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एयरस्पेस किसी देश की ज़मीन और उसकी समुद्री सीमा के ऊपर का वो हवाई क्षेत्र होता है, जिस पर उसी देश का अधिकार होता है. इंटरनेशनल लेवल पर क्या नियम लागू होते हैं और क्या कोई देश अपनी मर्जी से अपना एयरस्पेस बंद कर सकता है? चलिए बताते हैं.

airspace

आपने airspace का नाम कई बार सुना होगा. कई बार हमारे मन में ये सवाल आता है कि आखिर किसी देश के ऊपर का आसमान किस देश का होता है और क्या कोई भी plane वहां से बिना permission के उड़ सकता है? या फिर अगर किसी देश का अपने आसमान पर कंट्रोल होता है, तो क्या वो इस एयरस्पेस को अपनी मर्ज़ी से बंद कर सकता है. दरअसल, किसी भी देश का एयरस्पेस उस देश की ज़मीन और उसकी समुद्री सीमा (maritime boundary) के ऊपर मौजूद वो हवाई क्षेत्र होता है, जिस पर उस देश का पूरा कंट्रोल और अधिकार होता है. यानी किसी देश के border के ऊपर का आसमान उसी देश का माना जाता है और वहां से गुजरने वाले planes को उस देश के rules follow करने पड़ते हैं. 

# एयरस्पेस को 7 क्लास में बांटा गया

आमतौर पर एयरस्पेस को सात क्लास a, b, c, d, e, f और g में बांटा जाता है, ताकि air traffic को सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से control किया जा सके. इनमें से कुछ space ऐसे होते हैं, जहां एयर ट्रैफिक कंट्रोल (atc) का पूरा कंट्रोल होता है और विमान को उड़ान भरने, ऊंचाई बदलने या रास्ता बदलने के लिए इजाज़त लेनी पड़ती है, जबकि कुछ इलाकों में limited control होता है और पायलट को बाकी विमानों से दूरी बनाए रखते हुए flight operate करनी होती है. एयरस्पेस का ये पूरा सिस्टम सेफ्टी के लिए बनाया गया है. 

ये सिस्टम international civil aviation organization (icao) ने बनाया ताकि पूरी दुनिया में एयरस्पेस का सिस्टम थोड़ा standard और organized रहे. simple language में समझो तो airspace मतलब किसी देश की ज़मीन के ऊपर का आसमान, जिस पर उस देश का कंट्रोल होता है. जैसे भारत के ऊपर का आसमान भारत के कंट्रोल में होता है, अमेरिका के ऊपर का आसमान अमेरिका के कंट्रोल में. हर देश अपने एयरस्पेस को इन 7 क्लास में बांट सकता है. हालांकि, ज़रूरी नहीं है कि सभी क्लास को इस्तेमाल किया जाए. हर क्लास के अपने rules और regulations होते हैं, ताकि प्लेन safely उड़ सकें और एयर ट्रैफिक कंट्रोल (atc) आसानी से उन्हें मैनेज कर सके.

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# controlled airspace और uncontrolled airspace

airspace को broadly दो कैटेगरी में बांटा जाता है. controlled airspace और uncontrolled airspace. controlled airspace वो होता है, जहां air traffic control (atc) का पूरा कंट्रोल होता है. यानी प्लेन कब उड़ान भरेगा, किस ऊंचाई पर जाएगा, किस रूट से जाएगा. ये सब atc बताता है ताकि planes के बीच टक्कर जैसी कोई दिक्कत न हो. ऐसे एयरस्पेस आमतौर पर बड़े एयरपोर्ट्स, मिलिट्री एरिया या ज़्यादा ट्रैफिक वाले इलाकों के आसपास होते हैं. वहीं uncontrolled airspace में atc का कंट्रोल बहुत कम होता है. यहाँ पायलट खुद दूसरे planes से रेडियो पर बात करके और visual flight rules (vfr) follow करके उड़ान चलाते हैं. ये आमतौर पर छोटे एयरपोर्ट या गांव-देहात वाले एरिया में होता है.

