assi review: आपको फूलों की खुशबू से नफ़रत हो जाएगी. अगर आपने अस्सी देख ली तो. सुबह का शो था. हॉल में कुल सात लोग. वहीं से अंदाजा लग गया कि ट्रेलर ने शायद ज्यादा भीड़ नहीं खींची. लेकिन फिल्म खत्म होने के बाद दिमाग शांत नहीं था. बहुत कुछ घूम रहा था. देश में हर 20 मिनट में एक और हर साल 30 हजार से ज़्यादा रेप होते हैं. इस पर मीडिया की रिपोर्टिंग से ज्यादा गहरी बात अनुभव सिन्हा की ये फिल्म बता जाती है.
ये फिल्म सोसायटी, बदला, जस्टिस और करप्शन पर सीधा वार करती है. अनुभव सिन्हा का नाम जुड़ा हो तो एक्सपेक्टेशन तो बनती ही है. ‘थप्पड़’, ‘मुल्क’ और ‘आर्टिकल 15’ के बाद ये भी उसी जोन की फिल्म है.
कहानी
फिल्म की कहानी परिमा (कानी कुस्रुती) और विनय (जीशान अयूब) की है. हरियाणवी लड़के और मलयाली लड़की की शादी के बाद वाली प्रेम कहानी है. उनका एक बच्चा है. सब कुछ सही लग रहा होता है फिर अचानक एक दिन सब कुछ बदल जाता है. दिल्ली की सुनसान सड़क में एक दिन परिमा गलती कर देती है. वो वो वाला मंत्र भूल जाती है जिसमें बड़े-बुजुर्ग सिखाते हैं कि रात में अकेले नहीं घूमना...ये गलती उसे भारी पड़ती है. सिर्फ उसे ही नहीं उससे जुड़े लोगों को भी और सोसायटी को भी.
कुछ लोग परिमा को महंगी गाड़ी में जबरन घसीटकर ले जाते हैं और फिर दिखता है फिल्म का सबसे डरावना सीन . इसके बाद, शुरू होता है कोर्ट रूम ड्रामा जहां रावी (तापसी पन्नू) परिमा की वकील बनकर सामने आती है. फिर सबकुछ वैसा फील देता है जैसा अमिताभ वाली पिंक में था. बचने बचाने का खेल, नैरेटिव्स, परिवार के ताने और हत्याएं.
एक और कहानी है फिल्म में, कार्तिक (कुमुद मिश्रा) की कहानी. वो भी जूझ रहा है इनजस्टिस से. लेकिन उसके हाथ बंधे हुए हैं. उससे पार पाने के लिए वो दूसरा रास्ता अपनाता है. परिमा और कार्तिक की कहानी इंटरकनेक्टेड हो जाती है. फिर कोर्टरूम ड्रामा और कभी सीधी उंगली से घी निकालने की कोशिश तो कभी टेढ़ी उंगली कर घी निकालती वकील रावी दिखती हैं. कहानी के बारे में ज्यादा बात करने के बजाय फिल्म के क्राफ्ट को समझ लेते हैं.
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फिल्म है कैसी?
ये न स्लो है, न फास्ट. इसकी सोल ही ऐसी है कि पेस मायने नहीं रखता.फिल्म में इतने सारे मेटाफर्स हैं और सटीक हैं कि उनके मतलब का भी मतलब निकल आए. जो बातें ज्ञान की लगती हैं उन्हें अक्सर ये कहकर भुला दिया जाता है कि यार बहुत ज्ञान हो रहा है. इसलिए राइटर्स ने ज्ञान की बातों को दिखाने के लिए इंसीडेंट्स इस्तेमाल किए हैं और उन्हें माकूल डायलॉग्स से पूरा करते हुए ज्ञान दे दिया है.
- एक सीन है जहां जीशान अयूब अपने बच्चे को सिखाते हैं बस में पहले दूसरे को चढ़ने दो फिर तुम चढ़ना. कुमुद मिश्रा इसे बहुत हल्के में लेकर बोलते हैं कि यार क्या ही हो गया बच्चे हैं. इसके तुरंत बाद एक बच्चा कुमुद को धक्का मारकर निकल जाता है. और जीशान बोलते हैं कि यही बच्चे कल को बड़े होंगे. इस सीन में एक बड़ी बात सटल तरीके से कह दी जाती है. कि बच्चों को वैल्यूज के बारे में बताने का काम उनके एल्डर्स का होता है.
- एक और सीन की बात करता हूं - एक जगह एक पुलिस वाला कल्प्रिट से विनोद कुमार शुक्ल, अमृता प्रीतम और रामधारी सिंह दिनकर के बारे में पूछता है, तो कल्प्रिट इन्हें राइटर न समझकर चुगलखोर समझता है. ये वाला सीन भी एजुकेशन को लेकर एक सटल सैटायर था.
फिल्म में बदले की भावना से किए गए काम को भी अपराध क्यों माना जाना चाहिए, इसकी पूरी परिभाषा बता दी गई है. क्यों रेप के बदले हत्या सही नहीं है. और क्यों हत्या के बदले फिर से रेप और हत्याएं बढ़ती जाएंगी, ये पूरी साइकोलॉजी समझ आ जाएगी.
