चेन्नई का एक छोटा सा होटल का कमरा. बाहर बारिश हो रही है और अंदर तीन लोग बैठे हैं: एक डायरेक्टर, एक राइटर और एक सुपरस्टार… जिसका करियर उस वक्त वॉक ऑफ शेम से गुज़र रहा था. इस सुपरस्टार की पिछली 15 फिल्में लाइन से बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हुई थीं.
ट्रेड पंडितों ने हेडलाइंस छाप दी थीं 'द सुपरस्टार इज़ डेड'.वो सुपरस्टार, जो पेशे से एक lawyer था, चुपचाप बैठा था. उसका चेहरा शांत था पर आंखों में एक अलग ही आग थी. उसने सिर्फ एक लाइन कही "लेट्स डू इट".
अब सीन चेंज, केरल का एक सिंगल स्क्रीन थिएटर. फिल्म का हीरो, जिसका नाम gk है, जेल से बाहर आता है. वो अब वो चॉकलेटी हीरो नहीं था जो वही टिपिकल गाना गाए, वो एक टूटा हुआ, जख्मी और बदला लेने के लिए बेताब इंसान था. जब वो स्क्रीन पर पहली बार अपनी भारी, 'बैरिटोन' आवाज़ में बोलता है, तो थिएटर में सन्नाटा छा गया और फिर... जैसे ही पहला विलेन मरा, पूरे केरल के लोग अपनी कुर्सियों पर खड़े होकर सिक्के उछालने लगे.
फिल्म थी: न्यू दिल्ली. लोग पागल हो गए थे. ये सिर्फ एक फिल्म की सक्सेस नहीं थी, ये एक मरे हुए करियर का रीवाइवल था. ये सिर्फ एक हिट फिल्म नहीं थी, ये मलयालम सिनेमा का सिस्टम रीबूट था.
मलयालम इंडस्ट्री में बदलाव का दौर
1960s और 70s में मलयालम इंडस्ट्री एक अलग ही ट्रिप पर थी. एक ऐसी दुनिया, जहां हीरो हमेशा परफेक्ट होता था. ये वो era था जब प्रेम नज़ीर साहब राज करते थे. उनकी वाइब कैसी थी?
एकदम चॉकलेटी. बाल हमेशा सेट, चेहरे पर मासूम मुस्कान.. audience उनसे इसलिए प्यार करती थी क्योंकि उनकी फिल्में certainty देती थीं. आप जानते थे end में सब ठीक होगा. कोई moral confusion नहीं, कोई grey zone नहीं. फिल्में बहुत ज्यादा मेलोड्रामैटिक होती थीं. रोना-धोना एकदम पीक पर था.
फिर आए जयन. जयन मतलब मलयालम सिनेमा का एल्विस प्रेसली. जयन का स्वैग मतलब टाइट बेल-बॉटम्स, सीने तक खुली शर्ट और ऐसे स्टंट्स जिससे आज के एक्शन हीरोज भी शर्मा जाएं.
तो ओवरऑल उस एरा के हीरो या तो बहुत अच्छे होते थे या फिर सुपरमैन. एक आम इंसान, जो गलती कर सके, जो गुस्सा हो सके, जो ग्रे हो सके वो स्क्रीन से गायब था.
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1970s में kerala में politics aggressive हो रही थी, यूथ रेस्टलेस था, सोसाइटी में anger simmer कर रहा था. सिनेमा और रिएलिटी के बीच एक क्लीयर गैप बन चुका था. मलयालम सिनेमा उस समय जिसे तलाश रही थी, वो था realism और ऐसे ही दौर में एंट्री होती है हमारे हीरो ममूटी की. इंडियन सिनेमा का धुरंधर........
ममूटी की शुरुआत आम थी, लेकिन कहानी आम नहीं थी
ममूटी की कहानी किसी नेपो किड की नहीं है. ये कहानी है मुहम्मद कुट्टी की, जो एक नॉर्मल मुस्लिम परिवार में जन्मा था. दो भाई और तीन बहनों में सबसे बड़े ममूटी ने सीधे सिनेमा जॉइन नहीं किया था, वो एर्नाकुलम में काला कोट पहनकर केस लड़ रहा था और मन ही मन सिनेमा के सपने बुन रहा था.
