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4 मार्च को पूरा इंडिया रंगों में रंगा है. होली का त्योहार मनाया जा रहा है. होली के इस त्योहार के कई रंग इंडिया में देखने को मिलते हैं. वहीं, फिल्मों से लेकर literature तक सभी पर होली का रंग छाया हुआ है.

holi

4 मार्च को हमारे अतरंगी देश में रंगों के त्योहार की अलग-अलग छटाएं ट्रेस करेंगे. जिस तरह हमारे इंडिया में हर 100 किलोमीटर पर बोली, पानी और खानपान बदलता रहता है, उसी तरह त्योहारों में भी काफ़ी वैरायटी देखने को मिलती है. ख़ास तौर से होली के त्योहार में. रंगों का ये उत्सव अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग ढंग से सेलिब्रेट होता है. कुछ एक उदाहरण देख लेते हैं. 

देस रंगीला-रंगीला 

  1. फूलों और लड्डुओं की होली: मथुरा-वृंदावन में सिर्फ़ रंगों से नहीं, फूलों और लड्डुओं से भी होली खेली जाती है. यहां के मंदिरों में भक्तों पर फूल और लड्डू बरसाए जाते हैं.
  2. लट्ठमार होली: मथुरा के ही बरसाना में हर साल लट्ठमार होली खेली जाती है. जहां महिलाएं पुरुषों को लाठियों से मारते हुए होली खेलती हैं.
  3. होला मोहल्ला: सिखों के पवित्र स्थान श्री आनन्दपुर साहिब में हर साल होली पर एक मेला लगता है, जिसे होला मोहल्ला कहते हैं. ये तीन दिन का फेस्टिवल काफ़ी हैपनिंग इवेंट होता है. इसमें मार्शल आर्ट्स, निहंग सरदारों की मॉक बैटल्स और संगीत का रंगारंग माहौल रहता है. पंजाब बेल्ट में इस फेस्टिवल की खूब धूम है.
  4. रंग पंचमी: महाराष्ट्र में रंग होली वाले दिन नहीं, रंग पंचमी वाले दिन खेला जाता है. इसकी तारीख़ अमूमन होली के चार-पांच दिन बाद पड़ती है.
  5. डोल जत्रा/डोल पूर्णिमा: बंगाल, असम और ओडिशा में डोल जत्रा या डोल पूर्णिमा मनाई जाती है, जो राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम को समर्पित है. इसमें रंगों से होली तो खेली जाती ही है, साथ ही राधा-कृष्ण की मूर्तियों को फूलों, पत्तियों और रंगीन कपड़ों स सजाया जाता है. फिर पालकी में घुमाया जाता है.
  6. कुमाऊंनी होली: उत्तराखंड के कुमाऊं रीजन में होली का त्योहार एकदम अलग ढंग से मनाया जाता है. यहां होली का त्योहार लंबा चलता है. कुमाऊंनी होली कहलाने वाली इस होली के तीन हिस्से होते हैं. बैठकी होली, खड़ी होली और महिला होली. बैठकी होली घरों में आयोजित होती है और बैठक में होली गीत गाए जाते हैं. खड़ी होली में गांव के लोग traditional costumes में गांव-क़स्बे में एक जगह जमा होते हैं. फिर वहां होली के गीत गाए जाते हैं. ढोल-दमाऊ और हुड़के की धुनों पर नाचते भी हैं. होली गीत गाने वालों को होल्यार कहा जाता है, जो घर-घर जाकर गाते हैं. महिला होली में सिर्फ़ औरतें शामिल होती हैं और इनके गीत भी औरतों की ज़िंदगी पर आधारित होते हैं.
  7. याओशांग: याओशांग ख़ास तौर से मणिपुर में मनाया जाने वाला त्योहार है, जिसमें रंग खेलने से ज़्यादा कुछ होता है. पांच दिन चलने वाले इस त्योहार के कई हिस्से होते हैं. पहले दिन याओशांग जलाई होती है, जिसमें बांस और घास से बनी एक छोटी सी झोपड़ी को जलाया जाता है. इसके अलावा थाबल चोंगबा नाम का एक पारंपारिक लोक नृत्य होता है, जिसमें लड़के-लड़कियां एक दूसरे का हाथ पकड़कर घेरा बनाकर नाचते हैं. इन्हीं दिनों में खेल प्रतियोगिताएं भी आयोजित होती हैं.
  8. हुरंगा: मथुरा के दाऊजी मंदिर में होली के अगले दिन एक अनूठी होली खेली जाती है. इसे हुरंगा कहते हैं. इसमें महिलाएं पुरुषों की शर्ट फाड़कर उसके कोड़े बनाकर उन्हें पीटती हैं. और पुरुष उन्हें पानी और रंग से भिगोते हैं. ये होली खेलने वाली महिलाओं को हुरियारन और पुरुषों को हुरियार कहा जाता है.
  9. शिग्मो उत्सव: होली के दौरान गोवा में शिग्मो उत्सव मनाकर बसंत को सेलिब्रेट किया जाता है. इसमें ख़ास तौर से कोंकणी रूट्स वाले लोग हिस्सा लेते हैं. इसमें पारंपारिक लोकनृत्य होते हैं और धार्मिक कथाओं वाली झांकियां निकाली जाती हैं.
  10. मंजल कुली: जब आप साउथ इंडिया में जाते हैं, तो होली का स्वरूप थोड़ा बदल जाता है. केरला में मंजल कुली या उकुली फेस्टिवल होता है. इसमें रंगों के अलावा हल्दी लगाने पर ज़ोर रहता है. इस दिन तमाम धार्मिक लोग अपने इलाक़ों के मंदिरों में इकट्ठा होते हैं और सामूहिक प्रार्थनाएं होती हैं.
  11. मसान होली: काशी में एक बेहद दिलचस्प होली खेली जाती है. मसान होली. इसे रंगों से नहीं चिता की राख से खेला जाता है. अघोरी, साधु-संत और शिव भक्त चिता की भस्म को शरीर पर लगाकर और हवा में उड़ाकर होली खेलते हैं.