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एक्टिंग
तापसी पन्नू ने लॉयर का रोल निभाया है, उनके एक्सप्रेशन उनके डायलॉग्स को भारी बना दे रहे थे. उन्हें कुछ साबित करने की जरूरत नहीं बची. वो नो डाउट बड़ी हीरोइन भी हैं और कमाल एक्ट्रेस भी. रेप सर्वाइवर के रोल में कानी कुस्रुती ने इतना अच्छा कर दिया है कि महारानी वाले कैरेक्टर से वो पूरी तरह से बाहर आ चुकी हैं.
जीशान अयूब, कुमुद मिश्रा, सुप्रिया पाठक, नसीरुद्दीन शाह और मनोज पाहवा ऐसे एक्टर हैं कि अब उनकी एक्टिंग के बारे में बात करना ही गलत होगा. इनमें से एक एक्टर मनोज पाहवा के बारे में बता देता हूं वो एक सीन में इतनी ग्रैविटी के साथ अपने बेटे को समझा रहे होते हैं कि आपको उनके ही कैरेक्टर पर गुस्सा आ जाएगा.
- वो एग्जाम्पल देते हैं कि मम्मी तेरी खाना बहुत अच्छा बनाती है लेकिन कभी कभी छोला भटूरा बाहर खा लेना चाहिए. यहां पर छोला भटूरा, दरअसल छोला भटूरा नहीं होता...यहां पर छोला भटूरा असल में बाहर जाकर लड़कियों के साथ बदतमीजी करने का सजेशन होता है.
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राइटिंग
अनुभव सिन्हा और आर्टिकल 15 लिख चुके गौरव सोलंकी फिल्म के राइटर्स हैं. उन्होंने एक एक सीन ऐसे लिखा है कि हर जगह से कुछ न कुछ मिल जाए ऑडियंस को. रेप सीन को ऐसे फिल्माया गया है कि रवीना टंडन की फिल्म 'मातृ' के एक ऐसे ही सीन से इसका कंपेयर कर सकते हैं.
- मातृ में एक सीन था, सुनसान अंधेरी रात में चलती हुई कार, उसके अंदर हो रहा अपराध और फिर शांति...ये सीन चुभता है. ऐसा ही सीन यहां भी है जो घाव देता है. सीन में बिलखती औरत से ज्यादा शर्त लगाकर उसे ट्रॉमा देने वाले जब गिनती गिन रहे होते हैं, तो सच में घिन आती है.
- सोचिए अगर कोई हिट एंड रन का केस हो, उस गाड़ी नंबर प्लेट न हो और किसी ने सिर्फ दारू के नशे में किसी की जान ले ली हो, उसका पता पुलिस भी न लगा पाए. तो वो जो छटपटाहट होती है विक्टिम की फैमिली को, उसे पर्दे पर हूबहू कैसे उतार दिया, ये जानने के लिए तो फिल्म के राइटर्स से ही बात करनी पड़ेगी. सवाल है कि कैसे इतना डीप जाकर सोच लेते हैं आप लोग.
- भाईचारे के चक्कर में फंसकर कैसे जस्टिस की सांसें थमती हैं, ये भी फिल्म का हिस्सा है. एक एग्जाम्पल देकर समझाता हूं. सपोज कि मिस्टर एक्स और मिस्टर वाई अच्छे दोस्त हैं और एक थाली में खाना खाते हैं. मिस्टर एक्स अच्छा इंसान है लेकिन मिस्टर वाई करप्शन कर देता है. तो ऐसे में क्या होता है? होता यही है कि मिस्टर एक्स भाईचारे के चक्कर में पड़कर मिस्टर वाई के खिलाफ नहीं जाता है. ये वाली साइकोलॉजी को भी अनुभव सिन्हा ने बता दिया है कि सोसायटी में इतनी गंदगी क्यों फैलती जा रही है.
- एक सीन में रेप सर्वाइवर उस ट्रॉमा के बारे में बात करती है जब उसके साथ रेप हो रहा होता है और उसके पास रखे फूलों की खुशबू उसकी नाक से दिमाग में जा रही होती है. वो बताती है कि उसे उस दिन से फूलों तक से नफरत हो गई है. यही वो सीन है जहां पर राइटर्स जीतते दिखते हैं.
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डायरेक्शन
कौन सी चीज किस समय सही प्रभाव डालेगी ये अनुभव सिन्हा को इतने अच्छे से पता चल चुका है कि यकीन मानिए, ये उन्हें सबसे जिम्मेदार डायरेक्टर्स की लिस्ट में खड़ा कर देता है. डायरेक्शन का कमाल ये है कि हर सटल बात इतने सटल तरीके से कह दी जाए कि बिना दिमाग लगाए भी लोगों को समझ आ जाए, यहीं पर अनुभव जीतते दिखते हैं. उन्होंने न तो गानों का मोह किया है और न ही फिल्म की एडिटिंग से. और जब कोई डायरेक्टर मोह छोड़ देता है तो फिल्म अस्सी जैसी बनती है.
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