ancient यरूशलेम सुबह अभी पूरी तरह जागी नहीं है. पत्थर वाली संकरी गलियों में हल्की ठंडी हवा चल रही है और शहर अजीब-सी ख़ामोशी में लिपटा हुआ है. कोई बाज़ार नहीं लगा है. कोई सौदेबाज़ी नहीं, कोई शोर नहीं. everything is cool as a breeze. लोग सादे कपड़ों में, सिर झुकाए, मंदिर की ओर जा रहे हैं. आज आम दिन नहीं है. आज खुद से मिलने का दिन है. आज ‘योम किप्पुर’ है. यानी प्रायश्चित का दिन. योम किप्पुर यानी रीसेट बटन ऑफ द सोल.
मंदिर के बड़े आंगन में भीड़ जमा है. हजारों लोग, लेकिन आवाज़ कम, फुसफुसाहट ज़्यादा. हर किसी के चेहरे पर एक-सा भाव, उम्मीद भी, डर भी. क्योंकि अगर आज की रस्म ठीक से हो गई तो पूरा साल हल्का रहेगा. अगर नहीं तो बेचैनी साथ चलेगी. आंगन के बीच दो बकरे खड़े हैं, जिन्हें नहीं पता कि आज वो इतिहास का हिस्सा बनने वाले हैं. महायाजक, यानि यहूदियों का सबसे बड़ा पुजारी आगे आता है. आज वो महायाजक सोने-चांदी की gorgeous accessories में नहीं है. उसने सफ़ेद कपड़े पहने हुए हैं. आज सब सादा है. क्योंकि योम किप्पुर कोई दिखावे वाला त्योहार नहीं, बल्कि शुद्धि वाला दिन है.
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सादगी का दिन और दो बकरे
लकड़ी और सोने से बने एक बॉक्स में दो चिट डाली जाती हैं. एक पर लिखा है ‘याहवेह’, दूसरी पर ‘अज़ाज़ेल’ भीड़ सांस रोक लेती है. पहली चिट्ठी निकलती है: याहवेह. इसके साथ ही पहले बकरे की नियति तय हो जाती है. यानी इसकी बलि दी जाएगी. अब दूसरा बकरा बचा है अज़ाज़ेल. महायाजक यानी पुजारी उस बकरे के पास जाता है. अपने दोनों हाथ उसके सिर पर रखता है. फिर कुछ बोलना शुरू करता है. धीरे, साफ़, लेकिन ऐसे कि सबको सुनाई दे. वो लोगों के पाप गिनाना शुरू करता है- झूठ, लालच, धोखा, अन्याय. हर शब्द हवा में तैरता है. भीड़ चुप है, क्योंकि वो जानती है, ये बातें किसी और की नहीं, उनकी अपनी हैं.
ये साल भर का अर्जित गिल्ट उन्हें अंदर तक खामोश कर देता है. बकरा ले जाया जाता है. मंदिर से बाहर शहर से बाहर रेगिस्तान की ओर. मकसद साफ़ है, समाज का बोझ समाज से दूर करना. एक जानवर जो कुछ समझता नहीं, लेकिन सबका अपराध बोध अपने साथ ले जा रहा है. metaphors, literals बन रहे हैं. अब लोग उस बकरे, अज़ाज़ेल को जाते हुए देखते रहते हैं. एक टक जब तक वो छोटा होते-होते रेत में खो नहीं जाता और जैसे-जैसे वो नज़र से ओझल हो रहा है. लोगों की राहत की intensity बढ़ती चली जा रही है. माहौल ऐसा है कि इस पूरे अनुष्ठान ने आत्मा पवित्र कर दी हो.
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‘एस्केप गोट’ बन जाता है अज़ाज़ेल
सदियों बाद, सन् 1530 में विलियम टिंडेल नाम का एक ट्रांसलेटर, जब इस कहानी का अंग्रेज़ी अनुवाद करता है तो ‘अज़ाज़ेल’, ‘एस्केप गोट’ बन जाता है. यानी वो बकरा जो सब कुछ लेकर निकल गया. धीरे-धीरे वही शब्द ‘स्केपगोट’ बन जाता है और फिर धीरे-धीरे ‘स्केपगोट’ किसी धार्मिक अनुष्ठान का नहीं, बल्कि Sociology का कीवर्ड बन जाता है. हर उस बार जब भी हम अपनी गलती किसी एक पर डाल देते हैं. हर उस बार जब भीड़ कहती है, ‘क्राइम उसी एक individual का है’ तब-तब ‘योम किप्पुर’ दोहराया जाता है, तब-तब एक अज़ाज़ेल, एक scapegoatham सबके cumulative पापों का बोझ अपनी आत्मा में लेकर, गुमनामियों के रेगिस्तान में गुम हो रहा होता है. ताकि हम guilt free जी सकें.
कम से कम अगले scapegoat के ढूंढ लिए जाने तक, वक्त का पहिया 2000 साल आगे घूमता है. ये 2026 का सबसे 'हाई-टेक' योम किप्पुर है. महायाजकों की पूरी जमात, जिसमें गलगोटिया से लेकर इवेंट वैलिडेटर्स तक शामिल हैं. एक सुर में चिल्ला रहे हैं, ‘पाप हमारा नहीं, इस not authorized ill informed scapegoat का है. नैरटिव के पन्ने इतनी तेज़ी से पलटे जा रहे हैं कि 'checks and balances' वाले पन्ने की धूल सीधे galgotias university की प्रोफेसर नेहा की आंखों में जा गिरती है. हालांकि, अबकी बार सब कुछ ज़्यादा ही prominent हो चुका था. under the carpet की सारी कोशिशें नाकाम हो रही थीं, लेकिन मार्केटिंग वाले मंत्रों की सक्सेस पर किसी को शक नहीं था. नेहा ने अपना लिंक्डइन स्टेटस ‘Open to Work’ किया और चुपचाप उस डिजिटल रेगिस्तान की ओर चल दीं. पीछे खड़ा सिस्टम अपनी 'बजबजाती सड़ांध' को नेहा के इस दार्शनिक तर्क की चादर से ढककर फिर से 'पवित्र' होने की कोशिश में लग गया.
