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upsc ने 2017 से चले आ रहे कैडर सिस्टम को जड़ से उखाड़ दिया है. अब cadre allocation policy 2026 के जरिए ऑफिसर्स की किस्मत का फैसला साइकिल सिस्टम करेगा. टॉपर्स अब अपनी मनपसंद जगह फ़िक्स नहीं कर पाएंगे. क्या ये बदलाव एडमिनिस्ट्रेशन को हिला देगा?

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upsc ने civil services exams में एक बड़ा पैच अपडेट डाला है, और सच कहें तो ये काफ़ी स्ट्रिक्ट है. सिविल सर्वेंट बनने के बाद भी हर साल एग्ज़ाम देकर अपनी रैंक चमकाने या अपनी पसंद का स्टेट चुनने का मौका नहीं मिलेगा.
 
upsc यानी यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन ने सिविल सर्विस एग्ज़ाम में इस साल 2 बड़े चेंजेस किए हैं.

पहला चेंज- कैंडिडेट्स की एलिजिबिलिटी को लेकर है.  

दूसरा चेंज- कैडर सिस्टम को खत्म करने का है. 

ias और ifs के लिए re-exam के दरवाज़े बंद

  • अब सेलेक्टेड कैंडिडेट्स बार-बार एग्ज़ाम नहीं दे सकेंगे. इसका मतलब ये है कि अब ias और ifs बन चुके ऑफ़िसर्स, सिविल सर्विसेज़ का एग्ज़ाम दोबारा नहीं दे सकते यानी वो cse 2026 में नहीं बैठ पाएंगे.
  • वहीं, अगर 2026 में होने वाले प्रीलिम्स एग्ज़ाम के बाद किसी कैंडिडेट का पुराने एग्ज़ाम का रिजल्ट आ जाए और उसका सेलेक्शन हो जाए तो वो मेन्स एग्ज़ाम नहीं दे पाएगा. 
  • ips और ग्रुप a के लिए 2026 में सेलेक्ट हुए कैंडिडेट्स, 2027 में अपनी परफ़ॉर्मेंस बेटर करने के लिए सिविल सर्विस एग्ज़ाम दे पाएंगे, लेकिन सिर्फ एक बार. इसके लिए उन्हें फ़ाउंडेशन कोर्स की ट्रेनिंग करने के बाद ‘वन टाइम exemption’ लेना होगा.  
  • अपार्ट फ़्रॉम दिस, ips के लिए सेलेक्ट हुए कैंडिडेट्स दोबारा एग्ज़ाम देकर ips नहीं चूज़ कर सकते. मतलब कि ips ऑफ़िसर्स 2026 में सिविल सर्विस देकर वापस ips ऑफ़िसर नहीं बन सकते.
  • 2028 से अगर कोई ऑफ़िसर दोबारा एग्ज़ाम देना चाहेंगे, तो उन्हें सिविल सर्विसेज़ की अपनी पोज़ीशन से रिज़ाइन करना होगा. यानी अब सिविल सर्विस ऑफ़िसर्स को सिविल सर्विस की तैयारी के लिए सबैटिकल लीव नहीं मिलेगी.  

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अब ज्योग्राफ़िकल ज़ोन्स में होगी पोस्टिंग 

इसके पहले upsc ने 2017 से चले आ रहे ‘कैडर सिस्टम’ को भी खत्म किया था. इसकी जगह ‘कैडर एलोकेशन पॉलिसी 2026’ को एप्लिकेबल किया गया है. अब साइकिल सिस्टम से ऑफ़िसर्स को कैडर मिलेंगे.

upsc में अब तक सभी स्टेट्स और UTs के 25 कैडर थे, जिन्हें ज्योग्राफ़िकली 5 ज़ोन्स- नॉर्थ, वेस्ट, साउथ, सेंट्रल और ईस्ट में डिवाइड किया गया था.

मेन्स देने के बाद daf में जोन और स्टेट कैंडिडेट्स प्रेफ़ेरेंस बेसिस पर चूज़ करते थे. किसी ऑफ़िसर की अपॉइंटमेंट एक बार जिस स्टेट में हो जाती थी, उसे वहीं पर ही काम करना होता था. इसी को कैडर कहते हैं.

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नया ग्रुपिंग सिस्टम

लेकिन नए रूल्स के अकॉर्डिंग, 25 कैडर्स को अल्फाबैटिकल ऑर्डर में 4 ग्रुप्स में बांटा गया है. 

ग्रुप 1- agmut (अरुणाचल प्रदेश, गोवा, मिजोरम, यूनियन टेरिटरीज), आंद्र प्रदेश, असम- मेघालय, बिहार, छत्तीसगढ़   
 
ग्रुप 2- गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश  
 
ग्रुप 3- महाराष्ट्र, मणिपुर, नागालैंड, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, सिक्किम, तमिलनाडु    
 
ग्रुप 4- तेलंगाना, त्रिपुरा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल 
 
सबसे पहले पुराने सिस्टम को समझते हैं. अगर कैंडिडेट ने नॉर्थ ज़ोन के हरियाणा कैडर को प्रेफ़रेंस दिया तो प्रॉबेबिलिटी रहती थी कि कैंडिडेट को हरियाणा मिल जाएगा. अगर हरियाणा नहीं भी मिलता था तो राजस्थान या उत्तर प्रदेश मिल जाता था. लेकिन नए सिस्टम में एक ज़ोन के अंदर अल्फाबेटिकली अरेंज स्टेट हैं.

इसका मतलब h- हरियाणा, j-झारखंड और k- केरल एक ज़ोन में होंगे. ऐसे में रिक्रूटमेंट हरियाणा के अलावा झारखंड, कर्नाटक और केरल भी मिल सकता है.  
 
इससे फ़ायदा ये होगा कि पहले सभी टॉपर कैंडिडेट्स एक ही ज़ोन में रिक्रूट हो जाते थे, जो अब नहीं होगा. क्योंकि ग्रुप्स को अल्फ़ाबैटिकल ऑर्डर में रखा गया है.   

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