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Photograph: (freepik)

अब अगर क्लास की बात करें तो class a से class e तक controlled airspace में आते हैं, जबकि class f और class g uncontrolled airspace माने जाते हैं. class a सबसे ज़्यादा स्ट्रिक्ट होता है. यहाँ सिर्फ Instrument flight rules (ifr) वाले प्लेन उड़ सकते हैं, मतलब पायलट को सिर्फ instruments और navigation system देखकर उड़ान भरनी होती है और atc से पूरी clearance लेनी पड़ती है. class b में ifr और vfr दोनों उड़ सकते हैं लेकिन atc की permission जरूरी होती है. class c में भी दोनों उड़ते हैं, और atc ये ensure करता है कि ifr और vfr प्लेन आपस में safe distance पर रहें. class d में atc सिर्फ ifr फ्लाइट्स को अलग रखता है, लेकिन vfr पायलट को खुद ध्यान रखना पड़ता है. class e में भी ifr और vfr दोनों उड़ सकते हैं, लेकिन vfr फ्लाइट को atc से clearance लेने की ज़रूरत नहीं होती.

# airspace आसमान का traffic system

अब uncontrolled airspace की बात करें तो class f में rules काफी relaxed होते हैं. यहां ifr और vfr दोनों बिना clearance उड़ सकते हैं, हालांकि अगर atc available हो तो कुछ guidance मिल सकती है. जैसे weather या traffic info. class g सबसे basic होता है. यहां भी दोनों तरह की फ्लाइट उड़ सकती हैं, लेकिन atc कोई separation service नहीं देता, सिर्फ कभी-कभी information या advisory मिलती है. यानी airspace basically आसमान का traffic system है, जिसमें अलग-अलग क्लास ऐसे हैं, जैसे road के अलग-अलग traffic rules, कहीं पूरा traffic police कंट्रोल करती है, तो कहीं ड्राइवर को खुद alert रहकर गाड़ी चलानी पड़ती है, ताकि सबकी उड़ान safe रहे. 

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Photograph: (freepik)

# कितनी दूर तक का इलाक़ा कवर होता है? 

अब बात इसकी कि कोई देश कितनी ऊंचाई तक और देश की सरहद से बाहर कितनी दूर तक का इलाक़ा कवर करता है. तो किसी भी देश का एयरस्पेस सिर्फ उसकी ज़मीन के ऊपर ही नहीं बल्कि एक तय दूरी तक समुद्र के ऊपर और काफी ऊंचाई तक आसमान में फैला होता है. international law के मुताबिक किसी देश की ज़मीन और उसके coastal marine area (territorial sea) के ऊपर का आसमान उसी देश का एयरस्पेस माना जाता है. समुद्र के मामले में ये limit आमतौर पर तट (coast) से लगभग 12 nautical miles यानी करीब 22 किलोमीटर तक मानी जाती है. इस सीमा के अंदर का आसमान उस देश के कंट्रोल में रहता है और वहां से गुज़रने वाले विमानों को उस देश के rules और regulations को follow करना पड़ता है. इसके बाद का क्षेत्र इंटरनेशनल एयरस्पेस माना जाता है, जहां सभी देशों के विमानों को international rules के तहत उड़ान भरने की आज़ादी होती है. ये arrangement mainly international aviation law और maritime law के provisions पर based है, ताकि देशों की संप्रभुता (sovereignty) और global air traffic दोनों के बीच बैलेंस बना रहे. 