सिनेमा में होली

हमारा सिनेमा, ख़ास तौर से हिंदी सिनेमा, होली के त्योहार को बहुत अहमियत देता आया है. गब्बर सिंह का ऐक्टिव-पैसिव जुमला किसे नहीं याद होगा! ‘होली कब है, कब है होली!’. उसके तुरंत बाद जय, वीरू, बसंती और तमाम रामगढ़ वाले होली का सबसे अहम संदेश पूरी दुनिया तक पहुंचाते हैं.

“गिले-शिकवे भूल के दोस्तों, दुश्मन भी गले मिल जाते हैं”. हिंदी सिनेमा का पहला होली गीत 1940 में आई फ़िल्म ‘औरत’ में था. महबूब ख़ान डायरेक्टेड इस फ़िल्म में ‘आज होली खेलेंगे साजन के संग’ गाना था. जिसे वजाहत मिर्ज़ा ने लिखा था और अनिल बिस्वास ने म्यूज़िक दिया था.

1959 में आई ‘नवरंग’ का क्लासिक होली गीत ‘अरे जा रे हट नटखट’ तो आज तक होली वाली प्लेलिस्ट में बना हुआ है. 'नदिया के पार' में सचिन और साधना सिंह ने होली को इस खूबी से पेश किया कि लोग कह उठे, ‘जोगी जी वाह जोगी जी’. इस गीत की ख़ासियत ये है कि इसमें मर्दाने और जनाने की अलग-अलग होली का कॉम्बिनेशन चलता रहता है. 

हिन्दी सिनेमा के कई बड़े सितारों की लिस्ट में एक ना एक मशहूर होली सॉन्ग ज़रूर है. दिलीप कुमार ने 1960 की ‘कोहिनूर’ में मीना कुमारी से बड़ी मासूम गुज़ारिश की थी, ‘तन रंग लो जी, आज मन रंग लो’. ‘कटी पतंग’ में राजेश खन्ना ग़ुस्ताख़ हो गए थे, और ऐलान कर दिया था कि ‘आज ना छोड़ेंगे बस हमजोली, खेलेंगे हम होली’.

अमिताभ बच्चन का तो होली फ़ेवरेट त्योहार मालूम होता है. 1981 के बाद से ऐसी होली इंडिया की हिस्ट्री में आज तक ना हुई, जिसमें अमिताभ-रेखा का ‘रंग बरसे’ गाना कानों में ना पड़े. दुनिया नई सदी में पहुंची तो अमिताभ ने ये ज़रूरी जानकारी शेयर की कि ‘होरी खेले रघुवीरा, अवध में होरी खेले रघुवीरा’. 

शाहरुख़ ख़ान ने तो होली का अद्भुत इस्तेमाल किया था. अपनी लव इंटरेस्ट को स्टॉक करने के लिए चेहरे पर तमाम रंग मल लिए थे. ‘अंग से अंग लगाना, सजन हमें ऐसे रंग लगाना’ गाने में उनकी ढोल बजाती हाज़िरी रोमांचक भी थी और डरावनी भी. एक और दुस्साहस उन्होंने तब किया था, जब नारायण शंकर की मनाही के बावजूद ‘गुरुकुल’ में स्टूडेंट्स से होली खिलवा दी थी और ज़ोर-ज़ोर से ख़ुद भी गाया था: ‘सोनी सोनी अखियों वाली, दिल दे जा या दे जा तू गाली’.

अक्षय कुमार और प्रियंका चोपड़ा ने होली का अंग्रेज़ीकरण करते हुए एक रिक्वेस्ट की थी कि do me a favor, lets play holi. रणबीर-दीपिका का दौर आया और बलम पर गंभीर इल्ज़ाम लगे. कि ‘बलम पिचकारी, जो तूने मुझे मारी, तो सीधी-सादी छोरी शराबी हो गई’.

