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2003 में bollywood ने ऐसी फ़िल्म बना डाली थी कि आज अगर आप देखेंगे तो सोचेंगे कि आखिर आपने अब तक इसे देखा क्यों नहीं? यहां जानिए पूरी फ़िल्म किस बारे में है.

matrubhoomi

matrubhoomi a nation without women review: एक सीन है. हवा चल रही है. वही गांव की गर्मियों वाली हवा, जब गेहूं कट चुके होते हैं और खाली खेतों में छोटे-छोटे बवंडर उठते हैं. बिल्कुल किसी स्लो-मो एपोकैलिप्स सीन जैसा. चिड़ियों की आवाज वही है, नैचुरल, रियल. लेकिन माहौल में एक अजीब सी चुभने वाली शांति है. ऐसी शांति जो netflix की किसी डार्क सीरीज के silent moment जैसी लगती है. शांत, लेकिन खतरनाक.

ये शांति क्यों है. क्योंकि यहां किसी छोटी बच्ची की खिलखिलाहट नहीं है. किसी औरत की हंसी नहीं है. चारों तरफ सिर्फ मर्द हैं. ऐसी दुनिया जहां चुन-चुनकर औरतों को खत्म कर दिया गया है. जो बचा है, वो है टॉक्सिक मर्दानगी. प्योर, अनफिल्टर्ड. जिस समाज में औरतें नहीं होतीं, वहां कोमलता भी लॉगआउट हो जाती है. बस बचती है चीजों को तोड़ने और बर्बाद करने की आदत.

ये कहानी असली इंडिया की नहीं है, बल्कि एक डिस्टोपियन इंडिया की है. डिस्टोपिया मतलब ऐसा फ्यूचर जहां सब कुछ बिगड़ चुका है. कुछ-कुछ हैंडमेड्स टेल वाली फील, लेकिन देसी जमीन पर. मातृभूमि फ़िल्म की टैगलाइन है, अ नेशन विदाउट वीमेन. बस यही एक लाइन काफी है समझने के लिए कि ये फ़िल्म इतनी अंडररेटेड क्यों रह गई.

ये फ़िल्म ऐसे कॉन्सेप्ट पर बनी है, जिस पर हॉलीवुड आमतौर पर करोड़ों उड़ाता है. वहां डिस्टोपिया दिखाने के लिए या तो मैड मैक्स जैसी सूखी उजाड़ दुनिया होती है या फिर वर्ल्ड वॉर के बाद की तबाही. सब कुछ विजुअली ग्रैंड. पैसा-पानी की तरह बहता है.

मातृभूमि में भी दुनिया तबाह है, लेकिन किसी बम, वायरस या ज़ॉम्बी से नहीं. ये दुनिया सोच से तबाह हुई है. माइंडसेट से. ये फ़िल्म उस वक्त आई थी जब आज की Gen Z के बड़े भाई-बहन शायद ऑर्कुट पर प्रोफाइल बना रहे थे या पैदा ही हुए थे. जो आज हर मुद्दे पर खुलकर बोलते हैं, तब वो इतने छोटे थे कि ये फ़िल्म उनकी पहुंच से बाहर थी.

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उस दौर में Bollywood में प्यार-मोहब्बत चल रहा था. एक्शन फ़िल्मों का भी comeback हो रहा था. ऐसे में इतनी uncomfortable और डार्क फ़िल्म को बहुत कम लोगों ने देखा. लेकिन आज की ऑडियंस डार्क कंटेंट देख चुकी है. अब वो mirror में झांकने के लिए तैयार है. तो चलो बात करते हैं. उस छोटी सी सोच पर बनी फ़िल्म पर, जिसने डिजास्टर के बारे में बताया.

matrubhoomi review
matrubhoomi review Photograph: (imdb)

story

ये फ़िल्म तभी देखना जब आप emotionally strong हों. जब इसके न दिखने वाले नाखून आपको अंदर से नोचें और आप भागें नहीं. कहानी ये है कि एक दुनिया है जहां औरतें पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं. फ्रस्ट्रेटेड मर्दों के लिए मां का प्यार और बहन का अपनापन बस थ्रोबैक मेमोरी बनकर रह गया है. और जो स्ट्रेट लोग हैं, वो सेक्स के लिए अलग-अलग, और ज्यादा डरावने रास्ते ढूंढ रहे हैं. हम इस फ़िल्म के सिर्फ एक सीन की ही बात करेंगे जो आपको इसके underrated होने की असली वजह बता देगी.