ऊंचाई की बात करें तो international law में किसी देश के एयरस्पेस की exact upper limit set नहीं की गई है, लेकिन scientist और aviation institute आमतौर पर पृथ्वी की सतह से लगभग 100 किलोमीटर ऊपर locatedकार्मन लाइन(karman line) को atmosphere और space की सीमा मानते हैं. इसके नीचे का क्षेत्र सामान्य तौर पर airspace माना जाता है, जबकि इसके ऊपर का क्षेत्र आउटर स्पेस यानी अंतरिक्ष माना जाता है, जिस पर किसी एक देश का अधिकार नहीं होता और उसे सभी लोगों की common property माना जाता है. हालांकि, ये सीमा पूरी तरह कानूनी रूप से तय नहीं है, लेकिन international aviation और space से जुड़े ज़्यादातर इंस्टीट्यूट इसी 80 से 100 किलोमीटर के बीच की ऊंचाई को practical standards के रूप में इस्तेमाल करते हैं.

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Photograph: (freepik)

# हर देश अपने आसमान का मालिक

दुनिया में आसमान में उड़ने वाले विमानों की safety के लिए कुछ international rules भी बने हुए हैं. chicago convention on international civil aviation को लागू करने और दुनिया भर की एविएशन व्यवस्था को मैनेज करने का काम international civil aviation organization (icao) करता है. icao की जानकारी के मुताबिक इस कन्वेंशन के तहत हर देश को अपनी ज़मीन और समुद्री सीमा के ऊपर के एयरस्पेस पर पूरा अधिकार होता है. यानी हर देश अपने आसमान का मालिक होता है और कोई भी विदेशी विमान उसके एयरस्पेस में तभी उड़ सकता है, जब उसे उस देश से इजाज़त मिली हो और वो वहां के aviation regulations को follow करे. इन international rules का मकसद यही है कि आसमान में उड़ रहे planes के बीच दूरी बनी रहे, ट्रैफिक कंट्रोल सही तरीके से हो और किसी तरह के कोई security issues पैदा न हो. 

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# क्या अपनी मर्ज़ी से बंद कर सकते हैं एयरस्पेस?

इसी international system के तहत देशों को ये अधिकार भी होता है कि वो ज़रूरत पड़ने पर अपने एयरस्पेस के किसी हिस्से को temporarily बंद या limited कर सकते हैं. icao की guidelines के मुताबिक अगर national security, military activity या war जैसी situation और कोई emergency का खतरा हो, तो कोई भी देश अपने आसमान में उड़ानों पर रोक लगा सकता है. लेकिन ऐसा करने से पहले दुनिया भर की एयरलाइंस और पायलटों को इसकी जानकारी देना ज़रूरी होता है, ताकि वो अपने फ्लाइट रूट बदल सकें. इसके लिए एविएशन एजेंसियां notam (notice to airmen) नाम का alert जारी करती हैं, जिसमें बताया जाता है कि किस इलाके में उड़ान पर रोक या खतरा है. यानी हर देश अपने आसमान का मालिक ज़रूर है, लेकिन एयरस्पेस बंद करने का फैसला भी इंटरनेशनल एविएशन सिस्टम को बताकर ही किया जाता है, ताकि पूरी दुनिया का हवाई ट्रैफिक secure बना रहे.

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सहरीन ने 10+2 तक आर्ट्स साइड से पढ़ाई की. शुरुआत से ख़बरें देखना और पढ़ना पसंद था. वक्त के साथ यह पसंद और बढ़ी तो ग्रेजुएशन भी इसी फील्ड में (बैचलर्स जर्नलिजम एंड मास कम्युनिकेशन) किया. मीडिया को और अच्छे से जानने और समझने और खुद को इसी फील्ड के लिए तैयार करने के लिए जामिया मिल्लिया इस्लामिया से PG Diplom in TV Journalism किया. इसी दौरान एबीपी न्यूज़ में मौका मिला तो वहां काम शुरू किया. इसी सफर को जारी रखते हुए TV9 भारतवर्ष में 2 साल बतौर sub-editor 2 साल हिंदी वेबसाइट पर काम किया. zingabad में सहरीन अपने मन की लिखने-पढ़ने और एक्सप्लोर करने के सपने को पूरा कर रही हैं.