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सेफ ज़ोन के कम्फर्ट से दूर, यहां रिस्क कोई पालतू जानवर नहीं, एक सनकी जुनून है. ज़िंगाबाद उन बावरों का ब्लूप्रिंट है जो घिसी-पिटी ट्रेडिशन तोड़ने निकले हैं. नो लाइज़, हम यहां सिर्फ सर्वाइव करने नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम को रीसेट करने आए हैं. नो कैप!

Zingabad

ऐसी ज़िंदगी, जिसके इंस्टा-कैप्शन में 9-to-5 जॉब, वर्क-लाइफ बैलेंस, फिक्स डिपॉजिट, और डेली वर्कआउट जैसे ‘सात्विक’ साउंड करने वाले हैशटैग होते हैं. कभी कुछ बहुत क्रेज़ी करने का मन हुआ, तो फिक्स डिपॉजिट तुड़वाकर म्यूचुअल फंड में डाल दिया (क्योंकि विज्ञापन में भगवान समान क्रिकेटर कह रहे हैं कि सही है!). ब्रेक चाहिए तो साउथ गोवा चले गए, जहां बीच की लहरों से ज़्यादा शोर आपके लैपटॉप के नोटिफिकेशन्स का होता है. रात को ब्रेकिंग बैड या सक्सैशन बिंज-वॉच कर लिया क्योंकि कल संडे है. मतलब कुछ तूफानी भी किया तो अपनी ईएमआई के दायरे में. अपनी हद से बाहर निकले भी तो सिर्फ इतनी दूर कि खतरा भांपते ही अपने ‘कम्फर्ट ज़ोन’ के वाई-फाई सिग्नल में वापस लौट सकें.

मैनेजमेंट वाला डर बनाम असली रिस्क

कसम से, इतना काफी है मेंटोज़ की आम ज़िंदगी से निकलकर ‘ड्यू’ के एड में फीचर होने के लिए. इससे ज़्यादा कुछ भी करोगे तो समाज आपको पागल करार देगा, और देना भी चाहिए! इसीलिए मैनेजमेंट स्कूल में पढ़ाया जाता है, ‘रिस्क मैनेजमेंट’. जैसे रिस्क कोई पालतू कुत्ता हो जिसे आप पट्टे से बांधकर टहलाने निकलें और कैलकुलेटेड तरीके से वापस घर ले आएं.

पर ज़िंगाबाद? यहां रिस्क कोई पालतू जानवर नहीं है. यहां रिस्क वो सनकी serial killer है जो आपके बेडरूम में कुल्हाड़ी लेकर बैठा है और आपसे आपकी नींद का सौदा कर रहा है.

हमारे पास कोई ब्लूप्रिंट नहीं है. यहां सिर्फ बेहिसाब स्ट्रेस है, रातों का वो 'बर्नआउट' है जो हड्डियों में महसूस होता है, और उन सड़ी-गली परंपराओं को तोड़ने की खुजली है जिन्हें दुनिया 'सिस्टम' कहती है. हम जानते हैं कि जिस 2050 के भारत का सपना हम देख रहे हैं, जहां विकास जैसे किरदार अपनी रूह ढूंढ रहे हैं, उस भविष्य को गढ़ने के लिए आज के 'कंफर्ट' की बलि देनी होगी. zingabad उन युवाओं की चीख है जिन्हें सालों से 'जेनरेशन गैप' के नाम पर म्यूट किया जाता रहा है.

नई ज़ुबान, नया सफर

और ये सब मेरे लिए भी नया है. अभी मैं जब कहता हूं कि ज़िंगाबाद बहुत 'स्ले' कर रहा है... तो अजीब लगता है न? बोलने में थोड़ी हिचकिचाहट होती है, थोड़ा 'फोर्स्ड' लगता है. पर यकीन मानिए, अभी शुरुआत है, एक दिन मैं भी ये सब सीख जाऊंगा. अभी जो शब्द ज़ुबान पर अटक रहे हैं, कल शायद वही सबसे 'ऑब्वियस' लगेंगे. क्योंकि ज़िंगाबाद सिर्फ एक स्टार्टअप नहीं, मेरे लिए खुद को दोबारा खोजने का एक जरिया भी है.

MBA मैंने भी किया है, मुझे पता है कि 'सस्टेनेबिलिटी' क्या होती है. पर क्या कोई मुझे बता सकता है कि 'बहादुरी' की एक्सपायरी डेट क्या है?  'क्रांति' का कैश-फ्लो स्टेटमेंट कहां है?  'इश्क' का मार्केट फिट क्या है? 

देखिए, प्रेम, क्रांति, पैशन और पागलपन रैशनल नहीं होते. आज वैलेंटाइन डे है. आप सभी को, जो इश्क में हैं या कभी रहे हैं, शुभकामनाएं. याद रखिएगा, जिन्हें संगीत नहीं सुनाई दे रहा, वो हमारे थिरकने को पागलपन ही कहेंगे.

आप भी इश्क में हैं, हम भी. और किसी शायर ने बड़ी ‘गुलज़ार’ बात कही है:
इश्क में और कुछ नहीं होता, 
आदमी बावरा सा रहता है.

तो उन्हें उनका 9-to-5 और उनका पालतू कैलकुलेटेड रिस्क मुबारक... हमें हमारा जुनून, हमारा अधूरा ब्लूप्रिंट और हमारा ये बावरापन. यू सी उनको खुदा मिले, है जिन्हें खुदा की तलाश… 

क्योंकि ब्रो, ये वाइब एकदम रिज़ है, एकदम ज़िंग है. नो कैप!

या आई सेड दैट!

ज़िंदाबाद! ज़िंगाबाद!!