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कैसे मुद्दे से ध्यान हटाया जाता है?
metaphors, फिर से अपनी पूरी बेशर्मी के साथ नंगे थे. french philosopher रेने गिरार्ड के अकॉर्डिंग सोसाइटी में जब टेंशन सिमर करता है तो उसे calm करने के लिए scape goat mechanism use किया जाता है. मतलब जब community में टेंशन ज्यादा हो जाए तो एक innocent person या समाज के सबसे innocent and living on the edge तबके को culprit बना कर पूरा ब्लेम उस पर डालकर इस anger और टेंशन को उसकी ओर channelise कर दिया जाता है. इससे सोसाइटी का गुस्सा भी निकाल जाता है, मुद्दे से ध्यान भी हट जाता है और अथॉरिटी पर आंच तक नहीं आती. ये कोई नई चीज़ नहीं है, हिस्ट्री में इसके कई example हैं.
1923 जापान में भयंकर भूकंप के बाद आग लग गई. सरकार इसे कंट्रोल करने में फेल हो गई. गुस्सा दबाने के लिए अफवाह फैलाई गईं कि कोरियन लोग आग लगा रहे हैं, नतीजा? भीड़ ने हज़ारों मासूम Koreans को मार डाला. pearl harbor के बाद अपनी intelligence failure को छुपाने के लिए अमेरिकी सरकार ने करीब सवा लाख जापानी मूल के नागरिकों को 'जासूस' बोलकर कैंपों में बंद कर दिया था. नाजी जर्मनी में तो economic failure का पूरा ब्लेम ही jews पर डाल कर होलोकॉस्ट हुआ था तो ये अथॉरिटी का अपना failure छुपाने का favourite चीट कोड है, जिसमें नेहा सबसे recent victim है.
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मैनेजमेंट के पास दो ही रास्ते
आपको batman वाली फिल्म 'the dark knight' याद है? इसकी ending में batman हार्वी डेन्ट के पाप अपने ऊपर शिफ्ट कर लेता है. ताकि gotham का अच्छाई पर से भरोसा न उठे, वो कहता है कि मैं वो बनूंगा जिसकी gotham को ज़रूरत है, लेकिन galgotiya की प्रोफेसर नेहा सिंह और बैटमेन में fundamental डिफरेंस ये है कि बैटमैन voluntarily scapegoat बनता है और नेहा को बनाया गया है. उन्हें डार्क नाइट नहीं बल्कि एक प्याले की तरह use किया गया. सत्ता को सच नहीं चाहिए stability चाहिए. कॉर्पोरेट, सरकारें, यूनिवर्सिटी ये सभी इसी principle पर चलती हैं, जब यूनिवर्सिटी का झूठ सोशल मीडिया की अदालत में नंगा हुआ तो मैनेजमेंट के पास दो ही रास्ते थे या तो अपनी collective failure स्वीकार करें या किसी एक को बलि का पात्र बना दें. उन्होंने नेहा सिंह को चुना. नेहा सिंह न तो पहली विक्टिम हैं और न ही आखिरी. ये खेल ऐसे ही चलता रहेगा. क्योंकि इन यूनिवर्सिटीज़ और कॉर्पोरेट्स को पता है कि पब्लिक की मेमोरी शॉर्ट होती है. वो 'नायक' फ़िल्म के अमरीश पुरी की तरह जानते हैं कि लोग अभी चिल्लाएंगे, शोर मचाएंगे, ट्विटर पर ट्रेंड करेंगे और फिर सब भूल जाएंगे.
virality से पहले, vitality
आज के दौर में virality की भूख ही नए Scapegoats पैदा कर रही है. क्योंकि virality की दुनिया तेज़ है, इतनी तेज़ कि वह सांस नहीं लेती, बस भागती है एक क्लिप, एक हेडलाइन, एक आउटरेज और फिर अगली clips दौड़ में सबसे पहले जो गिरती है, वो है vitality... असली जीवन, असली समझ, असली गहराई. वायरल चीज़ें अक्सर ज़ोर से चमकती हैं, लेकिन जल्दी बुझ भी जाती हैं. वो उत्तेजना देती हैं, पर ऊर्जा नहीं. शोर देती हैं, पर अर्थ नहीं. virality कहती है, अभी बोलो, अभी चिल्लाओ, अभी रिएक्ट करो, vitality पूछती है- समझे क्या, ठहरे क्या, महसूस किया क्या, वायरलिटी भीड़ बनाती है. vitality community, virality में your 6 can be my 9. vitality में लोग पहले ये देखते हैं कि perspective क्या है? नज़रिया क्या है? नैरेटिव क्या है, थीसिस क्या है, एंटीथीसिस क्या है और फिर सिंथेथिस क्या है virality click गिनती है. vitality असर गिनती है, जब तक हम 'virality' की इस सतही चमक से बाहर नहीं निकलेंगे, हम नए 'अज़ाज़ेल' और नए 'स्केपगोट्स' पैदा करते रहेंगे. हमें हमेशा खुद को याद दिलाते रहना होगा- virality से पहले, vitality.
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