एक बार एक डायरेक्टर ने उनसे कहा था तुम्हारी आवाज बहुत ज्यादा भारी है, ये विलेन जैसी लगती है, किसी हीरो जैसी नहीं. . लेकिन उन्होंने हीरो बनने की ज़िद नहीं की. उन्होंने एक्टर बनने का फैसला किया.
उनके करियर की शुरुआत होती है 1971 में आई फिल्म ‘अनुभवंगल पालिचाकल’ से . इसमें वो बस एक भीड़ का हिस्सा थे, हीरो के पीछे खड़े एक एक्स्ट्रा, एक एनपीसी की तरह, पर भाई का औरा ऐसा था कि वो भीड़ में भी अलग दिखते. असली पहचान उन्हें 1980 में आयी फ़िल्म ‘विल्क्कानुंडु स्वप्नंगल’ से मिली, जिसे उनका पहला बड़ा ब्रेक माना जाता है.
धीरे-धीरे वो उन डायरेक्टर्स के करीब आए, जो मलयालम सिनेमा को रियलिज्म के इंजेक्शन लगा रहे थे. इसमें शामिल थे एम.टी. वासुदेवन नायर, के.जी. जॉर्ज जैसे लोग. और फिर इसके बाद ममूटी ने इंडस्ट्री को disrupt कर दिया.
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ममूटी का गॉड-मोड फेज़
1980s से अर्ली 90s उनका गॉड-मोड फेज़ था. थनीयवर्थनम, ओरु वडक्कन वीरगाथा, मथिलुकल, अमरम, विधेयन इस दौर में वो सिर्फ हिट एक्टर नहीं, सिनेमा के रूल-ब्रेकर थे.
उन्होंने दिखाया कि हीरो को लाइकेबल होना ज़रूरी नहीं, बिलीवेबल होना ज़रूरी है. पावर, गिल्ट और डिज़ायर को उन्होंने सेंटर फ्रेम में ला दिया और मलयालम सिनेमा को रियलिज्म का प्रोसेसर बना दिया.
लेकिन 1986 में उनके करियर में वो थैनोस के snap वाला मोमेंट आया, जब उनकी 15 फिल्में लाइन से बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरीं. सन्नाटा गहरा था, पर भाई ने हार मानने की जगह अपना पूरा सॉफ्टवेयर ही अपडेट कर दिया और फिल्म आई न्यू दिल्ली. ये मलयालम सिनेमा का सबसे बड़ा सिस्टम रीबूट था. ये उनका पहला बड़ा कमबैक था, जिसने उन्हें एक अनडिस्प्यूटेड अल्फा बना दिया.
फिर आता है मिड-2000s, जहां गेम थोड़ा लैग करने लगता है. ऑडियंस का टेस्ट चेंज हो रहा था और 2005–2007 के बीच ममूटी की 10–12 फिल्में बैक-टू-बैक अंडरपरफॉर्म करती हैं. इंडस्ट्री में विस्पर मोड ऑन हो गया, "क्या ममूटी आउटडेटेड हो रहे हैं?".
यहां ज़्यादातर स्टार्स पैनिक करके सेफ रोल्स ढूंढने लगते हैं, पर ममूटी ने exact opposite किया. उन्होंने सेफ्टी अनइंस्टॉल कर दी. इन्सटेड ऑफ चेजिंग ए कमबैक, वो रिसेट मोड में चले गए.
यहीं से शुरू हुआ उनका वर्जन 5.0. dr. babasaheb ambedkar में सुपरस्टार गायब हो गया और सिर्फ किरदार बचा. उन्होंने अपनी बॉडी लैंग्वेज, अपनी चाल, सब कुछ अम्बेडकर जैसा कर लिया था. इसके लिए उन्हें अपना तीसरा नेशनल अवार्ड मिला.
peranbu में उन्होंने एक थके हुए बाप का ऐसा रोल किया कि लोग हीरो को भूल गए. और जब लोग एक टिपिकल कमर्शियल वापसी का वेट कर रहे थे, तब उन्होंने ‘ननपाकल नेरथु मयक्कम’ दे दी जहां identity ही ग्लिच हो जाती है.
