अनुराग कश्यप की ‘केनेडी’ तीन साल से बनकर तैयार थी लेकिन इसकी रिलीज़ में अड़चनें आ रही थीं. अब ये फाइनली OTT पर आ गई है और इसे देखने के बाद पता चलता है कि क्यों इसकी रिलीज़ में अड़चनें आ रही थीं. अनुराग कश्यप एक बार फिर अपने फ़ेवरेट जॉनरा नियो नॉयर की तरफ़ मुड़े हैं और उनकी नई फ़िल्म काफ़ी हद तक इस जॉनरा के साथ इंसाफ़ करती नज़र आती है.
कैसी है 'केनेडी'
‘केनेडी’ कहानी है उदय शेट्टी उर्फ़ केनेडी की, जो कभी एक रुथmलेस कॉप हुआ करता था और अब एक बेरहम किलर है. केनेडी की ज़िंदगी के कई सिरे हैं और तमाम के तमाम उलझे हुए हैं. वो अपने पुराने बॉस के लिए पॉलिटिकल किलिंग्स को अंजाम देता है और शतरंज की बाज़ी का वो मोहरा है, जिसका मुक़द्दर ही इस्तेमाल होना है.
उधर दूसरी तरफ़ उसकी अपनी औलाद के लिए उसका कोई दुनियावी अस्तित्व है ही नहीं. वो ज़िंदा होकर एक चलते-फिरते प्रेत जैसी ज़िंदगी जीने पर मजबूर है. ऊपर से अपने हाथों से मारे गए हर विक्टिम का गिल्ट लिटरली साथ लिए घूमता है. केनेडी एक बड़े नेक्सस का एक छोटा सा लेकिन बेहद अहम पुर्ज़ा है. वो, वो हमलावर बाँह है, जिसका इस्तेमाल तमाम डर्टी लॉन्ड्री वॉश करने के लिए किया जाता है. इन ख़तरनाक हालात में गले-गले तक फँसा केनेडी, किस अंजाम को प्राप्त होता है और वहाँ तक कैसे पहुँचता है, यही है फ़िल्म का सेंट्रल प्लॉट.
‘केनेडी’ कुछ ऐसी फ़िल्म है, जो या तो आपको भरपूर बोर करेगी या फिर आपकी फ़ेवरेट बन जाएगी. डिपेंड करता है आपका टेस्ट कैसा है. शुरू में ये फ़िल्म आपको धीमी लग सकती है. कुछ हिस्सों में है भी. नैरेटिव समझने में भी थोड़ी दिक़्क़त आती है, लेकिन जैसे-जैसे कहानी के सिरे जुड़ने लगते हैं ये एक एंगेजिंग थ्रिलर में तब्दील हो जाती है. सेकंड हाफ़ काफ़ी पेसी है और कई इंप्रेसिव मोमेंट्स से भरा हुआ है. फ़िल्म की कहानी पीक कोरोना काल में घट रही है. मास्क लगाए हुए किरदार थोड़े से अजीब लग सकते हैं, लेकिन एक बार आप सेटअप से परिचित हो जाएँ, तो यही ट्रोप आपको नैरेटिव समझने में मदद भी करता है. मुंबई की ख़ाली सड़कों का जस्टिफिकेशन भी मिल जाता है.
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ये फ़िल्म पुलिस डिपार्टमेंट के उस अंधेरे तहख़ाने में उतरने की कोशिश करती है, जिसके बारे में खबरें भी तमाम लीपापोती के बाद ही हम तक पहुँचती है. पुलिस डिपार्टमेंट में करप्शन महज़ इतना भर नहीं है कि किसी क्रिमिनल से पैसे लेकर केस हल्का कर दिया या किसी नेता के घोटाले को दबाने के लिए रिश्वत खा ली. केनेडी उससे भी ज़्यादा हाहाकारी सिनारियो के अंदर ले जाकर पटक देती है आपको. जहां रक्षक, भक्षक तो हैं ही, उन क्रिमिनल्स से बड़े क्रिमिनल्स हैं, जिनसे समाज को बचाने की उन्होंने क़सम खाई होती है. फ़िल्म के कई सीक्वेंस ऐसे हैं, जिन्हें देखने के बाद आपको कुछ असली घटनायें याद आकर रहेंगी.
