस्ट्री से fade आउट हो गए.

ये भी पढ़ें: कौन था मेक्सिको का most wanted criminal el mencho, जिसकी मौत भी बन गई तबाही

देसाई सिनेमावर्स का पीक

अमर अकबर एंथनी देसाई सिनेमावर्स का पीक था. ये फिल्म सिर्फ एक आम हिट फ़िल्म नहीं थी, ये एक cultural moment था. कोई secularism पर lecture नहीं. कोई ideology dump नहीं. unity को preach नहीं किया गया, बस normalise किया गया. इस फिल्म का ओपनिंग क्रेडिट वाला सीन ही ले लीजिए, जब तीनों भाई सारे रुल्स को साइडलाइन करके एक साथ अपना खून अपनी मां को देते हैं?

इस सीन में कोई लॉजिक नहीं था. यहां तक की स्टारकास्ट को भी ये unusual लगा था, लेकिन एमडी का ओपिनियन था, लॉजिक से इमोशन नहीं आते, बिलीफ से आते हैं. इस फिल्म ने सारे रिकार्ड तोड़ दिए थे और cult classic फिल्मों की लिस्ट में अपनी जगह बनाई.

collie
Photograph: (imdb)

1982 में ‘कुली’ फिल्म की शूटिंग के टाइम हुई अमिताभ बच्चन की इंजरी, एमडी की जर्नी का मेज़र पॉइंट है. जब अमिताभ हॉस्पिटल में रिकवरी कर रहे थे, तब उन्होंने रीयल लाइफ की दुआओं को स्क्रीन पर उतारा. original क्लाइमैक्स, जिसमें अमिताभ का character मरने वाला था, उसे चेंज किया. ये मार्केटिंग नहीं थी, ये pure emotional connection था और इसका रिजल्ट? कुली रिलीज़ होती है और उस समय के सारे रिकार्ड तोड़ देती है.

ये भी पढ़ें: afwaah: इंडोनेशिया में अचानक शुरू हो गई थी mob lynching, बस इस अजीब अफ़वाह की वजह से

बॉलीवुड का डीएनए बदलने वाला collab

अब बात करते हैं उस collab की, जिसने बॉलीवुड का डीएनए बदल दिया. अगर अमिताभ शहंशाह बने तो एमडी उनके game designer थे. इनकी lore बहुत इंटरेस्टिंग है. 'अमर अकबर एंथनी' के उस मिरर सीन के बाद, जहां अमिताभ खुद का इलाज करते हैं. एमडी इतने Impress हुए कि उन्होंने कसम खा ली कि वो अमिताभ के साथ ही अपनी सबसे बड़ी फिल्में बनाएंगे. इन दोनों ने मिलकर सिनेमा का power-up मोड ऑन कर दिया. 'नसीब', 'कूली', 'मर्द' इन फिल्मों में अमिताभ सिर्फ हीरो नहीं थे, वो एक Vibe थे. उन्होंने अमिताभ को एक नया फ़्लेवर और कॉमिक अंदाज़ दिया, जो उनकी angry image को बैलेंस करता था. इस blend ने अमिताभ को universal अपील दी. 

mard (1)
Photograph: (imdb)

एमडी की पर्सनल लाइफ भी just like his मूवीज़ ड्रामेटिक थी. बैक टू बैक हिट फिल्म्स देने के बाद भी उन्होंने कभी अपना गिरगांव वाला घर नहीं छोड़ा. घर की बालकनी उनका नेटफ़्लिक्स थी और नीचे होती एक्टिविटीज उनके शोज़, जिसे वो घंटों तक binge watch करते थे. पर्सनली he was man of culture, उन्हें parties और drinking बिलकुल पसंद नहीं थी.

जैसे उनकी मूवीज़ रोलर कोस्टर राइड्स होती थी, उनकी लाइफ भी ऐसे ही unexpected turns and twists से भरी थी. जब वो 42 साल के थे, तब 1979 में उनकी वाइफ जीवनप्रभा की डेथ हो गई थी. उनके जाने के बाद वो काफी अकेले हो गए थे. कुछ साल बाद उनकी लाइफ की मूवी में नया लव एंगल आया, जिनका नाम था नंदा. कई बार just to see her glimpse, वो अपनी फ़िल्मों का शूट उनके घर के पास किया करते थे. वहीदा रहमान ने दोनों को मिलवाया था, जिसके बाद कहानी सगाई तक भी पहुंची, लेकिन ये रिश्ता शादी तक नहीं पहुंच सका.

घर की बालकनी से गिरकर एमडी की डेथ

1 मार्च 1994 को इंडियन सिनेमा के लिए ट्रैजिक दिन था. एमडी की अपने घर की बालकनी से गिर कर डेथ हो गई. उनकी डेथ पर कई कांस्पीरेसी थ्योरीज़ बनी, जो आजतक चलती हैं. उनका एंड भी just like his movies suddenly, unexpected और dramatic था. उनके फैन्स आज भी इस इंतज़ार में हैं कि इस tragic separation के बाद कोई coincidence उनसे दोबारा मिलवा दे.

आज के एरा में अगर रोहित शेट्टी अपनी फ़िल्मों में गाड़ियां और फिजिक्स दोनों को उड़ा रहे हैं, या फराह ख़ान अपनी फ़िल्म में पूरे बॉलीवुड को डांस करवा रही हैं तो समझ जाइए ये सब मनमोहन देसाई के digital descendants हैं. आज अगर पुष्पा किसी के सामने झुक नहीं रहा है और 'जवान', 'rrr' जैसी फ़िल्में हिट हैं तो ये एमडी के फ़िल्ममेकिंग विज़न की वजह से ही है. वो मसाला सिनेमा के og थे, जिन्होंने prove किया कि अगर इमोशन असली हैं, तो लॉजिक नक़ली भी चलेगा. 

ये भी पढ़ें: chatgpt prompt ko kaise fix karein? | easy prompt tips and tricks

sahreen profile imagesahreen
सहरीन ने 10+2 तक आर्ट्स साइड से पढ़ाई की. शुरुआत से ख़बरें देखना और पढ़ना पसंद था. वक्त के साथ यह पसंद और बढ़ी तो ग्रेजुएशन भी इसी फील्ड में (बैचलर्स जर्नलिजम एंड मास कम्युनिकेशन) किया. मीडिया को और अच्छे से जानने और समझने और खुद को इसी फील्ड के लिए तैयार करने के लिए जामिया मिल्लिया इस्लामिया से PG Diplom in TV Journalism किया. इसी दौरान एबीपी न्यूज़ में मौका मिला तो वहां काम शुरू किया. इसी सफर को जारी रखते हुए TV9 भारतवर्ष में 2 साल बतौर sub-editor 2 साल हिंदी वेबसाइट पर काम किया. zingabad में सहरीन अपने मन की लिखने-पढ़ने और एक्सप्लोर करने के सपने को पूरा कर रही हैं.