ट्विस्ट तब आता है जब अचानक एक लड़की किसी लुप्तप्राय स्पीशीज की तरह कुछ लोगों की नजर में आ जाती है. जैसे किसी post-apocalyptic फ़िल्म में आखिरी पेड़ दिख जाए. असल में उसका पिता उसे छुपाकर रखता है. उसे पता है कि औरतों की कमी से भरा ये मर्दों का फ्रस्ट्रेशन उसकी बेटी को निगल जाएगा.

लेकिन यहां एंट्री होती है गरीबी और स्वार्थ की. वो पिता बेटी से ज्यादा अपनी हालत को प्रायोरिटी देता है. और फिर वो अपनी बेटी को दूसरे पिता को बेच देता है. दूसरा पिता उस लड़की को अपने एक-दो नहीं, पूरे पांच बेटों के लिए खरीदता है. ये सब समाज के बनाए नियमों के अंदर होता है. लाल जोड़ा, सात फेरे, सब कुछ ऐसा जैसे सब नॉर्मल हो.

इसके बाद जो शुरू होता है, वो इतना घिनौना है कि स्क्रीन से नजर हटाने का मन करता है. पांच भाइयों में ये तय करने की होड़ लगी है कि पहली रात सबसे पहले कौन जाएगा. तभी कहानी में एक और प्लेयर एंटर करता है. वो प्लेयर होता है लड़की का ससुर.

यहीं पर writer पूरा गेम पलट देता है. वो उस पिता की भेड़ियागिरी दिखाता है, जो बेटों से पहले अपनी बहू के साथ पहली रात बिताना चाहता है. उसकी सेक्स की भूख इतनी डरावनी है कि सीन देखते वक्त पेट में अजीब सी गांठ पड़ जाती है. वो रोता है, इमोशनल ड्रामा करता है, बच्चों को गिल्ट में डाल देता है कि तुम लोग अपने बाप के लिए कुछ नहीं करते. बच्चे भी टूट जाते हैं.

आखिरकार पांच बच्चों का ये बाप अपना हक ले लेता है. रोकर, गिड़गिड़ाकर, हर तरीका आजमाकर. उसके चेहरे की हैवानियत किसी भी हॉरर विलेन से ज्यादा डराती है. राइटर को पता था कि ये कहानी सिर्फ एक परिवार तक सीमित नहीं रह सकती. इसलिए गांव, गांव वाले और जाति का एंगल भी यहां आता है. अलग-अलग जातियों के बीच का टकराव भी.

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जो लोग सैकड़ों साल से जाति के नाम पर शोषण झेलते आए हैं, वो अब अपना हक मांगना चाहते हैं. लेकिन उनमें से कुछ लोग इस मौके को अपने एजेंडे के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं. उनका मकसद है उस लड़की तक पहुंचना और फिर वही करना जो लड़कियों की कमी की वजह से बाकी सोसायटी करने के लिए मौके तलाश रही है. यानी जो लोग सिस्टम के खिलाफ खड़े दिखते हैं, मौका मिलते ही वही सिस्टम बन जाते हैं. राइटर और डायरेक्टर ने किसी को भी क्लीन हीरो या प्योर विलेन नहीं बनाया. सब ग्रे हैं. सब गंदे हैं. बस शेड अलग-अलग हैं.

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matrubhoomi review Photograph: (imdb)

acting

ट्यूलिप जोशी वही वाली लड़की बनी हैं जो लुप्तप्राय है. उन्होंने खुद को फ़िल्म में ऐसे दिखाया है जैसे सच में कोई मेमना भेड़ियों के सामने फंस जाने के बाद हो जाता है. उनके अलावा, फ़िल्म में जितने भी एक्टर्स हैं वो टॉप क्लास हैं. सुधीर पांडे 5 बच्चों के पिता के रोल में दिखे हैं और बेहद घिनौने लगे हैं. यही उनकी एक्टिंग का अलग फ्लेवर दिखाता है.

