domestic violence क्यों सहती रहती हैं महिलाएं?

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घरेलू हिंसा झेल रही महिलाएं अक्सर सिर्फ 'लोग क्या कहेंगे' की वजह से violence नहीं सहती. असल में ये एक deep mental level की लड़ाई होती है. डर, trauma, emotional attachment और दिमाग का stress mode, उन्हें उस toxic रिश्ते में trap करके रखता है. जिसे society बाहर से देखकर judge कर लेती है.

साइकोलॉजिस्ट नीति जोशी बताती हैं कि डोमेस्टिक वायलेंस कोई normal choice नहीं होती. ये असल में एक trauma response होता है. बीच-बीच में मिलने वाली सब ठीक हो जाएगा वाली vibes और पार्टनर का sorry कहना care दिखाना और fake promises दिमाग को hope mode में डाल देते हैं. इसी वजह से कई बार महिलाएं अपने partner से emotionally bonded महसूस करने लगती हैं. चाहे अंदर से वो रिश्ता उन्हें तोड़ ही क्यों न रहा हो.

अमोला बंसल बताती हैं कि ये प्रोसेस एक जुए की तरह होता है. कभी-कभी जब थोड़ा प्यार, केयर या अच्छा बर्ताव मिलता है तो दिमाग में डोपामाइन रिलीज होता है. वही फ़ीलिंग दिमाग को बार-बार उसी रिश्ते से उम्मीद लगाने पर मजबूर करती है. धीरे-धीरे ये एक तरह की chemical addiction बन जाती है, जहां इंसान बुरे ट्रीटमेंट के बावजूद अच्छे पलों का इंतज़ार करता रहता है.

घरेलू हिंसा अक्सर 4 स्टेप्स में चलती है. पहले धीरे-धीरे टेंशन बढ़ती है, फिर violence होता है. उसके बाद sorry कहना, मनाना और सब ठीक करने का फ़ेज़ आता है. फिर थोड़े समय के लिए शांति रहती है. ये पूरा पैटर्न बार-बार रिपीट होता रहता है और महिलाओं को एक लूप में फंसा देता है. इसका असर सिर्फ emotions पर नहीं, बल्कि सोचने की ताकत और दिमाग के काम करने के तरीके पर भी पड़ता है.

ट्रॉमा रिस्पॉन्स की वजह से कई victim महिलाएं freeze और fawn मोड में चली जाती हैं. इसका मतलब ये है कि उनका दिमाग danger को देखकर या तो बिल्कुल रुक जाता है या फिर सामने वाले को खुश रखने की कोशिश करने लगता है. इस हालत में वो practically stuck हो जाती हैं और चाहकर भी उस खतरे से दूर नहीं जा पातीं. ये कमज़ोरी नहीं, बल्कि दिमाग का survival mode होता है.

महिलाएं बार-बार घेरलू बाहर निकलने या हालात बदलने की कोशिश करती हैं और हर बार फेल होती हैं तो उनका दिमाग मान लेता है कि कुछ भी करने से फ़र्क नहीं पड़ेगा. धीरे-धीरे वो खुद को powerless समझने लगती है और try करना ही छोड़ देती है. ये हार मानना नहीं होता, बल्कि लगातार टूटने के बाद दिमाग का give-up मोड में चला जाना होता है.

सामाजिक कलंक और 'लोग क्या कहेंगे' का डर भी महिलाओं को घरेलू हिंसा सहने पर मजबूर करता है. 86% महिलाएं अपनी शादी में मिसबिहेव सहती रहती हैं, चाहे वह emotionally हो, physically हो या verbally.

शादी के पहले तीन सालों में महिलाएं डिनायल में रहती हैं, जबकि तीसरे से सातवें साल तक वे परफेक्ट वाइफ बनने की कोशिश करती हैं. सात साल के बाद वे exhaustion state में पहुंच जाती हैं, जहां उनकी Self-respect और मेंटल हेल्थ seriously affect होती है.

लंबे समय तक घरेलू हिंसा सहने की वजह से महिलाओं के प्री-फ्रंटल कॉर्टेक्स पर भी असर होता है, जिससे उनके लिए लॉजिकल थिंकिंग और एस्केप प्लान बनाना almost impossible हो जाता है.