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ममूटी को अगर समझना है, तो पहले ये भूलना पड़ेगा कि हीरो कैसा होता है. ममूटी कभी भी क्लासिक हीरो नहीं रहे. वो परफेक्ट नहीं हैं. वो हमेशा पसंद आने के लिए बने नहीं हैं. और शायद यही वजह है कि वो इतने ज़्यादा interesting हैं. हर फिल्म में नया वर्जन. ममूटी का सबसे बड़ा फ्लेक्स यही है कि वो कभी प्रेडिक्टेबल नहीं होते. उनकी फिल्मोग्राफी कोई साधारण लिस्ट नहीं है, ये एक्टिंग की एक पूरी एनसाइक्लोपीडिया है.
यहीं से ममूटी का मल्टीवर्स खुलता है
सबसे पहले बात करते हैं उस character की, जिसने मलयालम सिनेमा में हीरो की डेफिनेशन ही बदल दी. ये character था सेतुरामा अय्यर ऑफ फिल्म ‘ओरु cbi डायरी कुरीपु’. एक ऐसा हीरो जो अपने हाथ पीछे बांधकर चलता है और अपने दिमाग से केस सॉल्व करता है. आंखें सब कुछ नोटिस करती हुई. ये वो हीरो है जो पहले सोचता है, फिर चलता है. यहां ममूटी ने दिखाया कि दिमाग सबसे बड़ा वेपन हो सकता है. इस किरदार ने मलयालम सिनेमा में इंटेलेक्चुअल हीरो की पूरी कैटेगरी ही बना दी.
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फिर चलते हैं ‘ओरु वडक्कन वीरगाथा’ के दौर में. सदियों से केरल की फोक स्टोरी में चंदू नाम के कैरेक्टर को एक धोखेबाज माना जाता था. ममूटी ने उस किरदार को उठाया और उसे ऐसा जिया कि उन्होंने पूरी हिस्ट्री ही हैक कर ली.
उन्होंने दिखाया कि चंदू धोखेबाज नहीं, बल्कि हालात का मारा हुआ एक ट्रैजिक वॉरियर था. फिल्म के अंत में जब वो कहता है इतिहास शायद मुझे गलत याद रखेगा, तो लिटरली ऑडियंस की आंखों में आंसू थे. ये ममूटी का पावर था, उन्होंने एक विलेन को एटरनल हीरो बना दिया.
लेकिन ममूटी का मल्टीवर्स सिर्फ हीरोइस्म तक सीमित नहीं है. अगर आपको उनका डार्क साइड देखना है, तो आपको ‘विधेयन’ देखनी चाहिए. इसमें वो बने हैं भास्कर पतेलर, एक बेहद क्रूल, बदतमीज और जालिम जमींदार. ममूटी की आंखों में वो ठंडी क्रूरता देखकर आपको सच में उनसे नफरत होने लगेगी.
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72 साल की उम्र में ममूटी ‘भ्रमयुगम’ जैसी ब्लैक एंड व्हाइट हॉरर फिल्म कर रहे हैं. ममूटी मुस्कान के साथ सामने आते हैं. पासा फेंकते हैं. कंट्रोल करते हैं. यहां डर जंप-स्केयर से नहीं आता. डर इस बात से आता है कि ये आदमी हर चीज़ कंट्रोल कर सकता है. ये ममूटी का फाइनल बॉस मोड है.
वहीं ‘नानपाकल नेरथु मयक्कम’ में उन्होंने एक ही सीन में दो अलग-अलग इंसान (जेम्स और सुंदरम) बनकर दिखा दिया कि उम्र सिर्फ एक नंबर है. ये ममूटी का वो मल्टीवर्स है, जहां वो हर बार खुद को डिलीट करके एक नया सॉफ्टवेयर इंस्टॉल कर लेते हैं.
ममूटी का स्वैग
जहां ममूटी कैमरा के सामने इतनी सारी पर्सनैलिटी रखते है, वहीं प्राइवेट लाइफ में काफी शांत किस्म के है और controversy से दूर रहते है. चलिए बात करते हैं उस स्वैग की, जो ममूटी को कैमरे के पीछे एक अर्बन लेजेंड बनाता है. सबसे पहले बात उनके '369' कार गैराज की.