रणवीर सिंह ने तो होली के त्योहार में सेंशुएलिटी का रंग घोल दिया था, जब उन्होंने दीपिका के सामने क़ुबूल किया था: ‘लहू मुंह लग गया’.  इन तमाम गीतों के अलावा भी जब-तब हमारे सिनेमा में होली की हाज़िरी लगती रही है. अनगिनत ऐसे गाने हैं, जहां रंग और उल्लास की मौज-बहार छाई है. 

साहित्य में होली 

सिनेमा की तरह हमारा साहित्य भी होली के रंगों से अछूता नहीं रहा है. हिंदी साहित्य के कोहिनूर प्रेमचंद ने एक कहानी लिखी है, ‘होली की छुट्टी’. इसमें एक स्कूल टीचर होली वाले दिन अपने घर जाना चाहता है और ट्रेन छूट जाने के बाद घर पहुंचने के challenges में अजीब मुसीबतों का सामना करता है. कथाकार यशपाल ने ‘होली का मज़ाक़’ नाम की कहानी लिखी है, जिसमें एक जॉइंट फ़ैमिली में होली सेलिब्रेशन के वक्त घर की मालकिन का सोने का कंगन खो जाता है. तेजेंद्र शर्मा की कहानी ‘फिर एक बार होली’ तो किसी भी संवेदनशील इंसान को झकझोर देगी.

इसमें नजमा नाम की एक हिंदुस्तानी लड़की की कहानी है, जिसे पाकिस्तान में ब्याह दिया गया है. वहां पर उसे अपना देश, अपना प्रेमी और उसके साथ बिताई आख़िरी होली याद आ रही है. क़ैस जौनपुरी की कहानी ‘होली बाद नमाज़’ तो communalism के मौजूदा दौर में और भी ज़रूरी हो जाती है. इनके अलावा ओम प्रकाश अवस्थी की कहानी ‘होली मंगलमय हो’ और स्वदेश राणा की कहानी ‘हो ली’ भी मस्ट रीड कैटेगरी में आती हैं. ये तमाम कहानियां आपको इंटरनेट पर मिल जाएंगी. 

कहानी-उपन्यासों से इतर कविताओं में तो होली कदम-कदम पर मिल जाएगी आपको. भक्तिकाल के कवियों ने होली पर countless पद लिख रखे हैं. जैसे सूरदास, रसखान, मीराबाई, बिहारी वग़ैरह. इनके पदों में भक्ति का रंग बेहद प्रॉमिनेंट हुआ करता था. जैसे सूरदास का ये लिखना - ‘हरि संग खेलति है सब फाग’. या मीरा का बेबसी भरे स्वर में गाना: ‘मीरा को प्रभु दर्शन दीजो, मैं तो जनम जनम की चेली, किणु संग खेलूं होली…’

इनके अलावा हिन्दी साहित्य के फेमस कवियों ने भी होली को अपनी कविता का टॉपिक बनाया है. इनमें राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला, हरिवंश राय बच्चन, केदारनाथ अग्रवाल, फणीश्वरनाथ रेणु, भारतेन्दु हरिश्चंद्र जैसे तमाम दिग्गज नाम शामिल हैं. मुस्लिम सूफ़ी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया, अमीर खुसरो, बहादुर शाह ज़फ़र और नज़ीर अकबराबादी भी होली पर अपने-अपने कलाम पेश कर चुके हैं. अमीर खुसरो का गीत ‘सकल बन फूल रही सरसो’ भरपूर मशहूर है. उन्हीं के लिखे होली गीत ‘आज रंग है री, मां रंग है री’ के बिना इंडिया की होली मुकम्मल ही नहीं होती. इनके अलावा हास्य कवियों की तो एक पूरी जमात है, जिन्होंने होली के इर्द-गिर्द पूरा साहित्य रचा हुआ है. 

शायरी में होली 

इसी के साथ होली पर कई शेर भी कहे गए हैं. 
नज़ीर अकबराबादी की एक नज़्म का अंश कुछ यूं है कि, 
“बना के चांद के सूरज के आसमां पर थाल
फ़रिश्ते खेलें हैं होली बिना अबीर-ओ-गुलाल
मियां तू हम से न रख कुछ ग़ुबार होली में
कि रूठे मिलते हैं आपस में यार होली में”

अमीर क़ज़लबाश होली को फ़िलॉसफी में बदल देते हैं, जब वो कहते हैं, 
“मैं दूर था तो अपने ही चेहरे पे मल लिया
इस ज़िंदगी के हाथ में जितना गुलाल था”
 
फ़रहत ज़ाहिद साहिबा ने रंगों को ही उदासियों के रंग में रंग लिया और लिखा:
“वो आए तो रंग संवरने लगते हैं
जैसे बिछड़ा यार भी कोई मौसम है”

और अंत में यशवर्धन मिश्रा का एक प्यारा सा शेर, 
“रंग सारे आ गए आरिज़ पे मेरे
जब कहा उस ने मुझे होली मुबारक”