सुशांत सिंह फ़िल्म में वो थोड़ी देर के लिए ही सही लेकिन सॉफ्ट रोमांटिक हीरो की तरह दिखे हैं. उनके बड़े भाई के तौर पर पंकज झा, अपने पंचायत वाले विधायक जी भी हैं. और पीयूष मिश्रा भी. इन दोनों को उस दौरान कोई खास रिकग्निशन मिली नहीं थी, लेकिन अच्छा एक्टर तो अच्छा ही होता है. और ये दोनों बहुत अच्छा काम कर गए हैं.

writing और direction

अब सोचो, ऐसी दुनिया जहां लड़कियां ही न हों. वो दुनिया कैसी होगी. ये दिखाने के लिए फ़िल्म में इतने मेटाफर हैं कि हर सीन एक सबटेक्स्ट है. अगर किसी राइटर या फ़िल्ममेकर को मेटाफर समझना है, तो मातृभूमि एक मास्टरक्लास है. मनीष झा को इस फ़िल्म का आइडिया तब आया, जब उन्होंने गुजरात के एक ऐसे गांव के बारे में पढ़ा जहां औरतें नहीं थीं. रिसर्च करके उन्होंने ये फ़िल्म बनाई है. रिसर्च भी ऐसी कि फ़िल्म अपने आप में थीसिस लगती है.

butterfly effect को फ़िल्म ऐसे समझाती है जैसे कोई थ्रेड खोलते-खोलते पूरा सिस्टम एक्सपोज कर दे. ऐसा तो खुद केयॉस थ्योरी देने वाले मैथमैटीशियन एडवर्ड लॉरेन्ज भी नहीं समझा पाए थे. एक छोटा सा फैसला और उसका असर बहुत दूर तक. जैसे 12वीं का एक लड़का है जो क्लास जाना छोड़ देता है. पढ़ाई नहीं करता. नतीजा, फेल. फेल हुआ तो कॉलेज नहीं गया.

लेकिन असली वजह ये नहीं कि वो कॉलेज नहीं गया. असली वजह ये है कि उसने शुरुआत में क्लास जाना छोड़ दिया. वहीं से फेलियर की पूरी चेन शुरू होती है. एक छोटा सा फैसला और उसका बहुत बड़ा नतीजा.

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बिल्कुल वैसे ही लड़कियों को दोयम समझने की सोच से शुरू हुआ सफर आखिर में किस लेवल की तबाही तक पहुंचता है, ये फ़िल्म बिना चिल्लाए दिखा देती है. सड़ी हुई और बदबूदार सोच को दिखाने में राइटर और डायरेक्टर मनीष झा अपने पीक पर हैं. जो लिखा, उसे बिना किसी सेफ्टी नेट के स्क्रीन पर रख दिया.

फ़िल्म कोई लेक्चर नहीं देती. ये नहीं बताती कि लड़की के साथ कैसे पेश आना चाहिए. ये बस नतीजे दिखाती है. कि आधी आबादी के साथ गंदा बर्ताव आपको किस अंधेरे में ले जाता है. फ़िल्म देखते वक्त एक सेकेंड के लिए भी अच्छा नहीं लगेगा. यहां एंटरटेनमेंट ढूंढने मत जाना. ये फ़िल्म आपको हिला देने के लिए है.

लेकिन राहत की बात ये है कि ये असली फ्यूचर नहीं है. बेबी बूमर्स से मिलेनियल्स और फिर gen g तक एक चीज ट्रांसफर हुई है. समझदारी. सवाल पूछने की हिम्मत. और gen g तो इसमें और आगे है. खुलकर बोल रही है, सिस्टम को कॉल आउट कर रही है. और शायद यही वजह है कि आज मातृभूमि जैसी फ़िल्म पहले से ज्यादा जरूरी लगती है.

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