‘केनेडी’ कई लेवल पर एक बोल्ड फ़िल्म है. जैसा कि हमने शुरू में ही हिंट दिया, इसमें ऐसे कई एलीमेंट्स हैं, जिनसे मौजूदा भारत के कई लोग भड़क जाएँ. उद्योगपति भी, नेता भी, पत्रकार भी और नेताओं के चाहने वाले तो भड़केंगे ही. आपको कई किरदारों में से झांकता कोई रियल लाइफ रेफरेन्स मिल जाएगा. प्रोवोक करने की कैटेगरी में जाने वाले डायलॉग्स भी काफ़ी हैं. जैसे कि एक जगह एक किरदार कहता है, “देश वो लोग चला रहे हैं, जो सरकार को पालते हैं”. इसके बाद वो ऐसे लोगों की डेफिनिशन बताता है और आपके दिमाग़ में न चाहते हुए भी कुछ नाम उभरते हैं. एक और जगह एक किरदार किसी क्राइम को देशहित में हुआ मानकर सब्र करने की सलाह देता है. ऐसी लोडेड पॉलिटिकल कमेंट्री फ़िल्म में कई जगह है. एक जगह तो एक उछलकूद कर रहा पत्रकार आपको एक सिमिलर विजुअल की बड़ी शिद्दत से याद दिलाएगा.
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एक्टिंग
एक्टिंग की बात की जाए तो राहुल भट्ट की ये करियर बेस्ट परफॉरमेंस कहलाई जा सकती है. एक क्रूर हत्यारे की समूची बॉडी लैंग्वेज को उन्होंने जिस खूबी से आत्मसात किया है, उसके लिए नए तारीफ़ी अल्फ़ाज़ गढ़ने पड़ेंगे. वो उतने ही रॉ लगे हैं, जितने पिछले साल आई ‘ब्लैक वॉरंट’ में लगे थे. उससे एकाध लेवल ज़्यादा ही.
उनके बाद जिस एक्टर ने सबसे ज़्यादा प्रभावित किया, वो हैं मोहित टाकलकर. मराठी रंगमंच पर काफ़ी अच्छा काम कर चुके मोहित ने एक करप्ट कमिश्नर के रोल को इतने कनविक्शन से जिया है कि उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का नॉमिनेशन हर अवार्ड फ़ंक्शन में मिलना चाहिए. उनका एक सीन है, जिसमें वो एक किरदार से कहते हैं, नंबर दिमाग़ से डिलीट कर. इसे देखकर शूल के सयाजी शिंदे का ‘मन में हंसके दिखा’ वाला आइकॉनिक सीन याद आ जाता है.
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सनी लियोन का किरदार इतनी इंटेंस फ़िल्म में मिसप्लेस्ड साबित होने का ख़तरा था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं है. उन्होंने काफ़ी अच्छा काम किया है. ख़ास तौर से उनकी हँसी. उस हँसी को तो अलग से एक किरदार घोषित कर देना चाहिए. अभिलाष थपलियाल और श्रीकान्त यादव ने भी अपने किरदारों में सामान्य से कुछ एक्स्ट्रा ही किया है.
फ़िल्म का एक और मज़बूत एस्पेक्ट है इसका बीजीएम. किसी नशे की तरह चढ़ता है ये. धीरे-धीरे बिल्ड होता रहता है और जब किसी सीन में एकदम से रुक जाता है, तो एकदम मज़बूत इंपैक्ट डालता है. ख़ामियों के खाते में इतना ही कि फ़िल्म काफ़ी लंबी है, इसे टाइटली एडिट किया जाना ज़रूरी था. इसके अलावा फर्स्ट हाफ़ अगर थोड़ा और कसा हुआ होता, तो फ़िल्म और बेहतर हो जाती.
कुल मिलाकर अनुराग कश्यप अपनी फ़ेवरेट टर्फ पर उतरे हैं और एक डीसेंट थ्रिलर देने में कामयाब रहे हैं. अगर ढाई घंटे और zee5 का सब्सक्रिप्शन है, तो इस वीकेंड देख डालिए.
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