ममूटी को कारों का ऐसा क्रैज़ है कि उनके पास अपना खुद का एक पूरा कलेक्शन है. Reports की माने तो उनके पास 369 कारों का बड़ा कलेक्शन है जिसमें mercedes-maybach gls600, ferrari 296 GTB, porsche 911, land rover defender, bmw m3 (e46) जैसी तमाम कारें है. खास बात ये है कि इन सबका registration नंबर 369 है.
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सिर्फ कारें ही नहीं, मलयालम इंडस्ट्री में सब जानते हैं कि अगर एप्पल ने कोई नया आईफोन लॉन्च किया है या सोनी ने कोई नया मिररलेस कैमरा निकाला है, तो वो सबसे पहले ममूटी के पास होगा. वो लिटरली 'टेक-सैवी' हैं. वो इतने अपडेटेड हैं कि वो सेट पर कैमरामैन को कैमरा एंगल्स और लेंस के बारे में बता देते हैं. उनके बेटे दुलकर सलमान कहते है कि घर में सबसे ज्यादा अपडेटेड मेरे पापा हैं, मैं तो उनके सामने नूब हूं.
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अगर उनके अवार्ड्स की बात करें, तो वो किसी भी एक्टर के लिए एक 'अनरीचेबल गोल' जैसा है. ममूटी ने 3 नेशनल अवार्ड्स (best actor) जीते हैं. 1989 में मथिलुकल के लिए, 1993 में विधेयन के लिए और 1998 में डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर के लिए.
इसके अलावा, उन्होंने रिकॉर्ड 7 बार केरल स्टेट बेस्ट एक्टर अवार्ड जीता है. इसके साथ ही उन्होंने 14 स्टेट filmfare अवॉर्ड भी जीते है. 2024 में भ्रमयुगम के लिए भी उन्हें अवार्ड मिला, जो साबित करता है कि वो आज भी पीक पर हैं. भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया और उन्हें दो यूनिवर्सिटीज से ऑनरेरी डॉक्टरेट भी मिल चुकी है.
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ममूटी ने सिर्फ फिल्में नहीं कीं, उन्होंने मलयालम सिनेमा के dna को ही बदल दिया. ममूटी के आने से पहले इंडस्ट्री बहुत ज्यादा मेलोड्रामैटिक थी, जहां हीरो हमेशा परफेक्ट होता था. उन्होंने आकर रियलिज्म का इंजेक्शन लगाया.
ममूटी ने डायरेक्टर्स को हिम्मत दी कि वो डार्क और कॉम्प्लेक्स कहानियां लिखें. उन्होंने दिखाया कि हीरो भी गलतियां कर सकता है. ममूटी का प्रभाव सिर्फ उनकी फिल्मों तक सीमित नहीं है. उन्होंने एक ऐसी लेगेसी छोड़ी है, जिसका 'रिपल इफेक्ट' आज की पूरी पीढ़ी पर दिख रहा है.
आज अगर फहाद फासिल या जोजू जॉर्ज जैसे एक्टर्स एक्सपेरिमेंटल फिल्में कर पा रहे हैं, तो वो इसलिए क्योंकि ममूटी ने उनके लिए रास्ता साफ किया था.
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ममूटी ने साबित किया कि अगर आप अच्छे एक्टर हैं, तो ऑडियंस आपको हर रूप में स्वीकार करेगी. ममूटी ने इस इंडस्ट्री को वो क्रेडिबिलिटी दी है कि लोग अब मलयालम फिल्मों को बिना देखे ही 'मास्टरपीस' मान लेते हैं. ही इज द रूट डायरेक्टरी ऑफ मलयालम सिनेमा.
ममूटी आज भी सेट पर ऐसे आते हैं जैसे अभी भी कुछ साबित करना बाकी हो. 400 से ज़्यादा फिल्में. पांच दशक. और फिर भी सेफ प्ले नहीं. कुछ लोग फिल्में करते हैं, कुछ लोग सिनेमा को फॉलो करते हैं, और कुछ लोग सिनेमा का कोड ही बदल देते हैं. ममूटी तीसरी टाइप में आते हैं. इंडियन सिनेमा का असली धुरंधर.
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